श्रम का सांख्यिकीय दलदल
सोमवार की सुबह जब तुम्हारी नींद खुलती है, तो तुम्हें लगता है कि एक नई शुरुआत हुई है। कितनी भोली और दयनीय सोच है। जिसे तुम ‘नया दिन’ कहते हो, वह वास्तव में एक पुराने, सड़े हुए ‘सांख्यिकीय मैनिफोल्ड’ (Statistical Manifold) पर तुम्हारी वापसी है। तुम्हारी वह ‘To-Do लिस्ट’, जिसे तुम किसी पवित्र ग्रंथ की तरह पूजते हो, वह योजना नहीं है। वह एक गहरे दलदल में फेंके गए जंग लगे सिक्कों का ढेर है, जिसे तुम्हें नंगे हाथों से बटोरना है। तुम खुद को ‘कॉर्पोरेट प्रोफेशनल’ कहते हो, लेकिन सूचना ज्यामिति (Information Geometry) की नजर में, तुम घुटनों तक कीचड़ में धंसे एक चर (Variable) से ज्यादा कुछ नहीं हो, जो अपनी ही प्रायिकता के बोझ तले रेंग रहा है।
काम? काम कोई ‘पूजा’ नहीं है। यह एक विकृत ज्यामितीय स्थान है, जिसे तुम्हारी तनख्वाह से कटने वाले टैक्स और ऑफिस के बाहर मिलने वाले उस ठंडे, तेल में डूबे समोसे की हताशा ने मिलकर बनाया है।
दिहाड़ी मजदूर का प्रक्षेपवक्र
जैसे ही तुम अपने क्यूबिकल में बैठकर उस बेजान स्क्रीन को घूरते हो, तुम्हारा मस्तिष्क एक ‘प्रायिकता वितरण’ (Probability Distribution) का रूप ले लेता है। लेकिन यह गणित की किताबों वाला सुंदर ‘नॉर्मल डिस्ट्रीब्यूशन’ नहीं है। यह उस पुराने गैस सिलेंडर जैसा है, जिसका वाल्व कभी भी फट सकता है।
तभी तुम्हारा बॉस, जिसकी बौद्धिक क्षमता एक जले हुए टोस्टर से भी कम है, पीछे से आकर पूछता है, “वह फाइल कहाँ है?” उस एक क्षण में, तुम्हारे दिमाग का वितरण हिंसक रूप से बदलता है। इसे हम ‘कूल्बैक-लीबलर डाइवर्जेंस’ (Kullback-Leibler Divergence) कह सकते हैं, लेकिन आसान भाषा में यह तुम्हारी आत्मा का वाष्पीकरण है। तुम जिसे ‘मल्टीटास्किंग’ समझकर गर्व करते हो, वह असल में एक टूटी हुई साइकिल को हाईवे पर चलाने जैसा है। तुम गियर बदलते रहते हो, क्लच दबाते रहते हो, और बदले में सिर्फ धुआं और शोर पैदा करते हो। यह ‘संज्ञानात्मक भार’ (Cognitive Load) नहीं है; यह शुद्ध ऊष्मप्रवैगिकी (Thermodynamics) की त्रासदी है। तुम अपनी जैविक ऊर्जा को उन पीपीटी स्लाइड्स में बदल रहे हो, जिन्हें अंततः रद्दी की टोकरी में ही जाना है।
रीमैनियन मीट्रिक और उधारी का सिंहासन
अक्सर लोग पूछते हैं कि काम इतना थकाऊ क्यों है, जबकि वे दिन भर सिर्फ कुर्सी पर बैठे रहते हैं। इसका जवाब ‘रीमैनियन मीट्रिक’ (Riemannian Metric) में छिपा है। इस कार्य-स्थल की ज्यामिति में, दो बिंदुओं के बीच की दूरी मीटर में नहीं, बल्कि ‘अपमान’ और ‘निर्थकता’ में मापी जाती है। इसे हम ‘फिशर इनफॉर्मेशन मीट्रिक’ कहते हैं—यानी किसी बेतुके आदेश को समझने और उसे पूरा करने में घिसी हुई नसों की मात्रा।
तुम्हारे आसपास का वातावरण, विशेषकर तुम्हारे अयोग्य सहकर्मी, इस स्थान की वक्रता (Curvature) को बढ़ा देते हैं। जरा अपनी बगल वाली सीट पर बैठे उस व्यक्ति को देखो। वह, जिसने अभी-अभी अपनी अयोग्यता को छुपाने के लिए किस्तों पर एक [महंगी एर्गोनोमिक कुर्सी](https://www.hermanmiller.com/products/seating/office-chairs/aeron-chairs/) खरीदी है। उसे लगता है कि तीन लाख रुपये का यह जालीदार सिंहासन उसके दिमाग की सुस्ती को सोख लेगा। कितनी हास्यास्पद बात है। ज्यामितीय दृष्टिकोण से, यह वैसा ही है जैसे गंदे नाले के बीचोबीच एक सोने का सिंहासन लगा देना। वह चाहे कितनी भी आरामदायक मुद्रा में क्यों न बैठे, वह तैर तो उसी कॉरपोरेट गंदगी में रहा है। उस कुर्सी के हर पहिए की रड़क के साथ, वह उस दलदल में और गहरा धंसता जा रहा है, यह सोचते हुए कि शायद ‘लम्बर सपोर्ट’ उसे बचा लेगा।टे>
एंट्रॉपी और ठंडी चाय का स्वाद
अंततः, जिसे तुम ‘करियर ग्रोथ’ कहते हो, वह भौतिकी की भाषा में ‘फ्री एनर्जी’ का मिनिमाइजेशन है। यानी, एक ऐसी अवस्था में पहुंचना जहाँ तुम पत्थर की तरह हो जाओ—बिना सोचे, बिना महसूस किए, बस आदेशों का पालन करने वाली एक জড় वस्तु। तुम जितनी शिद्दत से ‘एफिशिएंसी’ (Efficiency) का पीछा करते हो, तुम उतनी ही अधिक ‘एंट्रॉपी’ (अव्यवस्था) अपने दिमाग में पैदा करते हो।
शाम के पांच बजे, ऑफिस की हवा में जो भारीपन होता है, वह कार्बन डाइऑक्साइड नहीं है। वह तुम सबके जल चुके न्यूरॉन्स की राख है। उस समय तुम नुक्कड़ पर जाकर जो अत्यधिक चीनी वाली, उबली हुई चाय पीते हो, वह तुम्हें सुकून नहीं देती; वह बस तुम्हारे मृत प्राय रिसेप्टर्स को एक आखिरी झटका देती है। उस चाय की हर चुस्की के साथ, तुम्हारी जीवन रेखा (Worldline) थोड़ी और मुड़ जाती है, इतनी कि अब उसे सीधा करना असंभव है।
बैठ जाओ। माउस को हाथ लगाओ। अपनी आत्मा के अगले कुछ ग्राम को डिजिटल कचरे में बदलने का समय हो गया है। ज्यामिति किसी को माफ नहीं करती, और तुम्हारी एक्सेल शीट को तो बिल्कुल नहीं।

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