एन्ट्रॉपी का ऋण

एन्ट्रॉपी का ऋण: नींद और ऊष्मागतिकीय हिंसा

पिछले हफ्ते हम चर्चा कर रहे थे कि कैसे आधुनिक दफ्तरों की वास्तुकला मनुष्यों को केवल ‘मांस से बने कैलकुलेटर’ में बदल रही है। लेकिन आज, चलिए उस सबसे बड़े ‘सिस्टम एरर’ की बात करते हैं जिसे समाज ‘नींद’ कहता है। शहर की ऊँची इमारतों में बैठे तुम्हारे सीईओ और ‘हसल कल्चर’ के पुजारी चिल्लाते हैं कि “नींद उन लोगों के लिए है जो हार मान चुके हैं।” यह बयान न केवल उनकी मूर्खता का प्रमाण है, बल्कि यह ऊष्मागतिकी (Thermodynamics) के दूसरे नियम के खिलाफ एक असफल विद्रोह है। वे चाहते हैं कि तुम एक ऐसे सिलिकॉन सर्वर की तरह काम करो जो कभी गर्म नहीं होता। लेकिन दुखद वास्तविकता यह है कि तुम्हारा मस्तिष्क कोई अनंत क्षमता वाला क्लाउड स्टोरेज नहीं है; यह एक जैविक मशीन है जो भौतिकी के क्रूर नियमों से बंधी है।

श्रम का पाखंड और न्यूरल कचरा

दिन भर के निरर्थक श्रम के बाद, तुम्हारा दिमाग उस सस्ते स्मार्टफोन की बैटरी की तरह हो जाता है जो चार्ज तो 100% दिखाती है, लेकिन एक वीडियो चलाते ही दम तोड़ देती है। जिसे तुम ‘थकान’ कहते हो, वह कोई भावना नहीं है। वह तुम्हारे सिनैप्टिक कनेक्शनों में जमा हुआ ‘सूचनात्मक कचरा’ है। कल्पना करो एक पुराने ढाबे के किचन की, जहाँ एग्जॉस्ट फैन पर पिछले दस सालों से तेल और कालिख की परतें जम रही हैं। तुम्हारा दिमाग शाम तक वैसा ही हो जाता है—चिपचिपा, धीमा और आग पकड़ने के लिए तैयार। यदि तुम इसे साफ नहीं करोगे, तो अगला विचार (यानी अगला ग्राहक) उस फर्श पर फिसल कर अपनी गर्दन तोड़ लेगा। यह एन्ट्रापी है, और यह नकद भुगतान मांगती है।

नींद कोई ‘आराम’ या ‘सुकून’ की अवस्था नहीं है। यह एक हिंसक ‘विमर्षी संरचना’ (Dissipative Structure) है। इल्या प्रिगोजिन (Ilya Prigogine) ने हमें सिखाया था कि जटिल प्रणालियाँ खुद को बिखरने से बचाने के लिए ऊर्जा का भारी क्षय करती हैं। जब तुम बेहोश होते हो, तो तुम्हारा मस्तिष्क एक ‘सूचना ज्यामितीय ग्रेडिएंट फ्लो’ (Information Geometric Gradient Flow) में व्यस्त होता है। यह तुम्हारे सांख्यिकीय मैनिफोल्ड (Statistical Manifold) पर खड़े उबड़-खाबड़ पहाड़ों को पीट-पीट कर समतल करने की प्रक्रिया है। यह एक क्रूर ‘कर्ज वापसी’ है।

सपनों का गणितीय भ्रम

और जिसे तुम ‘सपने’ कहते हो, वे और कुछ नहीं बल्कि डेटा के वे भ्रष्ट हिस्से हैं जो ‘कचरा पेटी’ में जाने से पहले सिस्टम में एक आखिरी बार फड़फड़ा रहे हैं। यह किसी पुरानी सरकारी फाइल के फटे हुए पन्नों जैसा है—बेमतलब और बेतरतीब। तुम इसमें ‘भविष्यवाणी’ या ‘गहरे अर्थ’ ढूंढते हो, जबकि हकीकत में यह केवल ‘गार्बेज कलेक्शन’ की प्रक्रिया है। इस शोरगुल भरी सफाई प्रक्रिया को स्थिर रखने के लिए, ताकि सिस्टम ओवरहीट होकर पिघल न जाए, हमें बाहरी हस्तक्षेप की आवश्यकता होती है। लोग अब इस तरह के भारी-भरकम ‘गुरुत्वाकर्षण कंबल’ (Weighted Blanket) का उपयोग कर रहे हैं, जो एक साधारण रजाई नहीं, बल्कि एक ‘थर्मोडायनामिक क्लैंप’ है। यह तुम्हारे अस्थिर शरीर को एक कृत्रिम ‘गहरी नींद’ के दबाव में जकड़कर रखता है, ताकि न्यूरॉन्स अपनी मरम्मत का काम बिना किसी व्यवधान के कर सकें। यह विलासिता नहीं, भौतिकी है।

शून्य की ओर वापसी

सुबह जब अलार्म बजता है, तो तुम ‘ताजा’ नहीं होते। तुम बस ‘प्रारंभिकृत’ (Initialized) होते हो। तुम्हारी चेतना एक ‘ओवरफिटेड’ मॉडल की तरह होती है जिसे जबरदस्ती रीसेट किया गया है ताकि वह आज के नए डेटा को प्रोसेस कर सके। सोचिए, एक ऐसा गत्ता (Cardboard) जो कल की बारिश में भीग कर लथपथ हो चुका है, उसे धूप में सुखाकर फिर से डिब्बा बनाने की कोशिश करना। वह अपनी पुरानी मजबूती कभी हासिल नहीं कर पाएगा। नींद वही धूप है जो तुम्हें फिर से काम लायक बनाने की कोशिश करती है, लेकिन नुकसान (Damage) स्थायी है।

हम सब एक ऐसी मशीन का हिस्सा हैं जो हर रात खुद को ठीक करती है ताकि अगले दिन फिर से तोड़ी जा सके। यह एक कभी न खत्म होने वाला लूप है, एक ऐसा एल्गोरिदम जिसका कोई ‘एग्जिट’ फंक्शन नहीं है। तुम बस अपने हार्डवेयर की गर्मी कम कर रहे हो ताकि वह फुक न जाए। इसमें कोई रोमांस नहीं है, केवल गणित है।

खैर, बहुत हो गया। बिल चुकाओ, मुझे घर जाना है।

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