विकृत ज्यामिति

पिछली बार जब हम उस सीलन भरे ढाबे के कोने में बैठकर सस्ती व्हिस्की के साथ दुनिया को सुधारने का ढोंग कर रहे थे, तभी मुझे आभास हो गया था कि तुम्हारी ‘सामाजिक चेतना’ की समझ उस नाली के रुके हुए पानी से अधिक गहरी नहीं है, जिसमें मच्छर और दर्शनशास्त्र दोनों एक साथ पनपते हैं। जिसे तुम और तुम्हारे जैसे बुद्धिजीवी ‘लोकहित’ (Public Interest) कहकर पूजते हैं, वह वास्तव में भावनाओं का कोई पवित्र संगम नहीं है। वह एक सांख्यिकीय मैनिफोल्ड (Statistical Manifold) पर फैला हुआ पसीने, लालच और अस्तित्वहीनता का एक गंदा धब्बा है।

पागलपन है ये सब।

भ्रम

जब तुम ‘लोकतंत्र’ या ‘सामूहिक निर्णय’ का राग अलापते हो, तो तुम वास्तव में उस भीड़ की भौतिकी का वर्णन कर रहे होते हो जो राशन की दुकान के बाहर एक मुट्ठी अनाज के लिए एक-दूसरे को रौंदने को तैयार है। यहाँ ‘स्वतंत्र इच्छा’ (Free Will) जैसा कुछ नहीं होता। यह भूख और भय के बीच झूलता हुआ एक गणितीय पेंडुलम है। तुम जिसे ‘जनमत’ कहते हो, वह न्यूरोसाइंस की दृष्टि से केवल लाखों भूखे न्यूरॉन्स का शोर है, जिसे हम ‘नैतिकता’ के सस्ते रैपर में लपेटकर बेचते हैं।

इस दुर्गंधपूर्ण शोर-शराबे और मानसिक प्रदूषण से खुद को बचाने के लिए, मैं अपनी मेज पर एक प्रीमियम फाउंटेन पेन रखता हूँ। जब इसकी निब कागज को छूती है, तो वह एक ऐसी ‘सच्चाई’ का निर्माण करती है जिसमें उस सड़क छाप भीड़ की बदबू नहीं होती। यह कोई विलासिता नहीं है; यह उस अराजकता के विरुद्ध मेरा व्यक्तिगत बंकर है। लोग ‘समानता’ के लिए चिल्ला रहे हैं, जबकि गणित यह स्पष्ट करता है कि समानता केवल ऊष्मागतिकी (Thermodynamics) की मृत्यु यानी ‘हीट डेथ’ में संभव है।

ज्यामिति

अब, यदि तुम्हारे भेजे में थोड़ी सी भी जगह बची है, तो इस सामाजिक कीचड़ को ‘सूचना ज्यामिति’ (Information Geometry) के सूक्ष्मदर्शी से देखो। समाज का ढांचा सपाट नहीं है; यह वक्र (Curved) है। यहाँ ‘फिशर सूचना’ (Fisher Information) वह पैमाना है जो मापता है कि सत्ता के गलियारों में फेरबदल करने पर आम आदमी की रीढ़ की हड्डी कितनी जल्दी टूटती है।

सोचो, बाज़ार में जब आटे की कीमत में एक रुपये का उछाल आता है, तो वह केवल एक आर्थिक आँकड़ा नहीं है। वह इस मैनिफोल्ड की वक्रता में आया वह हिंसक मोड़ है जो हज़ारों घरों के चूल्हों को ठंडा कर देता है। यही असली ज्यामिति है। एक सरकारी बाबू की मेज के नीचे सरकाई गई रिश्वत उस सांख्यिकीय स्थान (Statistical Space) को मोड़ देती है। पैसा वक्रता को सीधा कर देता है—अमीरों के लिए रास्ता छोटा और सुगम हो जाता है, जबकि गरीब उस वक्रता के गुरुत्वाकर्षण में फंसकर गोल-गोल घूमते रह जाते हैं। जिसे तुम ‘न्याय’ कहते हो, वह केवल एक ‘जियोडेसिक’ (Geodesic) है जिसे पैसे ने खरीद लिया है।

मुझे घर जाना है।

विरूपण

और अब उस अदृश्य राक्षस की बात करते हैं जिसे तुम अपनी जेब में लेकर घूमते हो। ये जो सिलिकॉन चिप्स पर चलने वाले ‘स्वचालित तार्किक तंत्र’ हैं, जिनका नाम लेना भी मैं अपनी जुबान खराब करना मानता हूँ, वे हमारी मदद नहीं कर रहे। वे उस धरातल को ही विकृत कर रहे हैं जिस पर समाज खड़ा है। ये गणनात्मक परजीवी (Computational Parasites) सूचना के मैनिफोल्ड को इस तरह मरोड़ते हैं कि तुम्हें केवल वही दिखाई दे जो तुम्हारे भीतर के जानवर को जगा सके।

यह कोई वैचारिक ध्रुवीकरण नहीं है; यह एक सुनियोजित गणितीय डकैती है। ये तंत्र जानते हैं कि ‘क्रोध’ सबसे अधिक डेटा उत्पन्न करता है, इसलिए वे ‘अनुमान वक्रता’ (Inference Curvature) को इतना तीखा कर देते हैं कि तुम शांति से सोच ही न सको। तुम एक ऐसे डिजिटल बूचड़खाने में खड़े हो जहाँ तुम्हारी चेतना को बाइट्स में तोलकर विज्ञापनदाताओं को बेचा जा रहा है। घर्षण (Entropy) को खत्म कर दिया गया है ताकि तुम बिना किसी अवरोध के उस गड्ढे में गिर सको जिसे ‘ट्रेंड’ कहा जाता है।

तुम इस वधशाला की दीवारों पर पुती सफेदी को ‘प्रगति’ कह रहे हो।

बकवास, सब बकवास। मेरी चाय ठंडी हो गई।

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