साहब, ये जो आप सुबह नौ बजे अपनी टाई की गांठ कसते हैं और लैपटॉप खोलकर ‘दुनिया बदलने’ का स्वांग रचते हैं, दरअसल आप कुछ बदल नहीं रहे हैं। आप बस ब्रह्मांड की उस महान और क्रूर ऊष्मागतिकी (Thermodynamics) की मशीन में एक मामूली सा पुर्जा हैं जो गर्मी पैदा कर रहा है। जिसे आप अपनी ‘लिंक्डइन प्रोफाइल’ की चमक समझते हैं, भौतिकी की भाषा में उसे केवल ‘एन्ट्रॉपी’ का प्रसार कहा जाता है। हम सब बस ऊर्जा को एक रूप से दूसरे रूप में बदलकर उसे नष्ट कर रहे हैं, और इस पूरी व्यर्थ प्रक्रिया को हमने ‘सभ्यता’ का नाम दे दिया है।
आपकी ‘करियर ग्रोथ’ का ग्राफ असल में ब्रह्मांड के ठंडे होकर मरने की प्रक्रिया का ही एक हिस्सा है। अजीब पागलपन है, नहीं? हम उस ऊर्जा को जलाने के लिए दौड़ रहे हैं जो हमारे पास कभी थी ही नहीं।
कचरे का प्रबंधन और आपकी नियति
ब्रह्मांड का दूसरा नियम (Second Law of Thermodynamics) किसी पाठ्यपुस्तक की सूखी परिभाषा नहीं है; यह वह सड़ांध है जो पुरानी दिल्ली की गलियों में लटकते बिजली के तारों के उस गुच्छे जैसी है—जिसे आप जितना सुलझाने की कोशिश करते हैं, वह उतना ही उलझता जाता है और अंत में शॉर्ट-सर्किट होकर आग लगा देता है। आपका सुव्यवस्थित एक्सेल शीट (Excel Sheet) और वह शानदार ‘टू-डू लिस्ट’ वास्तव में ब्रह्मांड की उस महान अव्यवस्था को रोकने का एक असफल और हास्यास्पद प्रयास है।
श्रम असल में एक ‘डिसिपेटिव स्ट्रक्चर’ (Dissipative Structure) है। इल्या प्रिगोगिन ने जब इस पर शोध किया होगा, तो उन्होंने सोचा भी नहीं होगा कि उनके सिद्धांतों का सबसे सटीक उदाहरण कॉरपोरेट ऑफिस के उस घुटन भरे केबिन में मिलेगा। आप कॉफी पीते हैं (ऊर्जा का निवेश), फिर आप पागलों की तरह बेमतलब ईमेल लिखते हैं (ऊर्जा का अपव्यय), और अंत में आप क्या पैदा करते हैं? केवल गर्मी। आपके लैपटॉप का पंखा जो शोर मचा रहा है, वह आपकी ‘सफलता’ का असली सबूत है—ऊर्जा का वह हिस्सा जो काम में नहीं आ सका और वातावरण में बिखर गया। यह ठीक वैसा है जैसे कोई व्यक्ति 10 रुपये का पेट्रोल जलाकर 2 रुपये की सब्जी खरीदने जाए और उसे ‘बचत’ का नाम दे दे।
ये सब क्या बकवास है?
दिमाग की कंगाली और मुक्त ऊर्जा
अब जरा इस ‘फ्री एनर्जी प्रिंसिपल’ (Free Energy Principle) के पाखंड को समझिये। कार्ल फ्रिस्टन ने बड़ी बारीकी से समझाया है कि हमारा मस्तिष्क ‘सरप्राइज’ यानी अनिश्चितता को कम करने की कोशिश करता है। लेकिन असल में, हमारा दिमाग एक कंजूस सरकारी बाबू (Clerk) की तरह है जो फाइल पर साइन करने से पहले सौ बहाने बनाता है ताकि उसे मेहनत न करनी पड़े। हम काम क्यों करते हैं? ताकि अगले महीने मकान मालिक के दरवाजे पर खड़े होने की ‘अनिश्चितता’ खत्म हो जाए। हम नियम और रूटीन क्यों बनाते हैं? ताकि दिमाग को सोचने की मेहनत न करनी पड़े।
मस्तिष्क एक ऐसी मशीन है जो हमेशा ‘प्रेडिक्शन एरर’ (Prediction Error) को शून्य करने पर तुली है। जब आपका बॉस अचानक शुक्रवार शाम को कोई नया काम थमा देता है, तो आपके पेट में जो मरोड़ उठती है, वह कोई भावनात्मक तनाव नहीं है। वह दरअसल आपके संज्ञानात्मक तंत्र (Cognitive System) की वह छटपटाहट है जो ‘फ्री एनर्जी’ को कम करने में विफल हो रही है। यह उस पति की घबराहट जैसी है जो अपनी पत्नी से झूठ बोलते समय पकड़ा जाने वाला हो—तनाव सच का नहीं, बल्कि अपनी बनाई हुई झूठी दुनिया (Prediction Model) के टूटने का है।
मुझे हंसी आती है जब लोग अपनी मानसिक थकान और रीढ़ की हड्डी के दर्द को मिटाने के लिए हर्मन मिलर की एयरोन कुर्सी जैसे खिलौने खरीदते हैं। उन्हें लगता है कि उस दो लाख रुपये की जालीदार पीठ वाली कुर्सी पर अपना वजन डालकर वे ब्रह्मांड के भौतिकी नियमों को मात दे देंगे। क्या मूर्खता है। आप चाहे सोने के सिंहासन पर बैठें या सड़क किनारे चाय की टपरी के टूटे हुए स्टूल पर, आपकी रीढ़ की हड्डी और आपके मस्तिष्क के बीच का वह ‘थर्मल शोर’ कम नहीं होने वाला। वह महंगी कुर्सी बस आपकी विफलता को थोड़ा और आरामदायक बना देती है, ताकि आप यह भूल सकें कि आप धीरे-धीरे एक जैविक कचरे में तब्दील हो रहे हैं।
चाय ठंडी हो गई।
यांत्रिक नियतिवाद और समोसे का तेल
हमारा अस्तित्व एक ऐसी बैटरी की तरह है जो धीरे-धीरे अपनी क्षमता खो रही है। जिसे आप ‘अनुभव’ (Experience) कहते हैं, वह दरअसल आपके तंत्रिका तंत्र (Nervous System) में जमा हुआ ‘कचरा’ है। हर टास्क जो आप पूरा करते हैं, वह आपके आंतरिक ‘स्टेट स्पेस’ को थोड़ा और संकुचित कर देता है। आपकी स्थिति उस हलवाई की कड़ाही जैसी है जिसमें समोसे तलने वाला तेल पिछले तीन दिनों से बदला नहीं गया है। वह तेल अब काला पड़ चुका है, गाढ़ा हो चुका है और जहर बन चुका है, लेकिन आप अभी भी उसमें अपनी उम्मीदों के समोसे तल रहे हैं। हर रोज एक ही तरह के मानसिक श्रम से हमारी विचार प्रक्रिया का ‘लुब्रिकेशन’ खत्म हो जाता है, और जो बचता है वह है—बर्नआउट।
श्रम की इस मशीनरी में ‘व्यक्तिगत स्वतंत्रता’ का विचार एक ‘बग’ (Bug) के सिवाय कुछ नहीं है। आप स्वतंत्र नहीं हैं; आप बस ऊष्मागतिकी के उन समीकरणों के गुलाम हैं जो चाहते हैं कि आप अधिक से अधिक ऊर्जा का उपभोग करें और उसे बेकार गर्मी के रूप में बाहर निकाल दें। ‘वर्क-लाइफ बैलेंस’ एक ऐसा ही मिथक है जैसे कि बिना धुएं के आग। सब कुछ बिखर रहा है। आपकी प्रतिष्ठा, आपके प्रोजेक्ट्स, और आपकी वह चमकती हुई डेस्क। हम बस उस बिखरने की रफ्तार को थोड़ा धीमा करने के लिए ‘काम’ कर रहे हैं।
चाय में मक्खी गिर गई है, फिर भी आप उसे पीएंगे, क्योंकि आपने उसके लिए पैसे दिए हैं। यही आपके जीवन का सार है। घर जाना चाहता हूँ।

コメント