मस्तिष्क की वक्रता

कॉरपोरेट मुर्दाघर का ज्यामितीय नरक

कॉरपोरेट दफ्तरों के उन वातानुकूलित मुर्दाघरों में बैठे हुए, जहाँ तुम लोग ‘प्रोडक्टिविटी’ नामक कल्ट की पूजा करते हो, क्या तुम्हें वाकई लगता है कि तुम्हारी थकान का कारण केवल ‘काम का बोझ’ है? तुम लोग अपनी सुस्त आँखों और रीढ़ की हड्डी के निचले हिस्से में होते उस धीमे, मीठे दर्द को ‘स्ट्रेस’ का फैंसी नाम देकर खुद को तसल्ली देते हो। तुम सोचते हो कि वीकेंड पर सोया हुआ बारह घंटे का कुंभकर्ण-नींद तुम्हें बचा लेगा।

कितने अबोध हो तुम।

यह कोई भावनात्मक समस्या नहीं है जिसका इलाज किसी मोटिवेशनल स्पीकर की बकवास में मिले। यह शुद्ध रूप से एक क्रूर ज्यामितीय (Geometric) त्रासदी है। तुम्हारा मस्तिष्क एक ‘सांख्यिकीय बहुविध’ (Statistical Manifold) है, और अभी, इस क्षण, उसकी ज्यामिति किसी कबाड़खाने में पड़ी दुर्घटनाग्रस्त गाड़ी की चेसिस की तरह बुरी तरह पिचक चुकी है।

फिशर मीट्रिक और कीचड़ भरी गलियाँ

जरा विज्ञान के चश्मे से अपनी दुर्दशा को देखो। जब तुम सुबह ताजे होते हो, तो तुम्हारे विचार इस मैनिफोल्ड पर ‘जियोडेसिक’ (Geodesic) यानी सबसे छोटे रास्ते से गुजरते हैं। मक्खन की तरह चिकना प्रवाह। विचार ‘A’ से निर्णय ‘B’ तक की दूरी शून्य के बराबर होती है।

लेकिन जैसे-जैसे दिन ढलता है, और तुम्हारे बॉस की बकवास ईमेल्स और अंतहीन मीटिंग्स का कचरा दिमाग में भरता है, तुम्हारे न्यूरल स्पेस का ‘फिशर इंफॉर्मेशन मीट्रिक’ (Fisher Information Metric) विकृत होने लगता है। सूचना ज्यामिति के नजरिए से, दो विचारों के बीच की ‘दूरी’ बढ़ जाती है।

इसे ऐसे समझो: पहले जो रास्ता एक साफ-सुथरा हाईवे था, वह अब पुरानी दिल्ली की उस तंग, बदबूदार गली में तब्दील हो चुका है जहाँ कीचड़, रिक्शे वालों का पसीना, और खुली हुई नालियों की सड़ांध भरी है। तुम चल उतना ही रहे हो, लेकिन ‘संज्ञानात्मक घर्षण’ (Cognitive Friction) इतना बढ़ गया है कि एक साधारण सा निर्णय लेना भी—जैसे कि ‘सादर’ (Regards) लिखना है या ‘भवदीय’ (Sincerely)—एवरेस्ट चढ़ने जैसा लगता है। मेट्रो में बगल में खड़े उस आदमी की पसीने की बदबू से जो घिन आती है, ठीक वही वितृष्णा तुम्हारा दिमाग अब हर एक नए डेटा पॉइंट के प्रति महसूस कर रहा है।

पूंजीवाद का महंगा, चमकीला मलहम

और जब तुम्हें यह ज्यामितीय विरूपण महसूस होता है, जब तुम्हें लगता है कि तुम्हारा मानसिक ढांचा चरमरा रहा है, तो तुम क्या करते हो? तुम अमेज़न खोलते हो। तुम्हारी उंगलियाँ कांपती हैं और तुम अपनी गाढ़ी कमाई उस [हर्मन मिलर की दो लाख रुपये वाली एर्गोनोमिक कुर्सी](https://www.hermanmiller.com/en_in/products/seating/office-chairs/aeron-chairs/) पर लुटा देते हो। तुम्हें लगता है कि अगर तुम्हारी पीठ को एक महंगा जालीदार सहारा मिल गया, तो तुम्हारे जीवन का यह जटिल गणित सुलझ जाएगा।

वाह, क्या तर्क है।

यह वैसा ही है जैसे किसी धधकते हुए घर में खुशबूदार अगरबत्ती जलाना। वह कुर्सी तुम्हारी रीढ़ को तो शायद सीधा कर दे, लेकिन तुम्हारे ‘सांख्यिकीय मैनिफोल्ड’ की वक्रता (Curvature) को ठीक नहीं कर सकती। तुम बस अपनी बर्बादी को एक महंगी और आरामदायक गद्दी पर बिठा रहे हो, ताकि तुम्हें यह भ्रम रहे कि तुम अभी भी नियंत्रण में हो। हकीकत यह है कि यह सिर्फ एक अनुष्ठान है—अपनी लाचारी को छिपाने का एक महंगा, चमकीला तरीका। बैंक बैलेंस घटता जाता है, और उसके साथ ही तुम्हारे पेट में एसिडिटी का ज्वार भाटा उठता है।

ठंडे समोसे का सिद्धांत और एन्ट्रॉपी

एन्ट्रॉपी (Entropy) का नियम निर्दयी है, और यह तुम्हारे ‘सेल्फ-केयर’ के ढकोसलों की परवाह नहीं करता। क्या तुमने कभी उस समोसे को देखा है जो ठंडा होकर रबड़ जैसा हो जाता है? तुम उसे माइक्रोवेव में कितना भी गर्म कर लो, वह शुरुआती कुरकुरापन—वह स्पष्टता, वह ‘क्रंच’—कभी वापस नहीं आता। बस मुँह में तेल का एक चिपचिपा, बेस्वाद अहसास और बाद में होने वाली सीने की जलन (Heartburn) रह जाती है।

तुम्हारा दिमाग भी शाम के पाँच बजते-बजते उसी ठंडे, बासी समोसे में बदल जाता है। तुम कैफीन ठूँसकर उसे दोबारा गर्म करने की कोशिश करते हो, लेकिन नतीजा क्या होता है? सिर्फ घबराहट, धड़कन का बढ़ना और कंपकपाते हाथ। तुम्हारी निर्णय क्षमता, ‘बेयसियन इन्फरेंस’ (Bayesian Inference) को त्यागकर, शुद्ध ‘जुगाड़’ पर उतर आती है। तुम सोचते नहीं हो, तुम बस प्रतिक्रिया देते हो, जैसे लैब में करंट लगने पर चूहा उछलता है।

दिमाग खराब हो गया है मेरा भी, तुम्हें यह सब समझाते हुए।

सच्चाई तो यह है कि तुम एक ऐसी लिथियम-आयन बैटरी की तरह हो जो फूल चुकी है और जिसके रसायन अब अस्थिर हो चुके हैं। तुम अपने आप को एक नया ‘सॉफ्टवेयर अपडेट’ या ‘टू-डू लिस्ट’ देकर ठीक करने की कोशिश कर रहे हो, लेकिन हार्डवेयर ही गल चुका है। तुम्हारे मुँह से जो शब्द निकल रहे हैं, वे अब संवाद नहीं हैं। वे केवल ‘थर्मल नॉइज़’ (Thermal Noise) हैं। एक थका हुआ, घिसा-पिटा सिस्टम जो अपने ही अस्तित्व के भार से कराह रहा है।

जाओ, अब वह सड़क किनारे वाली दो कौड़ी की चाय पीओ। कम से कम वह कड़वा, उबला हुआ पानी तुम्हें यह याद दिलाएगा कि जीवन का स्वाद असल में कैसा होता है। यहाँ गणित लगाने का कोई फायदा नहीं, तुम्हारा ज्यामितीय नक्शा पहले ही फट चुका है।

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