संज्ञानात्मक घर्षण

कचरा और ज्यामिति

डिजिटल दुनिया के ये तथाकथित ‘नोमैड्स’ और ‘हसलर्स’—जो स्टारबक्स की सस्ती कॉफी को अमृत समझकर पीते हैं—असल में डेटा के कूड़ेदान के चौकीदार हैं। हम सब एक ऐसे भ्रम में जी रहे हैं जहाँ ‘व्यस्त होना’ और ‘महत्वपूर्ण होना’ एक ही सिक्के के दो पहलू मान लिए गए हैं। सुबह की शुरुआत उस मनहूस टू-डू लिस्ट (To-Do List) को घूरने से होती है, जो काम का नहीं, बल्कि हमारी मानसिक ‘उधारी’ का बही-खाता है।

इस मजदूरी को अगर हम थोड़ी देर के लिए समाजशास्त्र के रटे-रटाए जुमलों से बाहर निकालें और सूचना ज्यामिति (Information Geometry) के ठंडे और निर्दयी लेंस से देखें, तो एक भयानक सच सामने आता है। हमारा दिमाग किसी सपाट मेज पर काम नहीं कर रहा। यह ‘टास्क स्पेस’ (Task Space) के एक ऊबड़-खाबड़ और विकृत ‘मैनिफोल्ड’ (Manifold) पर रेंग रहा है। यहाँ एक ईमेल से एक्सेल शीट पर जाना, और फिर वहाँ से किसी क्लाइंट की बकवास सुनने के लिए ज़ूम पर स्विच करना—यह केवल ‘विंडो’ बदलना नहीं है। यह उस मैनिफोल्ड पर मीलों का सफर तय करना है। यह अनुभव वैसा ही है जैसे ठंडे हो चुके, तेल में लथपथ समोसे को बिना चटनी के जबरदस्ती हलक से नीचे उतारना—रूखा, कष्टदायक और पूरी तरह से अनावश्यक।

फिशर का अभिशाप

मूर्खता की पराकाष्ठा देखिये, लोग ‘मल्टीटास्किंग’ को एक कौशल (Skill) मानते हैं। यह कौशल नहीं, न्यूरॉन्स का सामूहिक आत्मदाह है। हमारे संज्ञान (Cognition) का नक्शा यूक्लिडियन (Euclidean) नहीं है, जहाँ दो बिंदुओं के बीच की सबसे छोटी दूरी एक सीधी रेखा हो। यहाँ राज चलता है ‘फिशर सूचना मीट्रिक’ (Fisher Information Metric) का। यह मीट्रिक उन सांख्यिकीय दूरियों को मापता है जो हमारे दिमाग को एक संदर्भ (Context) से दूसरे संदर्भ में जाने के लिए तय करनी पड़ती हैं।

जब आपका बॉस अचानक ‘अर्जेंट’ का टैग लगाकर कोई बेतुका काम थोपता है, तो वह आपके कार्य-स्थान की ज्यामिति को मोड़ देता है। आप शारीरिक रूप से अपनी कुर्सी पर स्थिर हैं, लेकिन मानसिक रूप से, फिशर मीट्रिक के अनुसार, आप एक ही पल में कई प्रकाश-वर्ष की यात्रा कर रहे होते हैं। इस घर्षण से पैदा होने वाली गर्मी ही वह चीज़ है जिसे आप शाम को ‘थकान’ कहते हैं। यह वैसी ही स्थिति है जैसे फुटपाथ पर बिकने वाला कोई सस्ता चाइनीज मोबाइल फोन, जो दो भारी ऐप्स खोलते ही गर्म होकर फूलने लगता है। आपका दिमाग वह बैटरी है, और यह कॉर्पोरेट कल्चर वह ऐप है जो उसे विस्फोट के कगार पर ले आया है।

इस तबाही को रोकने के लिए, हम बाज़ार के झांसे में आ जाते हैं। हम सोचते हैं कि अगर हम एक महंगी एर्गोनोमिक कुर्सी खरीद लेंगे, तो शायद यह पीड़ा कम हो जाएगी। यह हास्यास्पद है। वह कुर्सी केवल एक आरामदायक ‘फांसी का फंदा’ है। रीढ़ की हड्डी सीधी कर लेने से दिमाग की विकृत ज्यामिति सीधी नहीं हो जाती। आप मखमल पर बैठकर भी उसी नर्क की यात्रा कर रहे हैं, बस अब आपकी जेब थोड़ी हल्की हो गई है।

न्यूनतम प्रयास का गणित

जिसे दुनिया ‘वर्कफ़्लो ऑप्टिमाइज़ेशन’ कहती है, वह असल में ‘आत्महत्या को कुशलता से अंजाम देने’ की कला है। विज्ञान की भाषा में कहें तो, हमें इस मैनिफोल्ड पर ‘जियोडेसिक’ (Geodesic)—यानी न्यूनतम दूरी वाला रास्ता—खोजना होता है। यह कोई रचनात्मक प्रक्रिया नहीं है। यह एक कंजूस की तरह जीने जैसा है, जो ढाबे पर सबसे सस्ती थाली ऑर्डर करता है और फिर सब्जी और रोटी का अनुपात ऐसे सेट करता है कि आखिरी निवाले तक कुछ न बचे।

हमें अपने कार्यों को ऐसे क्रम में लगाना चाहिए कि फिशर मीट्रिक के तहत उनके बीच की ‘सूचनात्मक दूरी’ (Informational Distance) शून्य के करीब हो। भावनाओं को मार दीजिये। उत्साह को कचरे में फेंक दीजिये। केवल यांत्रिक दक्षता ही आपको इस घर्षण से बचा सकती है। ‘सफलता’ का मतलब शिखर पर पहुँचना नहीं है, बल्कि इस बात का हिसाब रखना है कि आप खुद को कितना कम घिस सकते हैं। एंट्रॉपी (Entropy) बढ़ रही है, और हम केवल उस गर्मी में जलने का इंतज़ार कर रहे हैं।

शराब का स्वाद भी कड़वा लग रहा है। बकवास बंद करो।

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