कार्य का क्षय

पसीने, फाइलें और ब्रह्मांडीय शोर

इस उमस भरे बार के कोने से जब मैं बाहर उस कांच की इमारत को देखता हूँ, जहाँ लोग अपनी जवानी को एक्सेल शीट के खानों में कैद करने की कोशिश कर रहे हैं, तो मुझे दया नहीं आती। मुझे वहां सिर्फ ऊष्मप्रवैगिकी (Thermodynamics) का दूसरा नियम नंगा नाचता हुआ दिखाई देता है। जिसे तुम ‘करियर’ या ‘हसल’ कहते हो, वह वास्तव में ब्रह्मांड की अव्यवस्था यानी ‘एन्ट्रॉपी’ को बढ़ाने का एक बेहद थकाऊ और पसीने से लथपथ तरीका है। हम सब बस गर्मी पैदा करने वाली मशीनें हैं, जो खुद को महत्वपूर्ण समझने का नाटक कर रही हैं।

समोसे का पोस्टमार्टम और खुदरा रेज़गारी

आजकल के एमबीए धारी ‘कंसल्टेंट्स’ एक नया मंत्र जाप रहे हैं—’कार्य की सूक्ष्मता’ (Task Granularity)। उनका कहना है कि बड़े काम को छोटे टुकड़ों में बांट लो, तो सब आसान हो जाएगा। बकवास! यह सलाह वैसी ही है जैसे कोई कहे कि एक समोसे को खाने के लिए उसे चिमटी से नोच-नोच कर, उसके अणुओं को अलग करके खाओ।

सच तो यह है कि जब तुम किसी काम को दस छोटे हिस्सों में बांटते हो, तो तुम उस समोसे के अंदर का मसाला टेबल पर बिखेर रहे होते हो। तुम्हारी उंगलियां तेल से सन जाती हैं और मन घिना जाता है। जिसे विज्ञान की भाषा में ‘सूचना ज्यामिति’ (Information Geometry) कहते हैं, वह असल में वही बेचैनी है जो किसी ढाबे पर पचास तरह की दालों का मेन्यू देखकर होती है। आखिर में पेट में गुड़गुड़ होती है और तुम वही बासी दाल मंगाते हो। तुम्हारे दिमाग की ‘गिब्ज मुक्त ऊर्जा’ (Gibbs Free Energy) उस महीने के आखिर में बची हुई चिल्लर रेज़गारी की तरह है। तुम उसे काम करने में नहीं, बल्कि सिर्फ यह तय करने में लुटा देते हो कि उस चिल्लर को किस भिखारी के कटोरे में डालना है।

लोकल ट्रेन में न्यूरॉन्स की धक्का-मुक्की

तुम्हें लगता है तुम्हारा दिमाग कोई सुपरकंप्यूटर है? गलतफहमी है। यह एक सस्ता, पुराना डीजल इंजन है जो हर चढ़ाई पर काला धुआं छोड़ता है। जब तुम ‘मल्टीटास्किंग’ के नाम पर ईमेल से स्लैक और स्लैक से ज़ूम पर कूदते हो, तो तुम्हारे सिर के अंदर न्यूरॉन्स के बीच ठीक वैसी ही धक्का-मुक्की होती है जैसी शाम के वक्त मुंबई की लोकल ट्रेन में।

सोचो, तुम खिड़की के पास खड़े होकर ताजी हवा लेने की कोशिश कर रहे हो (यह तुम्हारा फोकस है), लेकिन तभी बगल वाला यात्री तुम्हारे चेहरे पर अपनी बासी सांसें छोड़ता है और पसीने से चिपचिपी बांह तुम्हारी गर्दन पर टिका देता है। वह चिपचिपाहट, वह घुटन—वही तुम्हारे दिमाग का हाल होता है जब तुम जबरदस्ती संदर्भ (Context) बदलते हो। उस भीड़ में तुम्हारा ‘इच्छाशक्ति’ का बटुआ कब चोरी हो जाता है, तुम्हें पता भी नहीं चलता। तुम थके हुए नहीं हो, तुम बस घिस चुके हो।

और सबसे बड़ी त्रासदी है—अपरिवर्तनीयता (Irreversibility)। समय का तीर सिर्फ एक दिशा में चलता है। निर्णय लेना वैसा ही है जैसे भरी दुपहरी में महंगी आइसक्रीम खरीदना। पैकेट फाड़ते ही वह पिघलने लगती है। तुम उसे वापस जमा भी दो, तो वह क्रिस्टल बन जाएगी, उसका वह मखमली स्वाद कभी वापस नहीं आएगा। एक बार जब तुमने घटिया मीटिंग में ‘हां’ बोल दिया, तो तुम्हारी ऊर्जा उस पिघली हुई आइसक्रीम की तरह बह गई। अब तुम चाटते रहो या उसे फेंक दो, नुकसान तो हो चुका।

बाज़ार का मंहगा कबाड़

इस अस्तित्ववादी थकान को छिपाने के लिए हम क्या करते हैं? हम बाज़ार की शरण में जाते हैं। हमें लगता है कि अगर हम अपनी मेज पर कोई आंखों को चुभने वाली कृत्रिम रोशनी लगा लेंगे, तो अचानक हमारे दिमाग की बत्ती जल जाएगी। क्या बचकाना ख्याल है। वह लैंप सिर्फ तुम्हारी झुर्रियों और मेज पर जमी धूल को ज्यादा साफ दिखाता है, और कुछ नहीं।

लोग हज़ारों रुपये फूँक देते हैं एक मरे हुए जानवर की खाल से बनी नोटबुक खरीदने में। उन्हें लगता है कि उस महंगे कागज पर उनकी ‘टू-डू लिस्ट’ लिखने से उनके जीवन का कचरा अचानक दार्शनिक हो जाएगा। लेकिन स्याही सूखने के बाद भी, वह कचरा ही रहता है। तुम अपनी अक्षमता को चाहे कितने भी महंगे चमड़े में लपेट लो, उससे बदबू आनी बंद नहीं होगी। हम वस्तुओं के माध्यम से उस शून्यता को भरने की कोशिश कर रहे हैं जो हर गुज़रते सेकंड के साथ चौड़ी होती जा रही है।

ठंडी चाय का सत्य

आखिर में, सब कुछ कमरे के तापमान पर आ जाना है। तुम्हारी सारी डेडलाइन्स, सारी भागदौड़, और वह एक्सेल शीट जिसे तुमने कल रात भर जागकर भरा था—सबका हश्र मेरे सामने रखी इस चाय की प्याली जैसा है। गर्म थी, जोश में थी, अब ठंडी है और उस पर मलाई की एक गंदी सी परत जमी है। ब्रह्मांड को रत्ती भर फर्क नहीं पड़ता कि तुमने आज कितना काम निपटाया। तुमने बस कमरे का तापमान 0.00001 डिग्री बढ़ाया है और अपनी मौत के थोड़ा और करीब खिसक गए हो। वेटर, बिल लाओ।

コメント

タイトルとURLをコピーしました