ऊष्मीय अपव्यय

पिछली बार हमने ईमेल के उस अंतहीन दलदल पर चर्चा की थी जो आपकी आत्मा को धीरे-धीरे सोख लेता है। आज, चलिए उस ‘मजदूरी’ को सैद्धांतिक भौतिकी के ठंडे चश्मे से देखते हैं जिसे आप अपने लिंक्डइन बायो में गर्व से ‘वर्कफ़्लो’ कहते हैं।

असल में, आपका डेस्क और आपका दिमाग एक ‘नॉन-इक्विलिब्रियम सिस्टम’ (non-equilibrium system) है। यह वह अस्थिर अवस्था है जहाँ आप बाहर से लगातार ऊर्जा (कैफीन, निकोटीन और आसन्न समय सीमा का भय) डालते रहते हैं ताकि चीजें पूरी तरह से बिखर न जाएं। कॉरपोरेट जगत में जिसे ‘उत्पादकता’ कहा जाता है, वह वास्तव में एन्ट्रापी (entropy) के खिलाफ लड़ी जा रही एक हारी हुई लड़ाई है। आप जितनी अधिक स्प्रेडशीट व्यवस्थित करते हैं, आपका दिमाग उतनी ही अधिक अवशिष्ट गर्मी पैदा करता है। यह बिल्कुल वैसा ही है जैसे दिल्ली की भीषण गर्मी में किसी सस्ते चीनी स्मार्टफोन की बैटरी—जब आपको सबसे ज्यादा जरूरत होती है, वह २०% से सीधे २% पर गिर जाती है, और आपकी जेब में रखा वह यंत्र किसी मरते हुए तारे की तरह जलने लगता है।

यह सब मूर्खता है।

अव्यवस्था

ऊष्मागतिकी का दूसरा नियम निर्दयता से कहता है कि एक बंद तंत्र में अव्यवस्था समय के साथ केवल बढ़ती है। आपका ‘टू-डू लिस्ट’ (To-Do List) इस ब्रह्मांडीय सत्य का अपवाद नहीं है। आप सुबह एक साफ-सुथरी, hopeful लिस्ट बनाते हैं, और दोपहर के भोजन के बाद तक वह किसी पुराने बस स्टैंड के पीछे पड़े कूड़ेदान जैसी दिखने लगती है—जहाँ अच्छे इरादे सड़ रहे होते हैं। मानव मस्तिष्क कोई लिक्विड-कूल्ड सुपरकंप्यूटर नहीं है; यह मांस और बिजली का एक बहुत ही अकुशल (inefficient) जैविक इंजन है जो सूचनाओं को प्रोसेस करते समय भारी मात्रा में ‘कॉग्निटिव हीट’ उत्सर्जित करता है।

जब आप ‘मल्टीटास्किंग’ करने का नाटक करते हैं, तो आप वास्तव में काम नहीं कर रहे होते। यह वैसा ही है जैसे किसी भीड़भाड़ वाले ढाबे के रसोईघर में अचानक एक पूरी बारात खाना खाने आ जाए—कुकर की सीटियाँ बज रही हैं, पसीने से लथपथ वेटर एक-दूसरे से टकरा रहे हैं, तवे पर रोटियां जल रही हैं, और अंत में ग्राहक की थाली में जो पहुँचता है वह स्वादहीन, अधपकी खिचड़ी के अलावा कुछ नहीं होता। न्यूरोलॉजिकल स्तर पर, आप अपने न्यूरॉन्स को ‘थर्मल थ्रॉटलिंग’ (thermal throttling) की स्थिति में धकेल रहे हैं। यह वैसा ही है जैसे आप एक पुरानी मारुति ८०० को हाइवे पर १८० की रफ्तार पर चलाने की कोशिश करें—इंजन से भयानक आवाज आएगी, बोनट से काला धुआँ निकलेगा, पूरा ढांचा कांपने लगेगा, लेकिन आप पहुँचेंगे कहीं नहीं। हम जिसे ‘काम का दबाव’ कहते हैं, वह वास्तव में सूचनाओं का वह घर्षण है जो हमारे तंत्रिका तंत्र को पिघलाने लगता है। यह घर्षण उतना ही कष्टदायक है जितना कि दो नंबर छोटे, सस्ते औपचारिक जूतों में पूरे दिन पैदल चलना, जहाँ हर कदम पर आपकी एड़ी की त्वचा छिल रही हो और आप बस घर जाकर उन्हें उतारने का इंतजार कर रहे हों।

चाय चाहिए।

संक्रमण

यहाँ सिलिकॉन-आधारित अमूर्त बुद्धिमत्ता (जिसका नाम लेना अब एक क्लीशे बन चुका है) का वह मोड़ आता है जिसे लोग अक्सर समझ नहीं पाते। हम एक ऐसे युग में हैं जहाँ सूचनाओं का ‘फेज ट्रांजिशन’ (phase transition) हो रहा है। जैसे बर्फ पिघलकर पानी बनती है और फिर भाप, वैसे ही डेटा अब ‘ठोस’ फाइलों से ‘गैस’ की तरह सर्वव्यापी, स्वचालित गणनाओं में बदल रहा है। यह अब मानवीय श्रम के बारे में नहीं है, बल्कि उस ‘बौद्धिक अधिशेष ऊर्जा’ (intellectual surplus energy) के बारे में है जो मशीनें हमारे लिए छोड़ रही हैं।

लेकिन इस अधिशेष का आप क्या करते हैं? एक औसत कॉरपोरेट कर्मचारी इस खाली समय से डरता है। जब स्वचालित एल्गोरिदम सूचनाओं को पुनर्गठित करते हैं, तो वे वास्तव में आपके लिए व्यवस्था (negentropy) पैदा कर रहे होते हैं। लेकिन इंसान का असुरक्षित स्वभाव देखिए—हमें लगता है कि अगर हम कीबोर्ड पर उंगलियां नहीं पटक रहे हैं, तो हम बेकार हैं। इस अस्तित्वगत सन्नाटे को दबाने के लिए, लोग अब बाज़ार में जाकर ऐसे अजीबोगरीब महंगे नॉइज़-कैंसलिंग हेडफ़ोन खरीदने लगे हैं जिनकी कीमत एक पुराने स्कूटर के बराबर है। सोचिए, सिर्फ दुनिया को म्यूट करने के लिए इतनी भारी कीमत चुकाना? यह वैसा ही है जैसे कोई अमीर आदमी अपनी भूख मिटाने के लिए सोने का वर्क चढ़ा हुआ बासी खाना खाए। यह एक प्रकार का मानसिक दिवालियापन है, जहाँ आप अपनी आंतरिक शांति का सौदा एक प्लास्टिक के गैजेट से करते हैं जो हर दो साल में खराब हो जाएगा।

पागलपन है यह।

शेष

जब सिलिकॉन की शक्ति सूचनाओं के पहाड़ों को एक सुसंगत ढांचे में बदल देती है, तो वह वास्तव में एक ‘ऊष्मीय पंप’ (heat pump) की तरह काम करता है। वह आपके कार्यक्षेत्र से जटिलता की गर्मी को बाहर निकालकर ब्रह्मांड में फेंक देता है। अब सवाल यह उठता है कि उस बचे हुए ठंडे, शांत स्थान में आप क्या करेंगे?

सिद्धांत रूप में, यह वह समय है जब ‘शुद्ध विचार’ या दर्शन का जन्म होना चाहिए। लेकिन वास्तविकता यह है कि हम उस बची हुई ऊर्जा का उपयोग ‘डिजिटल जुगाड़’ में कर देते हैं। हम उन उपकरणों के गुलाम बन गए हैं जो हमें स्वतंत्र करने के लिए बनाए गए थे। एक साधारण से ईमेल का जवाब देने के लिए, हम अब हजारों रुपयों के मैकेनिकल कीबोर्ड का उपयोग करते हैं, जिनमें रंग-बिरंगी बत्तियाँ जलती हैं। हम खुद को यह समझाते हैं कि उन ‘चेरी एमएक्स’ स्विचों की ‘क्लिक-क्लाक’ आवाज से हमारी औसत दर्जे की सोच किसी महान साहित्य में बदल जाएगी। क्या आपको वाकई लगता है कि ३०,००० रुपये के प्लास्टिक और स्प्रिंग के टुकड़ों को दबाने से आपके दिमाग की वायरिंग में कोई क्रांतिकारी बदलाव आएगा? यह आधुनिक युग का कर्मकांड है, जहाँ हम औजारों की पूजा करते हैं क्योंकि हम अपने शिल्प को भूल चुके हैं।

काम करना ऊर्जा का रूपांतरण है, लेकिन अगर आउटपुट केवल और अधिक व्यर्थ का काम पैदा करना है, तो यह एक बंद लूप है जो अंततः सिस्टम को जला देगा। ऊष्मागतिकी के नियमों को आपकी समय सीमा या बोनस की परवाह नहीं है। ब्रह्मांड को बस इस बात से मतलब है कि इस प्रक्रिया में कितनी गर्मी पैदा हुई और कितनी ऊर्जा बर्बाद हुई। और यकीन मानिए, हम बहुत गर्मी पैदा कर रहे हैं।

मुझे घर जाना है।

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