विश्राम का पाखंड

उत्पादकता का सड़ता हुआ भ्रम

आजकल की कॉर्पोरेट दुनिया ‘हसल’ (Hustle) के नाम पर जो तमाशा कर रही है, वह किसी सड़े हुए बासी खाने को ‘डिलीशियस’ कहने जैसा है। लोग चार घंटे सोने का गर्व ऐसे करते हैं जैसे उन्होंने कोई महान युद्ध जीत लिया हो, जबकि हकीकत में वे अपनी ही देह को किश्तों में बेच रहे हैं। यह कोई उपलब्धि नहीं, बल्कि अपनी जैविक ऊर्जा के खाते से लिया गया एक ऐसा कर्ज है जिसका ब्याज आपकी आसन्न मृत्यु चुकाएगी। हम श्रम को एक सीधी रेखा समझते हैं—जितना अधिक रगड़ोगे, उतना अधिक चमकेगा। लेकिन सच्चाई यह है कि यह एक फटी हुई जेब जैसा है; आप इसमें जितनी भी ‘कड़ी मेहनत’ का सिक्का डालें, वह नीचे से गिरकर नाली में चला जाता है। समाज ने हमें सिखाया है कि आराम करना पाप है, लेकिन वे यह भूल जाते हैं कि एक भूखा कुत्ता शिकार नहीं कर सकता, वह सिर्फ बेमतलब भौंक सकता है। आपकी यह ’24/7 उत्पादकता’ वास्तव में एक ऐसी फुलायी हुई गुब्बारे जैसी बैटरी है जो कभी भी आपके चेहरे पर फट सकती है और आपको तेजाब से नहला सकती है।

कितनी घिनौनी बात है।

कचरे का ढेर और ऊष्मीय पतन

यदि हम भौतिकी के भारी-भरकम और उबाऊ शब्दों को छोड़ दें, तो नींद का असली मतलब है—’सिंक में पड़े जूठे बर्तनों की सफाई’। दिन भर जब आप काम करते हैं, तो आपका दिमाग केवल महान विचार नहीं पैदा करता, बल्कि वह एक रासायनिक दुर्गंध और आणविक गंदगी भी छोड़ता है। ‘एन्ट्रॉपी’ का मतलब कोई वैज्ञानिक चमत्कार नहीं, बल्कि वह धूल है जो आपके कमरे के पंखे पर जम जाती है और अंततः उसे घुमाना बंद कर देती है। आप एक ऐसी मांसल मशीन हैं जो चलते-चलते खतरनाक हद तक गर्म हो रही है, और नींद वह समय है जब ब्रह्मांड आपको जबरदस्ती ठंडा करता है ताकि आप जलकर राख न हो जाएं।

अक्सर लोग सोचते हैं कि वे बाज़ार से एक आलीशान आरामदायक बिस्तर खरीदकर इस ऊष्मीय पतन को रोक लेंगे। यह वैसी ही मूर्खता है जैसे कि जलते हुए घर पर रेशमी पर्दा डाल देना। जब तक आपके मस्तिष्क की कोशिकाओं में जमा वह ‘मेटाबोलिक कचरा’ साफ नहीं होता, तब तक आपका वह लाखों का गद्दा भी आपको केवल एक ‘आरामदायक लाश’ ही बनाएगा। नींद कोई विलासिता नहीं, बल्कि उस गंदगी को बाहर निकालने की एक घिनौनी मजबूरी है जो आपको अंदर ही अंदर सड़ा रही है। यदि आप नहीं सोते, तो आप केवल अपने ही कचरे के ढेर पर बैठे एक ऐसे राजा हैं जिसका सिंहासन गल रहा है और प्रजा विद्रोह कर रही है。

सूचनाओं का कबाड़खाना और मानसिक दिवालियापन

अब जरा उस मानसिक अराजकता की बात करते हैं जिसे लोग ‘बौद्धिक क्षमता’ कहते हैं। आपके दिमाग में दिन भर जो सूचनाएँ घुसती हैं—वे फालतू ईमेल, सोशल मीडिया की जलन, और बॉस की बेवकूफी भरी बातें—वे किसी सुलझी हुई ज्यामिति का हिस्सा नहीं हैं। वे एक उलझे हुए बिजली के तारों के गुच्छे की तरह हैं, जहाँ हर तार दूसरे को शॉर्ट-सर्किट कर रहा है और चिंगारियां निकल रही हैं। आपका मस्तिष्क एक ऐसा नशे में धुत मुनीम है जो दिन भर गलत हिसाब लिखता है, और रात को जब आप बेहोश होते हैं, तो उसे उन फटे हुए पन्नों को जोड़कर फिर से हिसाब बराबर करना पड़ता है ताकि दुकान अगले दिन खुल सके।

यह प्रक्रिया ‘सूचना ज्यामिति’ जैसी किसी सुंदर चीज़ से कोसों दूर है; यह ‘बिखरे हुए सिक्कों को कीचड़ में से बीनने’ जैसी थकाऊ क्रिया है। जब आप सो रहे होते हैं, तो आपका दिमाग निर्ममता से यह तय करता है कि किस याद को रखना है और किसे नाली में फेंकना है। यह एक उच्च-आयामी मैनिफोल्ड पर भटकना नहीं है, बल्कि एक भीड़भाड़ वाले बाज़ार में खोए हुए अपने बटुए को खोजने जैसा हताश संघर्ष है। यदि यह ‘री-नॉर्मलाइजेशन’ न हो, तो अगले दिन आपका दिमाग एक ऐसे सस्ते ढाबे जैसा होगा जहाँ मक्खियाँ भिनभिना रही हैं और खाना खत्म हो चुका है। आप अपनी यादों के कबाड़खाने में दबकर मर जाएंगे। हर रात आपका सिस्टम खुद को रिबूट करता है, सिर्फ इसलिए ताकि आप अगले दिन फिर से वही बेवकूफियाँ दोहरा सकें जो आपने कल की थीं। यह कोई विकास नहीं है, यह सिर्फ एक पतन का स्थगन है।

कितनी नीचता है। मुझे घर जाना है।

अंततः, जिसे आप ‘ताज़गी’ या ‘पुनर्जीवन’ कहते हैं, वह वास्तव में आपकी हार का एक नया दिन है। हम हर रात अपनी यादों और अपनी पहचान का एक बड़ा हिस्सा कचरे में फेंक देते हैं ताकि जिंदा रह सकें। नींद कोई ‘मीठा सपना’ नहीं, बल्कि एक कड़वी सर्जरी है जो बिना एनेस्थीसिया के हर रात होती है। हम सब बस उस अनंत अंधेरे के सामने खड़े होकर कुछ और घंटों की भीख मांग रहे हैं, और इसे ‘रिकवरी’ कहना खुद को दिया गया सबसे बड़ा धोखा है। हम ऊष्मा के पुतले हैं जो पिघलने के इंतजार में कतार में खड़े हैं।

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