श्रम का भ्रम: एक सांख्यिकीय त्रासदी
तथाकथित ‘कॉर्पोरेट योद्धा’ और ‘कर्मठ कर्मचारी’ जिस चीज को अपनी उपलब्धि मानते हैं, वह वास्तव में ब्रह्माण्ड की सबसे बड़ी विडंबनाओं में से एक है। आप जिसे ‘परिश्रम’ या ‘कड़ी मेहनत’ कहते हैं, वह तंत्रिका विज्ञान के दृष्टिकोण से केवल एक डरपोक प्रतिक्रिया है। कार्ल फ्रिस्टन का ‘फ्री एनर्जी प्रिंसिपल’ (Free Energy Principle) इसे बहुत ही निर्दयता से स्पष्ट करता है: आपका अस्तित्व केवल एक सांख्यिकीय मॉडल है जो अपनी मृत्यु (यानी पूर्ण एन्ट्रापी) को टालने के लिए संघर्ष कर रहा है।
जब आप सुबह उठकर अपनी ‘टू-डू लिस्ट’ (To-Do List) देखते हैं, तो आपको जो घबराहट महसूस होती है, वह काम का बोझ नहीं है। वह आपका मस्तिष्क है जो चीख-चीख कर कह रहा है कि बाहरी दुनिया और आपके आंतरिक मॉडल के बीच का अंतर खतरनाक स्तर तक बढ़ गया है। हम काम इसलिए नहीं करते कि हमें सृजन पसंद है; हम काम इसलिए करते हैं ताकि हमारा दिमाग अनिश्चितता के उस शोर को बंद कर सके। यह ठीक वैसा ही है जैसे एक पुराना, सस्ता एंड्रॉइड फोन, जिसकी बैटरी हर वक्त ‘लो’ (Low) रहती है, और आप उसे बार-बार चार्जर में सिर्फ इसलिए घोंसते हैं ताकि वह पूरी तरह से मर न जाए। आपकी उत्पादकता वास्तव में आपके अस्तित्वगत भय का एक उप-उत्पाद मात्र है।
मस्तिष्क: बासी कचौरी और अनुमानित त्रुटि
अपने दिमाग को ज्ञान का मंदिर समझना बंद करें। यह एक गीला, मांसल कंप्यूटर है जो लगातार गर्म हो रहा है। हर बार जब आप किसी स्प्रेडशीट के सेल को भरते हैं या किसी बेतुके जूम कॉल (Zoom Call) पर सिर हिलाते हैं, तो आप वास्तव में ‘प्रेडिक्शन एरर’ (Prediction Error) को कम करने की कोशिश कर रहे होते हैं। लेकिन इसकी कीमत क्या है? एटीपी (ATP) का दहन।
सूचना को संसाधित करना मुफ़्त नहीं है। यह ऊष्मप्रवैगिकी (Thermodynamics) के नियमों के अधीन है। जिस तरह सड़क किनारे तली जा रही बासी कचौरी से निकलने वाला धुआं और गर्मी वातावरण को प्रदूषित करती है, उसी तरह आपके विचार भी गर्मी पैदा करते हैं। जब आप शाम को ‘बर्नआउट’ महसूस करते हैं, तो वह केवल एक मुहावरा नहीं है। आपने सचमुच अपने न्यूरॉन्स को तला है। केएल-डायवर्जेंस (KL-Divergence) को किसी जटिल गणितीय सूत्र के रूप में न देखें; यह आपके ‘अहंकार’ और ‘आपकी बैंक पासबुक की वास्तविकता’ के बीच की वह खाई है जिसे पाटने में आपकी जवानी जलकर राख हो रही है। हम सब एक ऐसी जैविक मशीन हैं जो भविष्य की भविष्यवाणी करने की असफल कोशिश में वर्तमान को ईंधन की तरह फूंक रही है।
एन्ट्रापी का क्रूर मजाक
ब्रह्माण्ड का दूसरा नियम कहता है कि किसी भी बंद सिस्टम में अव्यवस्था (Entropy) हमेशा बढ़ती है। यहाँ सबसे बड़ा व्यंग्य यह है: आप अपने जीवन को जितना व्यवस्थित करने की कोशिश करते हैं, आप ब्रह्माण्ड में उतनी ही अधिक गर्मी और अव्यवस्था फैलाते हैं। आपका वह साफ-सुथरा डेस्क और व्यवस्थित कैलेंडर वास्तव में पर्यावरण में एन्ट्रापी के उत्सर्जन का प्रमाण है।
मूर्खता की पराकाष्ठा देखनी हो, तो उन लोगों को देखिए जो इस अराजकता को ‘प्रीमियम स्टेशनरी’ से छिपाने की कोशिश करते हैं। मैंने हाल ही में एक ऐसे ही बेवकूफ को देखा जो एक बेहद महंगी इतालवी चमड़े की डायरी को ऐसे सहला रहा था जैसे उसमें ब्रह्माण्ड के रहस्य छिपे हों। साठ हजार रुपये एक नोटबुक के लिए? क्या यह चमड़ा आपके जीवन के बेतरतीब आंकड़ों को सुधारेगा? हरगिज नहीं। यह केवल एक ‘प्लेसीबो’ है—एक महँगा झुनझुना जो आपको यह झूठा दिलासा देता है कि आपका जीवन नियंत्रण में है, जबकि वास्तव में आप केवल एन्ट्रापी की आग में महंगे ईंधन डाल रहे हैं।
क्या बकवास है यह सब। हम सब एक डूबते हुए जहाज पर बैठकर पीतल के बर्तनों को चमकाने में व्यस्त हैं, और इसे हम ‘करियर’ कहते हैं। अंततः, ऊष्मा गतिकी की जीत होगी। आपकी सारी मेहनत, सारी रिपोर्ट्स, और वह महंगी डायरी—सब धूल और गर्मी में बदल जाएंगे। काम करना जीने का तरीका नहीं है; यह धीरे-धीरे मरने का एक बहुत ही थकाऊ तरीका है। और अब, कृपया मुझे अकेला छोड़ दें, मेरी चाय ठंडी हो रही है और यह ‘अनुमानित त्रुटि’ मुझे बर्दाश्त नहीं हो रही।

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