पिछले हफ्ते हमने उन डिजिटल हथकड़ियों की बात की थी जिन्हें दुनिया ‘प्रोडक्टिविटी ऐप्स’ कहती है। आज जरा उस घाव को और गहराई से कुरेदते हैं जिसे हम ‘मेहनत’ कहते हैं। ऑफिस से निकलकर जब आप लोकल ट्रेन या मेट्रो के धक्के खाते हुए सोचते हैं कि "आज मैंने पहाड़ तोड़ दिया", तो दरअसल आप एक बहुत बड़ी गलतफहमी का शिकार हैं। विज्ञान की रूखी आँखों से देखें, तो आपका यह तथाकथित ‘काम’ ब्रह्मांड के निर्दयी नियमों के खिलाफ एक भद्दी और नाकाम बगावत है। आप सृजन नहीं कर रहे, आप बस अपनी दोपहर की थाली को पसीने, कार्बन डाइऑक्साइड और कचरे में बदल रहे हैं।
पसीने का भौतिक विज्ञान
थर्मोडायनामिक्स (Thermodynamics) की एक क्रूर अवधारणा है—’डिसिपेटिव स्ट्रक्चर’ (Dissipative Structure)। आप, मैं, और वह कार्पोरेट टॉवर—सब इसी श्रेणी में आते हैं। हम व्यवस्था बनाए रखने के लिए ऊर्जा निगलते हैं और बदले में अराजकता (Entropy) उगलते हैं। एक साधारण ईमेल का जवाब देना या एक्सेल में रंग भरना, ऊर्जा का एक भव्य दुरुपयोग है। यह ठीक वैसा ही है जैसे एक मक्खी बंद कांच पर बार-बार सिर पटक रही हो—शोर बहुत है, गति भी है, लेकिन प्रगति शून्य है। यह ‘थकान’ कोई मेडल नहीं है, यह आपके जैविक सिस्टम के धीरे-धीरे सड़ने का संकेत है।
जिसे आप ‘मोटिवेशन’ या ‘जुनून’ कहते हैं, वह आपके न्यूरॉन्स के बीच होने वाला एक रासायनिक शॉर्ट-सर्किट है। यह एक ‘बग’ है जो आपको यह विश्वास दिलाता है कि ‘टू-डू लिस्ट’ पर टिक लगाने से दुनिया की एन्ट्रापी कम हो जाएगी। हकीकत यह है कि आप एक पुरानी, खटारा ऑटो-रिक्शा की तरह हैं; जितना ज़ोर से एक्सीलेटर दबाएंगे, उतना ही काला धुआं छोड़ेंगे और इंजन की उम्र कम करेंगे। विडंबना देखिए, इस धुएँ और बिखराव को छिपाने के लिए, हम अपनी कमर को 45,000 रुपये की एर्गोनोमिक कुर्सी पर टिका देते हैं। क्या वाकई आपको लगता है कि एक महंगा जालीदार कपड़ा और थोड़ा सा ‘लम्बर सपोर्ट’ आपके काम की निरर्थकता को कम कर देगा? यह रीढ़ की हड्डी को बचाने का प्रयास नहीं, बल्कि अपनी आत्मा के क्षय को आरामदायक बनाने का एक महंगा ढोंग है।
कचरे का नृत्य
कभी सोचा है कि ऑफिस में इतनी मीटिंग्स क्यों होती हैं? क्योंकि एक ‘आर्गेनाइजेशन’ (Organization) मूल रूप से एक अस्थिर बुलबुला है। अगर हलचल रुकी, तो बुलबुला फूट जाएगा और साम्यावस्था (Equilibrium)—यानी मृत्यु—आ जाएगी। इसलिए आपका मैनेजर आपको उन कमरों में घसीटता है जहाँ ठंडी हवा तो एसी से आती है, लेकिन चर्चाओं से केवल गर्म हवा निकलती है। यह काम नहीं है, यह सिस्टम को जबरदस्ती गर्म रखने का ‘जुगाड़’ है।
आजकल लोग ‘ऑटोमेशन’ या ‘स्मार्ट वर्क’ का गुणगान करते हैं। मैं इसे ‘आलस का औद्योगिकरण’ कहता हूँ। जब आप अपना काम किसी ‘स्वचालित प्रक्रिया’ पर थोपते हैं, तो आप अपनी कैलोरी तो बचा लेते हैं, लेकिन कहीं दूर किसी सर्वर फार्म में बिजली फूँक रहे होते हैं। सड़क किनारे बैठा वह मोची, जो प्लास्टिक की रस्सी से टूटी चप्पल सिल रहा है, वह आपसे कहीं ज्यादा ईमानदार है। वह एन्ट्रापी से लड़ नहीं रहा, वह उसके साथ समझौता कर रहा है। वह जानता है कि चीजें टूटेंगी। और हम? हम अपनी नश्वर योजनाओं को 8,000 रुपये के इस चमड़े की डायरी में कैद करने की कोशिश करते हैं। स्याही सूखने से पहले ही वे योजनाएं अप्रासंगिक हो जाती हैं, लेकिन इस महंगे कागज को खरीदने का नशा हमें यह झूठ बोलने पर मजबूर करता है कि हमारा जीवन नियंत्रण में है। सब बकवास है।
शून्य की ओर गिरती शाम
सूचना सिद्धांत (Information Theory) का कहना है कि जानकारी को प्रोसेस करने की भी एक भौतिक कीमत होती है। आपके दिमाग में जो ‘डेडलॉक्स’ और ‘डिलीवरेबल्स’ का कचरा भरा है, वह मानसिक कब्ज से कम नहीं है। यह शहर के उन नालों जैसा है जो मानसून की पहली बारिश में ही चोक हो जाते हैं, जिससे बदबू और सड़न फैलती है।
हर टास्क जिसे आप पूरा करते हैं, वह ब्रह्मांड को उसकी अंतिम, ठंडी मौत (Heat Death) के एक इंच और करीब धकेल देता है। आप व्यवस्था नहीं बना रहे, आप बस बिखराव की गति तेज कर रहे हैं। यदि आपमें थोड़ी भी बौद्धिक ईमानदारी बची है, तो ‘प्रोडक्टिव’ होने का नाटक बंद कीजिए। स्वीकार कर लीजिए कि आप एक सांख्यिकीय दुर्घटना (Statistical Accident) हैं जो कुछ समय के लिए ऑक्सीजन को कार्बन में बदल रहा है। अगली बार जब कोई ‘ग्रोथ’ की बात करे, तो उसे याद दिलाएं कि कैंसर की भी ग्रोथ ही होती है। बस करो यह तमाशा। बाहर निकलो, किसी टपरी पर चाय पियो और देखो कि कैसे दुनिया बिना किसी ‘प्रोजेक्ट मैनेजमेंट टूल’ के भी शानदार तरीके से बर्बाद हो रही है। अब और नहीं।

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