पिछली बार जब हमने ‘समय प्रबंधन’ के उस खोखले नाटक पर चर्चा की थी, तो मुझे लगा था कि शायद आप इस चूहा-दौड़ से बाहर निकलने की हिम्मत जुटा पाएंगे। लेकिन नहीं, आप अभी भी उसी ‘टू-डू लिस्ट’ को किसी ताबीज की तरह गले में लटकाए फिर रहे हैं, जैसे कि चंद और फालतू कामों को निपटाने से आपकी ज़िंदगी की कड़वाहट कम हो जाएगी। यह कॉर्पोरेट दुनिया का सबसे बड़ा झूठ है—यह विचार कि ‘उत्पादकता’ कोई सम्मानजनक चीज़ है। सच तो यह है कि आपका अस्तित्व केवल कचरा पैदा करने वाली एक जैविक मशीन है, और आपका काम? वह बस उस कचरे को करीने से सजाने की एक असफल कोशिश है।
सड़ांध और व्यवस्था का भ्रम
जिसे नोबेल विजेता इल्या प्रिगोगिन ‘विसरित संरचनाएं’ (Dissipative Structures) कहते हैं, उसे अगर मैं अपनी भाषा में समझाऊं, तो वह आपकी मेज है जिस पर बासी चाय के कप और अनपेड बिलों का ढेर लगा है। आप एक खुले तंत्र (Open System) हैं, जिसका सीधा सा मतलब है कि आप बाहर से पिज्जा, कैफीन और झूठी उम्मीदें ठूँसते हैं ताकि आपके अंदर की अराजकता (Entropy) को ‘काम’ के नाम पर बाहर निकाल सकें। आपकी वह जटिल एक्सेल शीट, जिसे आप गर्व से देख रहे हैं, वास्तव में आपके मस्तिष्क की नसों में जल रही ग्लूकोज का धुआं मात्र है।
थर्मोडायनामिक्स का दूसरा नियम यह नहीं कहता कि आप सफल होंगे; वह चीख-चीख कर कहता है कि आप जितनी अधिक व्यवस्था बनाने की कोशिश करेंगे, आपका कमरा उतना ही अधिक महकेगा, आपकी पीठ उतनी ही अधिक अकड़ेगी और आपका बैंक बैलेंस उतनी ही तेज़ी से शून्य की ओर बढ़ेगा। आप व्यवस्था नहीं बना रहे, आप बस ब्रह्मांड की गर्मी बढ़ा रहे हैं। यह सब एक बंद नाले की तरह है। आप जितना अधिक ‘फोकस’ का दबाव डालेंगे, गंदगी उतनी ही जोर से आपके चेहरे पर वापस आएगी। जिसे आप ‘कठिन परिश्रम’ कहते हैं, वह वास्तव में आपके शरीर द्वारा खुद को नष्ट करने की प्रक्रिया है ताकि कंपनी के सर्वर पर कुछ बाइट्स का डेटा बढ़ सके। क्या आपको सच में लगता है कि इस विराट ब्रह्मांड को आपकी ‘प्रोजेक्ट रिपोर्ट’ की रत्ती भर भी परवाह है?
जलता हुआ समोसा और खाली जेब
इसे ज़रा ज़मीन पर आकर समझते हैं। सड़क किनारे की उस दुकान पर जाइए जहाँ पुराने तेल में समोसे तले जा रहे हैं। वह खौलता हुआ काला तेल आपका कॉर्पोरेट कल्चर है और आप उसमें तैरता हुआ मैदा। यदि आँच (Deadline) बहुत तेज़ है, तो आप उस समोसे की तरह बाहर से काले पड़ जाएंगे—बिल्कुल उस कर्मचारी की तरह जो ‘बर्नआउट’ का शिकार होकर थेरेपी ले रहा है, जबकि अंदर से वह अभी भी कच्चा और अनुभवहीन है। और यदि आँच बहुत धीमी है, तो आप तेल पीकर इतने भारी और लचर हो जाएंगे कि किसी काम के नहीं रहेंगे—जैसे वह सरकारी बाबू जिसकी फाइलें दीमक चाट रही हैं।
कार्यक्षमता का संतुलन कोई ‘मैनेजमेंट स्किल’ नहीं है; यह केवल उस घर्षण (Friction) का नाम है जो आपकी आत्मा और आपकी नौकरी के बीच पैदा होता है। जब आप अपनी डेस्क पर बैठकर आठ घंटे काम करने का ढोंग करते हैं, तो आपकी ‘वर्क पोटेंशियल’ धीरे-धीरे खत्म होती जाती है। विडंबना देखिए, लोग अपनी इस घटती हुई जैविक क्षमता और रीढ़ की हड्डी के दर्द को छिपाने के लिए लाखों रुपये खर्च करके एक लग्जरी एर्गोनोमिक ऑफिस चेयर खरीदते हैं। वे सोचते हैं कि वह जालीदार नायलॉन और क्रोम का ढांचा उनकी उस थकान को सोख लेगा जो उनकी आत्मा में बस चुकी है। लेकिन उस महंगी कुर्सी पर बैठकर भी आप वही साधारण, उबाऊ ईमेल लिख रहे हैं जो एक ढाबे की टूटी प्लास्टिक कुर्सी पर बैठकर लिखा जा सकता था। आपकी हैसियत उस कुर्सी के ब्रांड से नहीं, बल्कि उस हताशा से तय होती है जो आप हर शाम अपने साथ घर ले जाते हैं।
थकान का उत्सर्जन और अंत
मानवीय संवेदनाएँ जिन्हें आप ‘तनाव’ या ‘डिप्रेशन’ कहते हैं, वे वास्तव में आपके सिस्टम का ‘एग्जॉस्ट पाइप’ हैं। जैसे एक पुराना डीजल इंजन काला धुआं छोड़ता है, वैसे ही आप चिड़चिड़ापन छोड़ते हैं। जब आप काम के बीच में अचानक अपना फोन उठाकर घंटों फालतू वीडियो देखते हैं, तो वह ‘आलस्य’ नहीं है। वह आपके जलते हुए दिमाग की आखिरी चीख है जो सिस्टम को ठंडा करने के लिए ऊष्मा को विकीर्ण (Radiate) कर रही है। हम मशीन बनने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन भूल जाते हैं कि मशीनें भी घर्षण के कारण घिसकर कबाड़ बन जाती हैं। आपकी टू-डू लिस्ट वास्तव में आपकी मृत्यु का काउंटडाउन है, जिसे आपने सुंदर फोंट में सजाया है।
अगली बार जब आप ‘एफिशिएंसी’ की बात करें, तो अपने कमरे के कोने में जमा धूल के गुबार को देखिएगा। वही आपकी असली उपलब्धि है—एंट्रॉपी का निर्माण। आप खुद को जला रहे हैं ताकि कोई और अमीर बन सके, और आप इस आत्मदाह को ‘करियर’ कहते हैं। इससे ज़्यादा शर्मनाक मजाक और क्या हो सकता है। बकवास बंद करो और काम पर वापस जाओ, वैसे भी तुम इसके अलावा और कुछ कर भी नहीं सकते।

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