श्रम की ज्यामिति

श्रम की ज्यामिति और वह बासी समोसा

जब मैं किसी सरकारी कार्यालय की उस अंतहीन कतार में खड़ा होता हूँ, जहाँ समय की गति सापेक्षता के सिद्धांत (Theory of Relativity) को भी मात दे देती है, तो मुझे ‘लोक कल्याण’ शब्द किसी सस्ते, सड़क किनारे बिकने वाले, रद्दी तेल में तले हुए पकौड़े जैसा प्रतीत होता है। लोग कहते हैं कि श्रम से राष्ट्र का निर्माण होता है। क्या सच में? एक अकादमिक दृष्टि से—और एक बेहद थके हुए इंसान के नजरिए से—यह सब सांख्यिकी (Statistics) का एक क्रूर मजाक है। हम जिसे ‘करियर’ या ‘सार्वजनिक सेवा’ कहते हैं, वह सूचना ज्यामिति (Information Geometry) के एक विशाल, अदृश्य मैनिफोल्ड पर रेंगते हुए कुछ नगण्य बिंदुओं के अलावा और कुछ नहीं है। हम बस एक वितरण (distribution) से दूसरे वितरण की ओर खिसक रहे हैं, और इस निरर्थक विस्थापन को हमने ‘प्रगति’ का नाम दे रखा है।

माया और एन्ट्रापी का खेल

मजदूरी और उद्यम का यह पूरा ढांचा एक ऐसी सड़न पर टिका है, जिसे हम ‘अर्थशास्त्र’ का नाम देकर पवित्र बना देते हैं। आप सुबह उठते हैं, भीड़ भरे ट्रैफिक में अपने जीवन के अमूल्य घंटे जलाते हैं, और एक क्यूबिकल में बैठकर एन्ट्रापी (Entropy) बढ़ाते हैं। भौतिकी की दृष्टि से, आपके आठ घंटे की मेहनत ब्रह्मांड में अव्यवस्था को बढ़ाने के सिवा कुछ नहीं करती। इसे ऐसे समझिए जैसे किसी ठेले वाले से गोलगप्पा खाना। वह पानी भरता है, आप घटक जाते हैं, और परिणाम? क्षणिक स्वाद और दीर्घकालिक पेट दर्द। श्रम भी बिल्कुल वैसा ही है। हम जो ‘सार्वजनिक मूल्य’ पैदा करने का दावा करते हैं, वह वास्तव में फिशर इंफॉर्मेशन मेट्रिक (Fisher Information Metric) के माध्यम से मापी गई एक सांख्यिकीय विकृति है। हम शोर (Noise) को कम करने का नाटक करते हैं, जबकि हम खुद सबसे बड़ा शोर हैं।

वक्रता और दिखावा

सूचना ज्यामिति में, श्रम को एक सांख्यिकीय मैनिफोल्ड पर ‘जियोडेसिक’ (Geodesic) या न्यूनतम दूरी वाले पथ के रूप में देखा जा सकता है। लेकिन भारतीय संदर्भ में, यह पथ कभी सीधा नहीं होता। यहाँ ‘दक्षता’ का मतलब है—कितनी सफाई से आप काम को टाल सकते हैं। यह पूरा सिस्टम ‘जुगाड़’ की वक्रता (Curvature) पर चलता है। जब एक अधिकारी किसी फाइल पर हस्ताक्षर करता है, तो वह सिर्फ़ स्याही नहीं खर्च कर रहा होता; वह अपने उस भ्रम को पोषण दे रहा होता है कि उसका अस्तित्व मायने रखता है।

जरा उनकी मेज पर नजर डालिए। वहां रखा वह महंगा फाउंटेन पेन, जिसकी कीमत शायद एक प्राथमिक विद्यालय के शिक्षक की महीने भर की तनख्वाह के बराबर होगी, इस पूरे प्रपंच का प्रतीक है। क्या उस रेजिन और सोने की निब से लिखे गए शब्द, उस दस रुपये के बॉलपेन से लिखे गए शब्दों से ज्यादा सत्य हैं? बिल्कुल नहीं। यह पेन, वह एर्गोनोमिक कुर्सी, वह चमड़े की डायरी—ये सब उस खोखलेपन को भरने के महंगे प्रयास हैं जो उनकी आत्मा में घर कर गया है। यह विडंबना ही है कि हम अपनी बौद्धिक दरिद्रता को छिपाने के लिए वस्तुओं की चमक का सहारा लेते हैं। कितना बेवकूफ है यह सब।

अनुकूलन और इंसानी ‘बग’

भविष्य की बात करें तो मुझे हंसी आती है जब लोग एआई (AI) से डरते हैं। एआई एजेंटों का उदय इस ‘श्रम की ज्यामिति’ को पूरी तरह से चपटा और सपाट कर देगा, और यह अच्छी बात है। उनके लिए कोई ‘सार्वजनिक भावना’ नहीं होती, केवल अनुकूलन (Optimization) होता है। इंसान, अपने स्वभाव से ही, सिस्टम में एक ‘बग’ (Bug) की तरह है। हमारी भावनाएं, हमारी थकान, हमारी चाय की तलब—ये सब थर्मोडायनामिक नुकसान हैं।

जब एक एआई एजेंट सार्वजनिक संसाधनों का वितरण करेगा, तो वह ‘करुणा’ या ‘दया’ जैसे भारी शब्दों के बोझ तले नहीं दबेगा। वह केवल कुल्बैक-लीबलर डाइवर्जेंस (Kullback-Leibler divergence) को न्यूनतम करेगा। यह ठंडा है, यह क्रूर है, और यह बेहद सटीक है। हम इंसान सिर्फ इसलिए प्रासंगिक महसूस करते हैं क्योंकि हमें लगता है कि हमारे ‘पसीने’ की कोई कीमत है। लेकिन सच तो यह है कि ब्रह्मांड को आपकी मेहनत की गंध से कोई लेना-देना नहीं है। आप केवल एक बैटरी की तरह हैं जो धीरे-धीरे डिस्चार्ज हो रही है, और आपकी हर हरकत, हर आंदोलन, उस चार्ज को खत्म करने का एक और तरीका है। तर्क की पराकाष्ठा यह नहीं है कि हम काम को बेहतर बनाएं, बल्कि यह स्वीकार करना है कि यह सब एक विशाल डेटा सेट में एक ‘आउटलायर’ (outlier) होने की असफल कोशिश है। घर जाना चाहता हूँ, पर अभी तो लंच ब्रेक खत्म होने में भी पंद्रह मिनट बाकी हैं।

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