व्यर्थ श्रम

सुबह की वह पहली किरण, जिसे कवि उम्मीद का प्रतीक बताते हैं, वास्तव में आपकी गुलामी के नवीनीकरण का संकेत है। जैसे ही आप अपनी डायरी खोलकर उस मनहूस ‘टू-डू’ लिस्ट को बनाना शुरू करते हैं, आपको लगता है कि आप अपने जीवन को नियंत्रित कर रहे हैं। कैसी विडंबना है। यह कोई महान योजना का नक्शा नहीं है, बल्कि आपके मानसिक कारावास की सलाखें हैं, जिन्हें आप हर रोज खुद कसते हैं। हम जिसे ‘उत्पादकता’ या ‘सफलता’ का नाम देते हैं, वह ब्रह्मांडीय स्तर पर केवल शोर और गर्मी का उत्पादन है। आप एक कॉर्पोरेट योद्धा नहीं हैं; आप केवल भौतिकी के नियमों में फंसा एक ‘डिसिपेटिव स्ट्रक्चर’ (Dissipative Structure) हैं, जो केवल अपनी संरचना को बनाए रखने के लिए ऊर्जा निगल रहा है और बदले में अव्यवस्था उगल रहा है।

एन्ट्रॉपी का महंगा कचरा

अपने डेस्क की ओर देखिए। क्या आपको लगता है कि उन फाइलों को एक सीधी रेखा में रखने से दुनिया का अराजक स्वभाव बदल जाएगा? ऊष्मागतिकी का दूसरा नियम (Second Law of Thermodynamics) आपकी इस मूर्खता पर हँस रहा है। ब्रह्मांड की स्वाभाविक प्रवृत्ति अव्यवस्था की ओर बढ़ने की है। आप जितनी ऊर्जा चीजों को ‘व्यवस्थित’ करने में लगाएंगे, उतनी ही अधिक गर्मी आप वातावरण में छोड़ेंगे, जिससे कुल एन्ट्रापी बढ़ेगी ही। यह एक ऐसा युद्ध है जिसमें हार पहले से तय है।

अपनी मेज पर नज़र डालें, जहाँ आपने अव्यवस्था को छिपाने की नाकाम कोशिश की है। याद है, वह बेतुका महंगा चमड़े का डेस्क ऑर्गनाइज़र जिसे आपने यह सोचकर खरीदा था कि यह आपके जीवन में अनुशासन लाएगा? साठ हजार रुपये उस मृत जानवर की खाल के लिए, जो अब केवल रद्दी कागजों और धूल को जमा करने का एक पात्र बन गया है। क्या इसने आपके दिमाग की उलझनों को सुलझाया? नहीं। यह केवल आपकी जेब पर एक बोझ और आपकी मूर्खता का एक स्मारक बनकर रह गया है। आप व्यवस्था नहीं खरीद सकते, आप केवल अपनी घबराहट को महंगी वस्तुओं से ढकने की कोशिश कर रहे हैं। कितना दर्द है इस दिखावे में, जहाँ हम सोचते हैं कि वस्तुएँ हमारी आंतरिक शून्यता को भर देंगी।

निर्णय और ऊर्जा का रिसाव

हर बार जब आप कोई निर्णय लेते हैं—चाहे वह किसी ईमेल का उत्तर देना हो या लंच में क्या खाना है यह चुनना—आप ‘इरिवर्सिबिलिटी’ (अपरिवर्तनीयता) के सिद्धांत का शिकार होते हैं। समय का तीर केवल एक दिशा में चलता है। जो ऊर्जा आपने उस निरर्थक ज़ूम मीटिंग में जलाई, वह अब ब्रह्मांड में खो चुकी है, उसे वापस नहीं लाया जा सकता। सूचना सिद्धांत (Information Theory) हमें बताता है कि विकल्पों को चुनना और बाकी को छोड़ना एक ऊर्जा-खपत प्रक्रिया है। आपका मस्तिष्क एक हीट इंजन की तरह काम करता है, जो ग्लूकोज को जलाकर चिंता और तनाव पैदा करता है।

और इस प्रक्रिया का परिणाम क्या है? कुछ शब्द, कुछ हस्ताक्षर। आप उस रईसों वाले लीक करने वाले फाउंटेन पेन को ही ले लीजिए, जिसे आपने अपनी ‘प्रतिष्ठा’ के नाम पर खरीदा था। हर बार जब आप उसे कागज पर रखते हैं, वह स्याही के साथ-साथ आपकी हताशा को भी उगल देता है। हज़ारों रुपये का वह प्लास्टिक और धातु का टुकड़ा, जो अक्सर आपकी उंगलियों को नीला कर देता है, आधुनिक श्रम की सबसे सटीक रूपक है: महंगा, असुविधाजनक, और अंततः गंदा। आप सोचते हैं कि आप इतिहास लिख रहे हैं, लेकिन वास्तव में आप केवल रद्दी कागज पर खरोंचें मार रहे हैं जो कल कूड़ेदान में होंगी।

शून्य में विलीन होती चीख

तथाकथित ‘वर्क-लाइफ बैलेंस’ एक झूठ है जिसे एचआर विभाग ने आपको शांत रखने के लिए गढ़ा है। भौतिकी की दृष्टि से, संतुलन का अर्थ है ‘मृत्यु’ (Thermal Equilibrium)। जब तक आप जीवित हैं और काम कर रहे हैं, आप असंतुलन और तनाव की स्थिति में ही रहेंगे। हम बस जैविक मशीनें हैं जो उच्च गुणवत्ता वाली ऊर्जा (भोजन, उत्साह) को निम्न गुणवत्ता वाली ऊर्जा (अपशिष्ट ऊष्मा, थकावट) में बदल रही हैं। जिसे आप अपनी ‘विरासत’ कहते हैं, वह अंततः केवल घर्षण है।

संसार का हर प्रोजेक्ट, हर डेडलाइन, हर टारगेट अंततः ऊष्मा मृत्यु (Heat Death) की ओर बढ़ रहा है। हम अपनी नसों को निचोड़कर जिस व्यवस्था को बनाने का ढोंग कर रहे हैं, वह रेत के महल से अधिक कुछ नहीं। अगली बार जब आप थकान महसूस करें, तो यह मत सोचिए कि आपको नींद की ज़रूरत है; यह समझिए कि आपका सिस्टम एन्ट्रापी के बोझ तले दब चुका है और कोई भी ‘वीकेंड गेटअवे’ इस समीकरण को हल नहीं कर सकता।

भाड़ में गई यह सारी व्यवस्था और यह पाखंडी अस्तित्व।

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