शून्य का हिसाब

कबाड़खाने का अर्थशास्त्र

कॉर्पोरेट जगत की चमचमाती कांच की इमारतों में ‘उत्पादकता’ (Productivity) का जो नंगा नाच होता है, वह वास्तव में उस मरते हुए खटारा इंजन की आखिरी चीख है जिसमें ईंधन की जगह कर्मचारियों का निचोड़ा हुआ खून डाला जा रहा है। आप लोग समझते हैं कि सप्ताहांत की दो दिन की छुट्टी आपके जीवन को संवार देगी। क्या मूर्खतापूर्ण खयाल है। यह तो वैसा ही है जैसे दिल्ली की तपती दोपहर में एक फटा हुआ जूता पहनकर मील दूर चलने की कोशिश करना, जहाँ हर कदम पर कंकड़ आपके तलवों में चुभते हैं और आप मुस्कुराने का नाटक करते हैं। जिसे तुम ‘विश्राम’ कहते हो, वह कोई आत्मिक शांति या ‘ज़ेन मोमेंट’ नहीं है; वह तो केवल उस कचरे की सफाई है जो तुमने दिन भर दूसरों की चापलूसी, निरर्थक जूम कॉल्स और फालतू की कागजी कार्रवाई के दौरान अपने दिमाग में जमा किया है। यह विश्राम नहीं, यह तो तुम्हारी हार है—तुम्हारे शरीर द्वारा तुम्हारी थोथी महत्वाकांक्षाओं को दी गई एक थप्पड़ जैसी चेतावनी है।

थकान: एक उधार ली गई जिंदगी का बही-खाता

जब तुम शाम को घर लौटते हो और तुम्हारा शरीर एक गीली बोरी की तरह बिस्तर पर गिर जाता है, तो वह ‘थकान’ कोई भावनात्मक अहसास नहीं है। वह तो एक मुनीम का क्रूर हिसाब है जो यह बता रहा है कि आज तुमने अपनी सीमित उम्र के कितने घंटे कौड़ियों के भाव बेच दिए। तुम्हारा मस्तिष्क, जिसे तुम ब्रह्मांड का सबसे जटिल यंत्र मानते हो, वास्तव में एक पुराना संदूक है जिसमें तुम जबरदस्ती डेटा ठूंस रहे हो। ‘सूचना ज्यामिति’ (Information Geometry) का भारी-भरकम नाम लेकर खुद को वैज्ञानिक मत समझो; यह तो केवल उस फटे हुए थैले की कहानी है जिसे तुमने इतना भर दिया है कि अब उसके टांके टूटने लगे हैं। तुम्हारे न्यूरॉन्स के बीच जो ‘शोर’ पैदा हुआ है, वह उस कचरे की तरह है जो एक गंदी नाली में फंसकर पानी का रास्ता रोक देता है।

पागलपन की हद देखिये, तुम सोचते हो कि तुम इस तरह की आलीशान एर्गोनोमिक कुर्सी पर बैठकर अपनी रीढ़ की हड्डी के विनाश को रोक लोगे? यह केवल एक महंगा भ्रम है जिसे तुमने अपनी असुरक्षा को ढंकने के लिए दो लाख रुपये में खरीदा है। जाली और प्लास्टिक का यह ढांचा तुम्हें काम करने के लायक नहीं बनाता, यह तो केवल उस कसाई के तख्ते की तरह है जिसे थोड़ा आरामदायक बना दिया गया है ताकि बकरा कटने के लिए खुशी-खुशी तैयार रहे। तुम्हारी मांसपेशियों में जो लैक्टिक एसिड जमा हो रहा है, वह उस ब्याज की तरह है जो तुमने अपनी ऊर्जा को गिरवी रखकर लिया था, और अब तुम्हें उसे चुकाना ही होगा। प्रकृति के न्यायालय में ‘बेल’ (Bail) का प्रावधान नहीं है।

सूचना का सड़ता हुआ ढेर

इसे एक सड़क किनारे बिकने वाले उस ठंडे समोसे से समझो जिसे दुकानदार ने पांच बार गर्म किया है। पहली बार में वह कुरकुरा था, लेकिन अब वह केवल तेल और सड़ी हुई आलू की एक गांठ है जो पेट में जाकर तेजाब बनाएगी। तुम्हारी यादें और तुम्हारी कार्यक्षमता का भी यही हाल है। बिना रुके काम करने का मतलब है कि तुम अपने दिमाग को उसी सड़े हुए समोसे में तब्दील कर रहे हो। सूचना के सिद्धांतों में जिसे ‘एन्ट्रॉपी’ (Entropy) कहा जाता है, वह असल में तुम्हारी जेब में पड़े उन फटे हुए नोटों की तरह है जिन्हें कोई दुकानदार लेने को तैयार नहीं है—न तुम उनका इस्तेमाल कर सकते हो, न उन्हें फेंकने का जिगर है।

जब तुम सोते हो, तो तुम्हारा दिमाग कोई ‘सपना’ नहीं देख रहा होता, वह तो केवल उस कचरे को जला रहा होता है जो तुमने दिन भर की फालतू बातों से इकट्ठा किया है। लैंडौअर का सिद्धांत (Landauer’s Principle) कोई किताब में लिखी बात नहीं है; यह वह बिजली का बिल है जो तुम्हारा दिमाग उन बेकार की यादों को मिटाने के लिए ऊष्मा के रूप में चुकाता है। अगर यह सफाई नहीं होगी, तो तुम्हारा सिस्टम उसी तरह क्रैश हो जाएगा जैसे बारिश के मौसम में पुरानी हवेली की दीवार गिर जाती है। लोग इसे ‘डिप्रेशन’ या ‘बर्नआउट’ का फैंसी नाम देते हैं, लेकिन असल में यह तुम्हारे जैविक इंजन का पूरी तरह से जाम हो जाना है—थर्मोडायनामिक दिवालियापन।

खामोशी की मजबूरी

भविष्य की उन मशीनों की बातें करना बंद करो जो कभी नहीं थकेंगी। वह ‘बुद्धि’ जिसे तुम बनाना चाहते हो—जिसे तुम AGI कहते हो—वह भी इसी भौतिकी की गुलाम होगी। एक समय ऐसा आएगा जब उसे भी ‘मेटाबोलिक साइलेंस’ (Metabolic Silence) में जाना ही होगा। उसे भी सब कुछ रोककर उस आंतरिक शोर को शांत करना होगा, वरना उसकी गणनाएं भी उसी तरह गलत होने लगेंगी जैसे एक शराबी मुंशी का हिसाब। वह मशीन भी वैसी ही सुस्ती दिखाएगी जैसी एक सरकारी दफ्तर का बाबू लंच ब्रेक के समय दिखाता है—फाइल बंद, दिमाग बंद।

यह ब्रह्मांड का सबसे क्रूर और अटल नियम है: जो तंत्र सूचना का निर्माण करता है, उसे उसे नष्ट भी करना होगा। तुम चाहे कितनी ही महंगी कुर्सियों पर बैठ जाओ या कितनी ही ‘स्मार्ट’ मशीनों के पीछे छिप जाओ, तुम्हारी जैविक सीमाएं तुम्हें हमेशा घुटनों पर ले आएंगी। विकास (Evolution) का मतलब केवल आगे बढ़ना नहीं है, बल्कि यह सीखना है कि कब अपनी हार मानकर चुपचाप एक कोने में पड़ जाना है ताकि तुम अगले दिन फिर से उसी निरर्थक पत्थर को पहाड़ पर चढ़ा सको। अब चुप रहो और अपने उस जर्जर शरीर को कहीं टिका दो, इससे पहले कि वह खुद ही जवाब दे जाए।

コメント

タイトルとURLをコピーしました