पिछली बार जब हम मिले थे, तो हमने इस बात पर थूका था कि कैसे ये आधुनिक कॉर्पोरेट दलाल तुम्हारी चेतना को एक इस्तेमाल की गई बैटरी की तरह चूसकर कूड़ेदान में फेंक देते हैं। लेकिन आज, इस सड़न को थोड़ा और करीब से, थोड़ा और बेरहमी से देखते हैं। जिसे तुम अपनी ‘प्रोफेशनल ग्रोथ’ या ‘अनुभव’ का नाम देते हो, वह असल में तुम्हारी खोपड़ी के भीतर हो रही एक गंदी और कभी न रुकने वाली रासायनिक दुर्घटना है। यह कोई गहरा दर्शनशास्त्र नहीं है, यह शुद्ध ऊष्मप्रवैगिकी (Thermodynamics) की वह क्रूर मार है जिसे तुम्हारा शरीर हर सेकंड झेल रहा है और हर सेकंड हार रहा है।
खोपड़ी की भट्टी और बासी समोसे
सोमवार की सुबह कॉन्फ्रेंस रूम में बैठकर ‘इनोवेशन’ और ‘सिनर्जी’ का नाटक करना ठीक वैसा ही है जैसे सड़क किनारे मिलने वाले उस तैलीय समोसे को फिर से ज़िंदा करने की कोशिश करना जो पिछले तीन दिनों से उसी काली कड़ाही में तैर रहा है। तुम उसे जितना गर्म करोगे, वह उतना ही सख्त, बेस्वाद और ज़हरीला होता जाएगा। जब तुम अपनी उन खोखली आँखों से एक्सेल शीट को घूरते हुए ‘आउट-ऑफ-द-बॉक्स’ सोचने की कोशिश करते हो, तो तुम्हारा दिमाग केवल डेटा प्रोसेस नहीं कर रहा होता; वह गर्मी पैदा कर रहा होता है। यह गर्मी कहीं गायब नहीं होती। यह तुम्हारे न्यूरॉन्स को वैसे ही झुलसा देती है जैसे पुरानी दिल्ली की जानलेवा उमस भरी दोपहर में एक सस्ता, चरमराहट करता हुआ पंखा चलते-चलते जल जाता है।
हर एक विचार जो तुम पैदा करते हो, वह मुफ्त में नहीं आता। उसके लिए तुम्हें अपनी जैविक उम्र की कुछ सेकंड्स की बलि देनी पड़ती है। जब तुम किसी क्लाइंट की बेतुकी मांगों को पूरा करने के लिए अपना सिर फोड़ते हो, तो वह केवल मानसिक थकान नहीं होती। वह तुम्हारे मस्तिष्क के भीतर जमा हुआ वह कचरा है जिसे तुम्हारी नसें अब और ढो नहीं सकतीं। यह बिल्कुल वैसा ही अहसास है जैसे महीने के आखिर में खाली बैंक अकाउंट को देखकर पेट में होने वाली वह तेजाबी जलन, जिसे तुम चाहकर भी ठंडे पानी से नहीं बुझा सकते। तुम्हारी तथाकथित बुद्धिमत्ता, दरअसल, तुम्हारी अपनी ही शारीरिक बर्बादी की रसीद है।
एन्ट्रॉपी का जिद्दी दाग
भौतिकी के ऊंचे और शुष्क सिद्धांतों को भाड़ में जाने दो, असलियत यह है कि ‘सोचना’ एक ऐसा कर्ज है जिसका ब्याज तुम अपनी मौत तक चुकाते रहोगे। एक बार जब तुमने कोई बात जान ली—मान लो कि तुम्हें यह समझ आ गया कि तुम्हारा पूरा करियर एक झूठ पर टिका है—तो तुम उस ज्ञान को ‘अन-जान’ नहीं कर सकते। यह दिमाग के उस सफेद लिनन के कुर्ते पर लगे हल्दी के जिद्दी दाग जैसा है। तुम इसे कितना भी रगड़ लो, कितना भी साबुन घिस लो, वह हल्का तो हो जाएगा लेकिन पूरी तरह कभी नहीं मिटेगा। वह दाग वहां हमेशा रहेगा, तुम्हारी मूर्खता की याद दिलाता हुआ।
मस्तिष्क की यह अपरिवर्तनीयता (Irreversibility) ही तुम्हारी सबसे बड़ी सजा है। तुम जो भी सोचते हो, वह तुम्हारे दिमाग के गियर्स को घिस देता है। जैसे-जैसे तुम्हारी उम्र बढ़ती है, तुम्हारे विचार वैसे ही सख्त और बदबूदार हो जाते हैं जैसे किसी पुराने ट्रक का टायर, जो अब सड़क पकड़ने के बजाय केवल कान फाड़ देने वाला शोर करता है। लोग इस घर्षण और घिसावट से बचने के लिए, अपनी कमर और अपने अहंकार को सहलाने के लिए, लाखों रुपये अपनी Herman Miller की सीट पर फेंक देते हैं। वे सोचते हैं कि उस मखमली गद्दी और एर्गोनोमिक डिज़ाइन पर बैठकर उनकी रीढ़ की हड्डी का दर्द और दिमाग की नसें फिर से नई हो जाएंगी। लेकिन कड़वा सच तो यह है कि उस डेढ़ लाख की कुर्सी पर बैठकर भी तुम उतने ही फालतू, सड़े हुए और बासी विचार पैदा कर रहे हो जितने कि तुम एक टूटे हुए प्लास्टिक के स्टूल पर बैठकर करते थे। पैसा खर्च करने से तुम्हारी एन्ट्रॉपी कम नहीं होती, बस तुम्हारी बर्बादी थोड़ी और आलीशान, थोड़ी और ‘ब्रांडेड’ हो जाती है।
सिस्टम की वह चर्मराहट
गलतफहमी में मत रहना, तुम्हारा मस्तिष्क कोई ‘सुपरकंप्यूटर’ नहीं है। यह तो बस मांस और बिजली से बनी एक ऐसी मशीन है जो धीरे-धीरे खुद को ही खा रही है। हर वह समाधान जो तुम ढूंढते हो, वह तुम्हारे तंत्रिका तंत्र पर एक नया जख्म, एक नया खरोंच छोड़ जाता है। जिसे तुम ‘मैच्योरिटी’ या ‘परिपक्वता’ कहते हो, वह असल में तुम्हारे दिमाग का वह हिस्सा है जो अब इतना घिस चुका है कि उसमें नया कुछ महसूस करने की ताकत ही नहीं बची। यह बिल्कुल उस पुराने स्मार्टफोन की बैटरी जैसा है जिसे तुम रात भर चार्ज करके 100% तो करते हो, लेकिन एक छोटी सी कॉल करते ही वह 20% पर आ गिरती है। तुम्हारा हार्डवेयर जवाब दे रहा है, और तुम मोटिवेशनल कोट्स पढ़कर उसका सॉफ्टवेयर अपडेट करने की नाकाम कोशिश कर रहे हो।
अंत में, तुम केवल विचारों के एक ऐसे मलबे में तब्दील हो जाओगे जो अपने ही वजन तले दबा होगा। यह कोई गौरवशाली अंत नहीं है, बल्कि एक सिस्टम की वह चर्मराहट है जो धीरे-धीरे खामोश हो रही है। और तुम इसे ‘सफलता’ कहते हो? मुझे अब और कुछ नहीं कहना। यहाँ की हवा में ही तुम्हारी थकान की गंध आ रही है। जाओ, अब अपनी उस महंगी कुर्सी पर जाकर अपनी बची-कुची ऊर्जा को किसी एक्सेल शीट पर कुर्बान करो। तुम इसके अलावा और कर ही क्या सकते हो?

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