कॉर्पोरेट जगत का सबसे घिनौना झूठ यह नहीं है कि “हम एक परिवार हैं,” बल्कि यह है कि “कार्य कुशलता आपको मुक्त कर देगी।” क्या बकवास है। सच तो यह है कि जिसे हम ‘प्रोडक्टिविटी’ कहते हैं, वह ब्रह्मांडीय अराजकता को व्यवस्थित करने की एक हताशा भरी और अंततः असफल कोशिश है। यह बिल्कुल वैसा ही है जैसे आप अपने घर के सड़े हुए कचरे को एक सुंदर से मखमली डब्बे में भरकर उसे ‘इंटीरियर डिजाइन’ का नाम दे दें। आप उस पर कितना भी इत्र छिड़क लें, अंत में वह सड़ेगा ही और बदबू ही फैलाएगा। ऊष्मागतिकी (Thermodynamics) का दूसरा नियम निर्दयी है: किसी भी बंद सिस्टम में अव्यवस्था (Entropy) हमेशा बढ़ती है, और आपका दफ्तर ब्रह्मांड का सबसे बड़ा अव्यवस्था पैदा करने वाला यंत्र है।
निरर्थकता और रोजमर्रा की घृणा
आधुनिक श्रम और कुछ नहीं बल्कि जैविक ऊर्जा का ऊष्मीय बर्बादी (Waste Heat) में रूपांतरण है। जिसे आप ‘करियर’ कहते हैं, वह वास्तव में आपकी रीढ़ की हड्डी के धीरे-धीरे टूटने, पेट के बाहर निकलने और आपकी आँखों की रोशनी के धुंधले होने की एक लंबी, दर्दनाक प्रक्रिया है। हम ‘ग्रोथ’ के नाम पर अपनी न्यूरोलॉजिकल ऊर्जा को उन पीपीटी स्लाइड्स और एक्सेल शीट्स में जलाते हैं जिन्हें कोई कभी नहीं देखेगा। विज्ञान की ठंडी और क्रूर निगाहों से देखें तो यह सब केवल ‘हीट लॉस’ है। आपकी बुद्धि, आपकी रचनात्मकता और आपकी महत्वाकांक्षा केवल उस ईंधन की तरह है जिसे जलाकर कॉर्पोरेट इंजन अपना तापमान बनाए रखता है, जबकि आप राख में बदल रहे हैं।
जरा अपनी दिनचर्या पर गौर करें। आप सुबह उठते हैं, अधपकी नींद और बासी मुँह के साथ। आप उस कंप्यूटर के सामने बैठते हैं, आपकी पीठ में वह चिरपरिचित दर्द शुरू होता है जो अब आपके अस्तित्व का हिस्सा बन चुका है। आपकी मेहनत का फल क्या है? महीने के अंत में मिलने वाली वह राशि जो आपके मकान मालिक के लालच, ईएमआई और बिजली के बिलों के बीच दम तोड़ देती है। आप जितनी अधिक मेहनत करते हैं, आप उतने ही अधिक ‘एन्ट्रॉपी’ पैदा करते हैं। आपका ईमेल इनबॉक्स उन झूठे वादों का कब्रिस्तान है जहाँ हर ‘रिप्लाई’ एक नई समस्या और तीन नई मीटिंग्स को जन्म देता है। यह बिल्कुल वैसा ही है जैसे दिल्ली की तपती दोपहर में एक खचाखच भरी बस के पीछे भागना; आप पसीने से तर-बतर हो जाते हैं, आपकी सांसें उखड़ जाती हैं, फेफड़ों में काला धुआं भर जाता है, और अंत में बस आपको सड़क पर अकेला छोड़कर निकल जाती है।
आपकी पूरी मेहनत का परिणाम केवल थकान और चिड़चिड़ापन है, जो आप शाम को अपने परिवार या अपने खाने की थाली पर निकालते हैं। वह खाना भी, जो आपने इतनी मेहनत से कमाया है, अब बेस्वाद लगता है क्योंकि आपकी ऊर्जा का एक-एक कतरा उस दफ्तर की एयर-कंडीशन्ड, कृत्रिम हवा ने सोख लिया है।
भ्रम का महंगा बाज़ार
इंसान की फितरत देखिए। लोग अपनी इस बढ़ती हुई आंतरिक अराजकता और जीवन की रिक्तता को थामने के लिए Herman Miller Aeron जैसी लाखों की कुर्सी पर बैठते हैं। उन्हें लगता है कि एक एर्गोनोमिक जालीदार पीठ उनकी आत्मा के टूटे हुए टुकड़ों को जोड़ देगी। या फिर अपनी विफलता को छिपाने के लिए वे एक Smythson के लेदर जर्नल में अपने बेकार के विचार और ‘टू-डू लिस्ट’ लिखते हैं। जैसे कि एक मरे हुए जानवर की महंगी खाल पर सुनहरे अक्षरों में अपनी गुलामी का हिसाब लिखने से उनकी निरर्थक ज़िंदगी को कोई दैवीय अर्थ मिल जाएगा। यह वैसा ही है जैसे फटे हुए, बदबूदार मोज़े पर महंगा इत्र छिड़कना; गंध फिर भी आएगी ही, और वह पहले से भी ज्यादा घिनौनी होगी।
ऊष्मागतिकी और बिखराव
जब हम व्यक्तिगत वर्कफ़्लो की बात करते हैं, तो हमें इल्या प्रिगोगिन के ‘डिसिपेटिव स्ट्रक्चर्स’ (Dissipative Structures) को याद करना चाहिए। आपका ‘शेड्यूल’ एक सुंदर भ्रम है। यह सूचना ज्यामिति का एक ऐसा ढांचा है जो संतुलन से बहुत दूर है। यह केवल तभी तक टिकता है जब तक आप उसमें अपनी नसों का खून जलाकर ऊर्जा डालते रहते हैं। जैसे ही आप ऊर्जा देना बंद करते हैं (यानी, जैसे ही आप बीमार पड़ते हैं या ‘बर्नआउट’ होते हैं), पूरा ढांचा ताश के पत्तों की तरह ढह जाता है। मानव मस्तिष्क कोई सुपर कंप्यूटर नहीं है; यह एक गीला, मांसल इंजन है जो बहुत जल्दी गरम होता है और अंततः खराब हो जाता है।
सड़क किनारे मिलने वाले उस समोसे के बारे में सोचिए जो घटिया, काले पड़ चुके तेल में बार-बार तला गया है। उसे खाकर मिलने वाली जलन और आपके दफ्तर के ‘हाई-प्रेशर’ काम से मिलने वाला तनाव—भौतिकी के स्तर पर दोनों एक ही हैं। दोनों ही आपके सिस्टम की एन्ट्रॉपी को खतरनाक स्तर तक बढ़ाते हैं। हम जिसे ‘फोकस’ कहते हैं, वह केवल तंत्रिका तंत्र का एक अस्थायी और खर्चीला ‘बग’ है, जो आपको यह भुलाने में मदद करता है कि आप धीरे-धीरे मर रहे हैं।
आत्म-संगठन का क्रूर अंत
अव्यवस्था से व्यवस्था का उभरना कोई चमत्कार नहीं है, बल्कि सिस्टम की आखिरी, दर्दनाक चीख है। जब तनाव चरम पर पहुँच जाता है, तो अराजकता से अचानक एक नया पैटर्न उभरता है जिसे हम ‘क्रिएटिविटी’ या ‘फ्लो स्टेट’ कहते हैं। कॉर्पोरेट वाले इसे बेचते हैं, लेकिन याद रहे, यह भी अस्थायी है। यह जलते हुए तारे की उस आखिरी चमक की तरह है जो सुपरनोवा बनने से पहले होती है—विनाश से ठीक पहले की चमक।
हमारा कार्य-जीवन एक निरंतर क्षय (Decay) की प्रक्रिया है। हम अपनी जैविक बैटरी को हर दिन डिस्चार्ज करते हैं, इस उम्मीद में कि सप्ताहांत पर हम ‘रिचार्ज’ हो जाएंगे। लेकिन हर चार्जिंग साइकिल के साथ आपकी क्षमता कम होती जाती है। आप खुद को कितना भी व्यवस्थित कर लें, कितने भी महंगे प्लानर खरीद लें, अंततः आप ब्रह्मांड के उसी ‘थर्मल डेथ’ (Thermal Death) की ओर बढ़ रहे हैं जहाँ न कोई डेडलाइन होगी, न कोई प्रमोशन, न कोई बोनस, और न ही कोई बेकार का ‘फीडबैक लूप’। आपकी कुर्सी खाली हो जाएगी, आपका जर्नल रद्दी के भाव बिकेगा, और आपका तथाकथित ‘लिगेसी’ शून्य में विलीन हो जाएगा। यह सब एक भद्दा मजाक है। और सबसे दुखद बात यह है कि आप कल फिर उसी मेज पर बैठेंगे, उसी पत्थर को पहाड़ पर धकेलने के लिए।

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