सार्वजनिकता का प्रपंच

पसीने का अर्थशास्त्र

क्या आपको वाकई लगता है कि सुबह की लोकल ट्रेन में, किसी अजनबी की बगल में दबे हुए, उसकी बासी साँसों और पसीने की बदबू को सूंघना ‘सभ्यता’ की निशानी है? जिसे आप ‘सार्वजनिक जीवन’ कहते हैं, वह असल में थर्मोडायनामिक्स (ऊष्मागतिकी) का एक भद्दा मज़ाक है। हम खुद को ‘नागरिक’ कहते हैं, लेकिन ब्रह्मांड की नज़र में हम केवल ‘हीट सिंक’ हैं—वे पुर्जे जो इस विशाल, बेतुकी मशीन की गर्मी को सोखने के लिए बनाए गए हैं।

कॉलेज के वातानुकूलित कमरों में बैठकर ‘सामाजिक अनुबंध’ (Social Contract) पर बहस करना आसान है। लेकिन सड़क पर उतरिए। यह जो शोर, धूल और धुआं है, यह ‘विकास’ का उपउत्पाद नहीं है; यही असल उत्पाद है। जिसे हम ‘इंफ्रास्ट्रक्चर’ कहते हैं, वह समाज के एंट्रॉपी (अव्यवस्था) को शहर की सीमाओं से बाहर धकेलने का एक महंगा और नाकाम प्रयास है। और आप? आप उस कचरे को ढोने वाले खच्चर से ज्यादा कुछ नहीं हैं।

शहरी भट्ठी और नौकरशाही का कचरा

आप अपनी मेहनत की कमाई का एक बड़ा हिस्सा टैक्स के रूप में सरकार को देते हैं। क्यों? ताकि कोई बाबू वातानुकूलित दफ्तर में बैठकर, एक बेतुके महंगे फाउंटेन पेन से उन फाइलों पर हस्ताक्षर कर सके जिनका रद्दी के भाव में भी कोई मोल नहीं है। यह ‘जनहित’ नहीं है; यह ऊर्जा का अपराधीकरण है। सार्वजनिक क्षेत्र (Public Sector) असल में एक विशालकाय शौचालय है, जिसे हमने इसलिए बनाया है ताकि निजी जीवन की गंदगी को कहीं तो बहाया जा सके।

प्रिगोजीन ने कहा था कि जटिल प्रणालियाँ (Complex Systems) अपनी संरचना को बनाए रखने के लिए ऊर्जा का अत्यधिक उपभोग करती हैं। शहर इसका सबसे वीभत्स उदाहरण हैं। मुंबई या दिल्ली को देखिए। यह एक इंजन है जो मानव आत्माओं को ईंधन के रूप में जलाता है ताकि कंक्रीट के जंगल का तापमान बना रहे। हम पार्कों और फुटपाथों का निर्माण इसलिए नहीं करते कि हमें हरियाली पसंद है, बल्कि इसलिए करते हैं क्योंकि अगर यह ‘कूलिंग सिस्टम’ न हो, तो सामाजिक घर्षण (Social Friction) से शहर में आग लग जाएगी।

सड़क पर लगा हर जाम, हर रेड लाइट पर जलता हुआ पेट्रोल, और हर सरकारी खिड़की पर लगी कतार—यह सब ‘मैक्सिमम एंट्रॉपी प्रोडक्शन’ (MEPP) का सबूत है। हम व्यवस्था बनाने की जितनी कोशिश करते हैं, उतनी ही ज्यादा अराजकता पैदा करते हैं। यह एक ऐसा दलदल है जहाँ आप जितना हाथ-पैर मारेंगे, उतना ही नीचे धंसते जाएंगे।

अवश्यंभावी राख

इस शोर से बचने के लिए आप क्या करते हैं? आप हजारों रुपये के नॉइज़-कैंसलिंग हेडफोन खरीदते हैं। कितनी विडंबना है! पहले हम एक ऐसा समाज बनाते हैं जो असहनीय शोर पैदा करता है, और फिर हम अपनी ही बनाई हुई उस ‘सार्वजनिकता’ से बचने के लिए निजी पूंजी खर्च करते हैं। यह अर्थव्यवस्था का पहिया नहीं, पागलपन का चक्रव्यूह है।

जिसे आप ‘सोशल कॉमन कैपिटल’ कहते हैं, वह रेत का महल है। आप इसे सहेजने की कोशिश कर रहे हैं, जबकि ज्वार आ चुका है। संस्थाएँ—चाहे वो न्यायपालिका हो या नगर निगम—अंततः अपने ही वजन से ढह जाएंगी। एंट्रॉपी को धोखा नहीं दिया जा सकता। हर ‘सुधार’ केवल पतन को कुछ पलों के लिए टालने का एक बहाना है।

हम सब एक जलते हुए घर में बैठे हैं और दीवार पर लगी पेंटिंग सीधा करने में व्यस्त हैं। आप अपनी उस दिखावटी चमड़े की डायरी में ‘उत्पादकता’ के लक्ष्य लिखते रहिए। ब्रह्मांड को आपकी योजनाओं से कोई फर्क नहीं पड़ता। अंत में केवल ठंडी, नीरस राख ही बचेगी। घर जाना है, बहुत सर दर्द हो रहा है।

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