ये कॉर्पोरेट जगत के कथित ‘महारथी’ जो ‘शांति’ और ‘स्थिरता’ का राग अलापते हैं, वे असल में एक ऐसी लाश को सजा रहे हैं जिसमें कीड़े पड़ चुके हैं। भौतिकी के भारी-भरकम शब्दों के पीछे छिपना बंद करो। सच तो यह है कि तुम्हारा ऑफिस एक सड़ता हुआ कूड़ादान है जिसे ‘मैनेजमेंट’ की खुशबू से ढकने की कोशिश की जा रही है। जिस दिन तुम्हारे व्यापार में ‘हलचल’ बंद हुई, समझ लेना कि एन्ट्रापी (Entropy) ने तुम्हारी गर्दन दबोच ली है। यह ‘शांति’ नहीं, यह उस ठंडी राख की आहट है जो तब बचती है जब चूल्हा बुझ जाता है।
सड़न का गणित
एक दफ्तर क्या है? यह केवल उन लोगों का जमावड़ा है जो सुबह की बासी चाय और बस की धक्का-मुक्की से बचकर एक ऐसी जगह घुसना चाहते हैं जहाँ एयरकंडीशनर की ठंडी हवा उनकी नाकामी को सुखा सके। तुम जिसे ‘संगठन’ कहते हो, वह असल में एक ‘डिसिपेटिव स्ट्रक्चर’ (Dissipative Structure) है—एक ऐसी चीज़ जो केवल तभी तक बनी रहती है जब तक वह बाहर से ऊर्जा (यानी तुम्हारा खून और पसीना) चूसती रहती है। यह मुम्बई के उस वड़ा-पाव स्टॉल जैसा है जहाँ तेल इतना काला हो चुका है कि वह इंजन ऑयल जैसा दिखता है, फिर भी लोग लाइन में खड़े हैं क्योंकि ‘व्यवस्था’ का भ्रम पालना उनकी मजबूरी है।
सूचना ज्यामिति की बातें करना बंद करो। असलियत यह है कि जितनी अधिक फाइलें तुम बनाते हो, उतनी ही अधिक ‘गर्मी’ पैदा होती है—वह गुस्सा जो तुम शाम को अपने परिवार पर निकालते हो। तुम्हारा बॉस जो ‘सिनर्जी’ का उपदेश देता है, वह असल में अपनी जेब भरने के लिए तुम्हारे दिमाग के न्यूरॉन्स को ईंधन की तरह इस्तेमाल कर रहा है। वह तुम्हें बताता है कि तुम एक ‘मिशन’ पर हो, जबकि असल में तुम सिर्फ एक ऐसी मशीन के पुर्जे हो जो बिना तेल के चीख रही है।
जेब खाली, पेट भारी
गैर-संतुलन उष्मागतिकी (Non-equilibrium thermodynamics) का असली मतलब समझना है? तो महीने की 25 तारीख को अपना बैंक बैलेंस देखो। वह जो खालीपन का एहसास है, वही असली एन्ट्रापी है। एक व्यापार को जीवित रहने के लिए लगातार ‘नेगेंट्रोपी’ चाहिए, जो कि और कुछ नहीं, बस दूसरों की जेब से निकाला गया पैसा है। तुम पूंजी का उपभोग करते हो और बदले में क्या देते हो? मानसिक तनाव, उच्च रक्तचाप और वो फिजूल की प्रेजेंटेशन जो कोई नहीं देखता।
और इस सब के बीच, तुम्हारी रीढ़ की हड्डी जो एक पुराने रबर बैंड की तरह ढीली हो चुकी है, उसे सहारा देने के लिए तुम क्या करते हो? तुम लाखों खर्च करके एक आलीशान एर्गोनोमिक चमड़े की कुर्सी खरीदते हो। यह कुर्सी उस मखमली ताबूत की तरह है जिसमें तुम अपनी थकान को दफनाते हो। ढाई लाख की कुर्सी पर बैठकर भी अगर तुम्हें वही सड़ी हुई एक्सेल शीट देखनी है और वही बेवकूफी भरी मीटिंग्स अटेंड करनी हैं, तो तुम केवल एक महंगे कचरे के ढेर पर बैठे राजा हो। तुम इस कुर्सी को ‘इन्वेस्टमेंट’ कहते हो, जबकि यह सिर्फ तुम्हारी शारीरिक गिरावट को रोकने का एक महंगा और नाकाम जुगाड़ है। यह कुर्सी तुम्हें काम करने के लिए नहीं, बल्कि उस दर्द को सहने के लिए खरीदी गई है जो यह सिस्टम तुम्हें दे रहा है।
सन्नाटे की गूँज
अंत में कुछ नहीं बचता। जिसे तुम ‘सेल्फ-ऑर्गनाइजेशन’ कहते हो, वह असल में डूबते जहाज पर चूहों की भगदड़ है। जब सिस्टम इतना जटिल हो जाता है कि वह अपने ही बोझ से चरमराने लगता है, तो तुम उसे ‘पिवट’ या ‘रीस्ट्रक्चरिंग’ कहते हो। विज्ञान इसे मौत के करीब की छटपटाहट कहता है। तुम्हारे दफ्तर में जो ‘क्रिएटिव कैओस’ की बातें होती हैं, वे सिर्फ उन चीखों को दबाने का तरीका हैं जो तुम्हारी आत्मा से निकल रही हैं।
मानव संवेदनाएं जिसे ‘करियर ग्रोथ’ कहती हैं, वह असल में एक ढलान है। तुम जितनी तेजी से ऊपर भागने की कोशिश करते हो, उतनी ही तेजी से तुम अपनी मौलिकता खोते जाते हो। तनाव कोई उपलब्धि नहीं है, यह तुम्हारे शरीर का वो ‘हीट एक्सचेंज’ है जो तुम्हें बता रहा है कि तुम जल रहे हो। तुम्हारा बॉस जब तुम पर चिल्लाता है, तो वह कोई लीडरशिप नहीं दिखा रहा, वह बस उस सड़ांध को बाहर निकाल रहा है जो उसके भीतर जमा हो गई है।
चाय ठंडी हो चुकी है और उसमें एक मक्खी गिर गई है। बिल्कुल तुम्हारे करियर की तरह। यह पूरी नौटंकी—ब्रांडिंग, स्ट्रेटेजी, नेगेंट्रोपी—सिर्फ एक पर्दा है। हम सब उस ब्रह्मांडीय अंधेरे से डरे हुए बच्चे हैं जो अपनी ही परछाईं को देखकर उसे ‘विजन’ का नाम दे देते हैं। असल में, हम सिर्फ एक गरम समोसे की तरह हैं जो समय के साथ ठंडा और बेस्वाद हो रहा है, और उस समोसे को परोसने के लिए हमें एक सोने की थाली चाहिए। कितनी शर्मनाक बात है।

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