पिछली बार जब हम ‘समय प्रबंधन’ के उन खोखले और सड़े हुए वादों पर थूक रहे थे, तो मुझे लगा था कि शायद तुम कुछ सीखोगे। लेकिन नहीं, तुम और तुम्हारा यह कॉर्पोरेट गिरोह अभी भी उसी कचरे के ढेर में मुंह मार रहे हो जिसे तुम ‘मल्टीटास्किंग’ का नाम देते हो। सच तो यह है कि जिसे तुम अपनी कार्यक्षमता समझते हो, वह वास्तव में एक मानसिक दिवालियापन है। तुम एक एक्सेल शीट से उठकर किसी ज़ूम कॉल में ऐसे गिरते हो जैसे कोई नशे में धुत आदमी नाली में गिरता है। तुम्हारा यह तथाकथित ‘काम’ वास्तव में एक सांख्यिकीय दलदल है, जहाँ तुम जितना पैर मारते हो, उतना ही नीचे धंसते जाते हो।
भ्रम का बाज़ार
काम को घंटों में मापना उन लोगों की फितरत है जिनके पास सोचने के लिए दिमाग नहीं, बल्कि सिर्फ एक घड़ी होती है। असली बर्बादी तो उस ‘स्विच’ में है जिसे तुम बड़ी मासूमियत से ‘सिर्फ एक सेकंड’ कहते हो। जब तुम एक काम से दूसरे पर झपटते हो, तो तुम्हारा दिमाग किसी हाईवे पर नहीं दौड़ रहा होता, बल्कि वह पुरानी दिल्ली के चावड़ी बाज़ार की उस सड़ी हुई भीड़ में फंसा होता है जहाँ हर दो कदम पर तुम्हें एक नया धक्का लगता है।
यह परिवर्तन तुम्हारे न्यूरॉन्स के लिए वैसा ही है जैसे किसी भूखे भिखारी को यह उम्मीद देना कि उसे दावत मिलेगी और अंत में उसके हाथ में केवल एक बासी रोटी का टुकड़ा थमा देना। तुम्हारी एकाग्रता की यह जो दुर्गति हो रही है, उसे सुधारने के लिए तुम हाथ से सिली गई इन महंगी लेदर डायरियों में अपनी टूटी-फूटी योजनाएं लिखते हो। तुम्हें लगता है कि ₹5,000 का कागज़ तुम्हारी दिमागी कंगाली को छिपा लेगा? यह तो वैसा ही है जैसे किसी फटे हुए पुराने कुर्ते पर सोने का बटन टांक देना। तुम्हारी व्याकुलता कोई ‘कला’ नहीं है, वह केवल तुम्हारी तंत्रिकाओं का एक घटिया ‘सिस्टम एरर’ है। जितना अधिक तुम इधर-उधर भागोगे, तुम्हारी मानसिक ऊर्जा उतनी ही तेजी से खर्च होगी, जैसे जून की दोपहर में खुले में रखा हुआ बर्फ का गोला।
वक्रता और वासना
अगर तुम अपनी इस तथाकथित ‘बुद्धि’ को थोड़ा आराम देकर देखो, तो तुम्हें समझ आएगा कि हर काम एक अलग ही दुनिया है। जब तुम इन दुनियाओं के बीच कूदते हो, तो तुम एक ऐसी दूरी तय कर रहे होते हो जिसका कोई अंत नहीं है। सूचना के इस जाल में एक ‘वक्रता’ (Curvature) है, एक खिंचाव है जो तुम्हें थका देता है। यह वैसा ही है जैसे तुम किसी रेस्तरां में बैठकर पनीर बटर मसाला का ऑर्डर दो और वेटर तुम्हें लाकर ठंडी दाल दे दे। वह जो झुंझलाहट तुम्हें महसूस होती है, वही तुम्हारे दिमाग के साथ हो रही है जब तुम बेमतलब के ईमेल और मीटिंग्स के बीच झूलते हो।
तुम्हारी संज्ञानात्मक ऊर्जा कोई अक्षय पात्र नहीं है। यह उन फटे हुए बटुओं की तरह है जिनमें से सिक्के लगातार गिर रहे हैं। तुम जितना अधिक विक्षेपित होगे, तुम्हारी ‘एंट्रॉपी’ उतनी ही बढ़ेगी—यानी तुम्हारी जिंदगी का कबाड़ा उतनी ही जल्दी होगा। लोग इसे ‘व्यस्तता’ कहते हैं, मैं इसे ‘धीमी आत्महत्या’ कहता हूँ। तुम अपनी आत्मा को उन छोटे-छोटे नोटिफिकेशन के बदले बेच रहे हो जो तुम्हें हर पांच मिनट में झकझोरते हैं। और इस बेचैनी को शांत करने के लिए तुम जर्मन इंजीनियरिंग का दावा करने वाले इन भारी-भरकम पेन का सहारा लेते हो, मानो कोई महंगा पेन तुम्हारी घिसी-पिटी सोच में नई जान फूंक देगा। हकीकत तो यह है कि तुम्हारी कलम से निकलने वाली स्याही तुम्हारी मानसिक थकान के पसीने से ज्यादा कुछ नहीं है।
न्यूनतम का पाखंड
अब यहाँ उन ‘अदृश्य गणना मशीनों’ का जिक्र आता है जिन्हें दुनिया भविष्य कह रही है। वे मशीनें क्या कर रही हैं? वे तुम्हारे लिए रास्ता नहीं बना रहीं, बल्कि वे केवल उस कचरे को साफ कर रही हैं जो तुमने फैलाया है। वे तुम्हारे कौशल के टेढ़े-मेढ़े नक्शे पर वह सबसे छोटा रास्ता (Geodesic) ढूंढती हैं जहाँ तुम्हें सबसे कम जोर लगाना पड़े। लेकिन विडंबना देखो, इंसान को उस रास्ते से नफरत है। हमें अपनी अराजकता पसंद है क्योंकि वह हमें यह भ्रम देती है कि हम ‘महत्वपूर्ण’ हैं।
वह गणना मशीन तुम्हें बताएगी कि सीधे चलो, लेकिन तुम उस प्लैटिनम की निब वाले दिखावटी फाउंटेन पेन से अपनी डायरी में आड़ी-तिरछी लकीरें खींचते रहोगे क्योंकि तुम्हें लगता है कि व्यस्त दिखना ही सफल होना है। यह सब एक तमाशा है। तुम सूचना के उस विशाल नक्शे पर रेंगते हुए एक छोटे से कीड़े हो जिसे यह तक नहीं पता कि वह किस दिशा में जा रहा है। श्रम अब पसीना बहाना नहीं रह गया है, यह तो केवल यह तय करना है कि तुम अपनी ऊर्जा की अंतिम बूंद किस बेकार के काम पर छिड़कना चाहते हो। मेरा गला सूख रहा है और तुम्हारी यह मूर्खता देखकर मेरा सिर फट रहा है। जाओ, जाकर अपना वह बेकार का काम फिर से शुरू करो और यह दिखावा करो कि तुम दुनिया बदल रहे हो। असल में तुम बस अपनी ही कब्र को थोड़े बेहतर तरीके से खोद रहे हो। मुझे अब अकेले छोड़ दो।

コメント