श्रम की ज्यामिति: दक्षता के नाम पर बना कसाईखाना
आजकल की दुनिया ने ‘उत्पादकता’ (Productivity) नामक एक ऐसा मादक द्रव्य ईजाद कर लिया है, जिसे चाटकर आधुनिक गुलाम अपनी बेड़ियाँ खुद कसने में गर्व महसूस करते हैं। कॉर्पोरेट जगत के वातानुकूलित गलियारों में जो सन्नाटा है, वह शांति का नहीं, बल्कि उन आत्माओं का है जिन्हें एक्सेल शीट और पावरपॉइंट के पहियों के नीचे कुचल दिया गया है। लोग सुबह नौ बजे से रात के नौ बजे तक खुद को घिसते हैं, अपने तंत्रिका तंत्र को रेगमाल से रगड़ते हैं, और इस आत्म-दहन को ‘करियर’ का नाम देते हैं। अगर आप किसी मध्यम वर्गीय दफ्तर में झांकें, तो आपको वहां ऐसे लोग मिलेंगे जो ‘व्यस्त’ दिखने का अभिनय सिर्फ़ इसलिए कर रहे हैं क्योंकि खाली बैठना उन्हें पाप लगता है। यह दृश्य दिल्ली की जेठ की दोपहर में ट्रैफिक में फंसी उस पुरानी मारुति जैसा है, जिसका ड्राइवर सिर्फ़ पड़ोसी को दिखाने के लिए एसी चलाकर खड़ा है—ईंधन जल रहा है, इंजन गरम हो रहा है, जहरीला धुआं निकल रहा है, लेकिन गाड़ी अपनी जगह से एक इंच भी नहीं हिल रही।
असल में, जिसे हम ‘काम’ कहते हैं, वह सूचना ज्यामिति (Information Geometry) के नजरिए से केवल एक सांख्यिकीय मॉडल का भद्दा अनुकूलन (optimization) है। लेकिन इंसान ठहरा भावनाओं का पुतला, उसे लगता है कि पसीना बहाने से और खुद को थकाने से उसकी ‘वैल्यू’ बढ़ जाएगी। यह एक ऐसा भ्रम है जिसे पूंजीवाद ने धर्म का दर्जा दे दिया है।
मज़दूरी (Labor)
सभ्यता का विकास इस बुनियादी सिद्धांत पर आधारित था कि हम कम ऊर्जा खर्च करके अधिक परिणाम कैसे प्राप्त करें। लेकिन आज का वर्कफ़्लो एक ऐसे ‘जुगाड़’ जैसा है जो ऊपर से तो चमकदार दिखता है, पर अंदर से दीमक लगा हुआ है। हम मीटिंग्स करते हैं ताकि अगली मीटिंग का एजेंडा तय कर सकें, ईमेल लिखते हैं ताकि उस ईमेल पर चर्चा करने के लिए एक और मीटिंग बुलाई जा सके। यह एक अंतहीन, नश्वर लूप है। लोग अपनी थकान को, अपनी सूजी हुई आंखों को किसी युद्ध पदक की तरह पहनते हैं। वे लंच ब्रेक में ठंडी हो चुकी दाल और प्लास्टिक जैसी रोटियां सिर्फ़ इसलिए जल्दी-जल्दी निगलते हैं ताकि वे वापस अपनी कुर्सी पर जाकर उस स्क्रीन को घूर सकें जो उनकी जवानी चूस रही है।
सोचिए, एक इंसान जो खुद को बहुत ‘बिजी’ समझता है, वह असल में अपने ‘टास्क मैनिफोल्ड’ (Task Manifold) पर भटक रहा है। वह उस अंधे की तरह है जो गोल-गोल घूमकर सोच रहा है कि वह मीलों चल चुका है, जबकि हकीकत में वह अपने ही थूके हुए कफ पर बार-बार पैर रख रहा है। परिणाम? बढ़ा हुआ ब्लड प्रेशर, गिरते बाल, और महँगाई की आग में भस्म हो जाने वाली टुच्ची सैलरी। यह त्रासदी नहीं, एक घिनौना मजाक है।
मैनिफोल्ड (Manifold)
अगर हम काम को एक ज्यामितीय समस्या के रूप में देखें, तो हर टास्क एक संभावना वितरण (probability distribution) है। एक तर्कसंगत दुनिया में, कर्मचारी ‘फिशर सूचना मीट्रिक’ (Fisher Information Metric) का उपयोग करके ‘जियोडेसिक’ (geodesic)—यानी सबसे छोटे रास्ते—का चयन करता और काम खत्म करके घर चला जाता। लेकिन दफ्तरों की वास्तुकला ही ऐसी है कि वहाँ सीधा चलना नामुमकिन है। आपके बॉस का मूड और ऑफिस की राजनीति वहां के स्पेस-टाइम को इतना वक्र (curved) कर देती है कि आप चाहे कितनी भी तेज भागें, आप हमेशा गलत दिशा में ही पहुँचेंगे।
जब आप कहते हैं कि आप ‘बर्नआउट’ महसूस कर रहे हैं, तो वैज्ञानिक रूप से इसका मतलब केवल इतना है कि आपके मस्तिष्क का न्यूरल नेटवर्क बकवास डेटा को प्रोसेस करने में इतनी ऊष्मा (heat) पैदा कर रहा है कि सिस्टम का मदरबोर्ड पिघलने की कगार पर है। ऐसे में, जब आपके बगल वाला सहकर्मी अपने खुले मुंह से चिप्स चबाते हुए दुनिया की सबसे घिनौनी आवाजें निकाल रहा हो, तो हिंसा पर उतारू होने के बजाय आप अपनी गाढ़ी कमाई का एक बड़ा हिस्सा उस शोर रद्द करने वाले हेडफ़ोन (Noise Cancelling Headphones) पर खर्च कर देते हैं। सिर्फ़ इसलिए ताकि आप उस ‘कचर-पचर’ की आवाज को ब्लॉक कर सकें और खुद को यह झूठ बोल सकें कि आप एक ‘प्रोफेशनल’ माहौल में हैं। शांति अब एक लग्जरी है जिसे किस्तों पर खरीदा जा रहा है।
सांख्यिकीय रूप से, आपकी कार्यक्षमता उस समय सबसे अधिक होती है जब आपकी मेहनत और परिणाम के बीच की ‘केएल डाइवर्जेंस’ (KL Divergence) न्यूनतम हो। लेकिन कंपनियां चाहती हैं कि आप अधिकतम शोर मचाएं। क्योंकि शेयरधारकों को यह भ्रम चाहिए कि मशीन चल रही है, भले ही वह खाली घूम रही हो।
शून्य (Zero)
अंततः, वर्कफ़्लो का यह पागलपन भरा अनुकूलन हमें एक ऐसी स्थिति की ओर ले जाता है जहाँ ‘इंसान’ नामक त्रुटि को ही समीकरण से बाहर निकाल दिया जाएगा। यदि हम वास्तव में एक ‘जियोडेसिक वर्कफ़्लो’ डिजाइन कर लें, तो आपकी और मेरी ज़रूरत ही क्या रह जाएगी? हम बस एक सांख्यिकीय अशुद्धि (error term) बनकर रह जाएंगे। लोग अक्सर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से डरते हैं, लेकिन असल डर तो उस खालीपन से होना चाहिए जो काम के खत्म होने के बाद आपके जीवन में बचेगा। जब आप काम नहीं कर रहे होते, तो आप क्या हैं? शायद कुछ भी नहीं।
आजकल के तथाकथित सफल लोग लाखों रुपये की एर्गोनोमिक कुर्सियों (Ergonomic Chairs) पर बैठते हैं, यह उम्मीद करते हुए कि लम्बर सपोर्ट (lumbar support) उनके जीवन के खोखलेपन को भर देगा। वे इस बात से बेखबर हैं कि रीढ़ की हड्डी को चाहे कितना भी सीधा कर लो, वह जिस सिर को ऊपर उठाए हुए है, वह अंदर से खाली है। वे ज्यामितीय रूप से एक ‘लोकल मिनिमा’ (local minima)—एक गहरे गड्ढे—में फंसे हुए हैं और उसे ही शिखर समझ बैठे हैं।
इंसानी जज्बात, जिन्हें हम ‘जुनून’ या ‘डेडिकेशन’ कहते हैं, वे वास्तव में इस ज्यामितीय मॉडल में आने वाले ‘बग्स’ (bugs) हैं। वे घर्षण पैदा करते हैं। अगर आप वास्तव में कुशल होना चाहते हैं, तो आपको पत्थर की तरह ठंडा और मृत होना होगा।
सच तो यह है कि यह पूरी कवायद, ये महंगे गैजेट्स, ये जटिल सांख्यिकीय मॉडल, सब उस एक क्रूर सच को छिपाने के लिए हैं—कि हम सब एक ऐसे वीरान रेलवे प्लेटफॉर्म पर खड़े हैं जहाँ ट्रेन कभी आने वाली ही नहीं है, और हमारी जेब में जो टिकट है, वह उस यात्रा का है जो कभी शुरू ही नहीं हुई।

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