गणितीय थकान

गणितीय थकान

पिछली बार हमने उस अंधी दौड़ के बारे में बात की थी जिसे दुनिया ‘प्रगति’ का नाम देकर पूजती है, लेकिन हकीकत में वह एक धीमी और दर्दनाक मानसिक सड़ांध है। जिसे तुम ‘विश्राम’ कहते हो, वह कोई आध्यात्मिक उपलब्धि या ‘मी-टाइम’ (Me-time) नहीं है, बल्कि तुम्हारे सिस्टम का वह अनिवार्य और हिंसक ‘शटडाउन’ है जो तब होता है जब तुम्हारी खोपड़ी के अंदर के न्यूरॉन्स किसी सस्ते ढाबे की बासी कढ़ी की तरह खौलने लगते हैं।

कॉर्पोरेट दफ्तरों के कृत्रिम वातानुकूलन (AC) में बैठकर तुम जो 14 घंटे की गुलामी करते हो, वह तुम्हें कोई अगला एलोन मस्क नहीं बना रही। वह बस तुम्हारे दिमाग को उस ‘ओवरफ़िटेड’ (Overfitted) कचरे में बदल रही है जो केवल अपने मालिक की चापलूसी करना और एक्सेल शीट के बेमतलब खानों को भरना जानता है। थकान कोई भावना नहीं है, यह तुम्हारे बैंक बैलेंस की हवस और तुम्हारी जैविक ऊर्जा के बीच का वह जानलेवा अंतर है जो तुम्हें हर सुबह खुदकुशी के ख्यालों के करीब ले जाता है।

कॉर्पोरेट नरक (The Corporate Hell)

जब तुम किसी तथाकथित ‘सक्सेसफुल’ स्टार्टअप फाउंडर को लिंक्डइन पर ‘हसल’ (Hustle) के बारे में बकवास करते सुनते हो, तो समझ लेना कि वह तुमसे सफेद झूठ बोल रहा है। वह तुम्हें उस ज्यामितीय ढलान पर धकेल रहा है जहाँ तुम्हारा ‘लॉस फंक्शन’ (Loss function) कभी कम नहीं होगा, क्योंकि तुम्हारी ज़िंदगी का पूरा ढर्रा ही खराब है। यह ठीक वैसा ही है जैसे बेंगलोर के रेंगते हुए ट्रैफिक में फंसा हुआ वह खटारा ऑटो, जिसका इंजन तेल की जगह ड्राइवर के पसीने, गालियों और हताशा से चल रहा हो। तुम सोचते हो कि तुम ‘ग्रोथ’ कर रहे हो, लेकिन तुम बस अपनी मानसिक सतह को उस हद तक खुरच रहे हो जहाँ से वापसी मुमकिन नहीं।

तुम्हारी ज़िंदगी एक ऐसी सड़क है जिस पर गड्ढे इतने गहरे हैं कि ‘संभाव्यता’ (Probability) की हर कोशिश तुम्हें वहीं मुँह के बल गिरा देती है। जब तुम बिना रुके काम करते हो, तो तुम्हारे न्यूरल नेटवर्क के भीतर का शोर (Noise) इतना बढ़ जाता है कि तुम्हें अपनी खुद की चीखें भी सुनाई नहीं देतीं। लोग इसे ‘बर्नआउट’ का फैंसी नाम देकर सहानुभूति बटोरते हैं, लेकिन मैं इसे ‘कचरा प्रबंधन की विफलता’ कहता हूँ। तुम बस एक पुराने, धूल खाते हुए डेस्कटॉप कंप्यूटर की तरह हो जिसका पंखा अब केवल घरघराहट का शोर मचाता है, ठंडा कुछ नहीं करता। क्या नौटंकी है ये।

सड़न और उबकाई (The Stench of Decay)

मशीन लर्निंग में ‘वेट रेगुलराइज़ेशन’ (Weight Regularization) जैसा भारी-भरकम शब्द इस्तेमाल करके तुम खुद को बहुत बड़ा डेटा वैज्ञानिक समझते हो? असल में यह तुम्हारी उस मजबूरी का गणितीय नाम है जो तुम्हें रात को बिस्तर पर बेजान पटक देती है। यह वह ‘पेनल्टी टर्म’ (Penalty term) है जो कुदरत तुमसे ब्याज सहित वसूलती है क्योंकि तुमने दिन भर अपने दिमाग को फालतू के ज़ूम कॉल्स और क्लाइंट की गालियों से भरा है। तुम्हारी नींद वह सफाई प्रक्रिया है जो तुम्हारे दिमाग की नालियों में फंसे उस कचरे को निकालती है जिसे तुमने ‘करियर’ समझ रखा है—ठीक वैसे ही जैसे बाथरूम की नाली में फंसे हुए बाल पानी को रोक देते हैं।

जब तुम सोते हो, तो तुम किसी महान ‘स्टेशनरी पॉइंट’ पर नहीं पहुँचते, बल्कि तुम उस फटे हुए मोजे की तरह होते हो जिसे अब और नहीं खींचा जा सकता। तुम्हारी हालत उस स्मार्टफोन की तरह है जिसकी स्क्रीन तो चमक रही है, लेकिन जिसकी बैटरी अंदर से फूल चुकी है और जो किसी भी वक्त फटकर तुम्हारे मुंह पर तेज़ाब फेंक सकती है। हम सब समय के साथ खराब होते हुए कैपेसिटर हैं।

और इस तबाही से बचने के लिए तुम बाज़ार के उन झांसों में आते हो जिन्हें ‘वेलनेस’ कहा जाता है। बाज़ार तुम्हारी इसी हताशा को बेचता है। अब लोग अपनी नींद सुधारने के लिए कलाई पर ऐसे सेंसर बांधकर सोते हैं जैसे वे कोई परमाणु बम डिफ्यूज करने वाले हों। हद तो तब हो जाती है जब लोग इस बेतुके और जानलेवा भारी कंबल के नीचे दबकर शांति ढूँढने की कोशिश करते हैं। उन्हें लगता है कि 10 किलो की सिंथेटिक रुई उनके सीने पर रखे उस पत्थर का बोझ कम कर देगी जो उनके मैनेजर ने वहाँ रखा है। इतनी कीमत में तो मोहल्ले का एक गरीब परिवार महीने भर का राशन ले आए, लेकिन तुम्हें तो अपनी ‘ज्यामितीय शांति’ खरीदनी है, चाहे उस बोझ के नीचे दम ही क्यों न घुट जाए। पागलपन की इंतेहा है।

टूटी हुई चप्पल का दर्शन (The Philosophy of a Broken Sandal)

सच्चाई यह है कि तुम्हारी रिकवरी कोई शानदार ‘रीमानियन मैनिफोल्ड’ की यात्रा नहीं है। यह सिर्फ एक टूटी हुई चप्पल है जिसे तुम गाँठ बाँधकर घसीटने की कोशिश कर रहे हो। जब तुम्हारे सिस्टम की ‘फिशर इंफॉर्मेशन’ (Fisher Information) खत्म हो जाती है, तो तुम्हारा दिमाग नई सूचनाओं को प्रोसेस करना बंद कर देता है और तुम बस एक ही बात को पागलों की तरह बार-बार दोहराने लगते हो। यह अवस्था ऑफिस की कैंटीन में मिलने वाली उस सड़ी हुई चाय जैसी है, जिसमें चीनी ज़्यादा और दूध कम होता है—स्वाद कुछ नहीं, बस सीने में जलन और भविष्य का अल्सर।

आराम करना उस केंद्र की ओर लौटना है जहाँ तुम्हारी औकात और तुम्हारी इच्छाएँ एक-दूसरे से गले मिलती हैं। यह वह ‘ज्यामितीय संतुलन’ है जो एक दिहाड़ी मजदूर को दोपहर में किसी सूखे पेड़ के नीचे सूखी रोटी खाकर मिलता है, जबकि तुम अपने हज़ारों रुपये के मेमोरी फोम गद्दे पर करवटें बदलते रहते हो। एक मशीन को ठंडा करने के लिए बस प्लग निकालना पड़ता है, लेकिन तुम्हारे जैसे इंसान को ठंडा होने के लिए अपना वह ‘अहंकार’ कुचलना पड़ेगा जो कहता है कि ‘मेरे बिना कंपनी डूब जाएगी’।

हकीकत यह है कि तुम्हारे बिना कंपनी और भी बेहतर चलेगी। तुम बस एक ‘रिप्लेसबल’ पुर्जा हो जिसके दांते घिस चुके हैं।

अगली बार जब तुम थकान से चूर होकर गिरो, तो यह मत सोचना कि तुम कोई ‘सिस्टम रिबूट’ कर रहे हो। बस यह समझना कि तुम्हारी ज़िंदगी का गणित अब जवाब दे चुका है। तुम्हारे सिस्टम का लैम्ब्डा (λ) अब इतना बढ़ गया है कि तुम खुद धरती पर एक बोझ बन चुके हो। बाकी सब तो बस मार्केटिंग का मायाजाल है—चाहे वह तुम्हारा अगला प्रमोशन हो या वह ऊँचे दामों वाला तकिया जिसे तुम अपनी रातों की नींद वापस पाने के लिए ईएमआई पर खरीदते हो। तुम कल फिर उसी नरक में जाओगे, और यही तुम्हारी नियति है।

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