सांख्यिकीय नरक

कॉर्पोरेट जगत की यह जो ‘मल्टीटास्किंग’ की सनक है, वह असल में एक मानसिक नपुंसकता है जिसे ‘उत्पादकता’ के सुनहरे और चमकीले कागज़ में लपेटकर बेचा जा रहा है। ये सूट-बूट पहने हुए प्रबंधक, जिनकी समझ एक्सेल शीट के खानों से आगे नहीं जाती, यह समझते हैं कि मानव मस्तिष्क कोई ऐसा लचीला रबड़ है जिसे जितना चाहो खींचो, वह वापस अपनी जगह पर आ जाएगा। सच तो यह है कि जिसे वे ‘काम’ कहते हैं, वह केवल एक सांख्यिकीय तमाशा है, जहाँ आप अपनी बुद्धि के टुकड़ों को हर ट्रांजैक्शन के साथ नाली में बहा रहे होते हैं।

कार्य की माया और चबाया हुआ मांस

जिसे तुम ‘ध्यान केंद्रित करना’ कहते हो, वह केवल एक सांख्यिकीय अवस्था है। जब तुम एक जटिल कोड लिख रहे होते हो या किसी वित्तीय घोटाले को छिपाने के लिए रिपोर्ट बना रहे होते हो, तो तुम्हारा तंत्रिका तंत्र एक विशिष्ट संभाव्यता वितरण (probability distribution) के साँचे में फँसा होता है। जैसे ही कोई गधा आकर तुम्हारे कंधे पर हाथ रखता है और पूछता है कि ‘लंच में क्या है?’, तुम केवल विचलित नहीं होते—तुम सांख्यिकीय रूप से बिखर जाते हो।

यह स्थिति बिल्कुल वैसी है जैसे दिल्ली की भीषण और चिपचिपी गर्मी में तुम एक Herman Miller Aeron जैसी महंगी कुर्सी पर बैठकर अपनी रीढ़ को टूटने से बचाने का नाटक कर रहे हो, जबकि तुम्हारा पेट उस बासी समोसे को पचाने के लिए संघर्ष कर रहा है जो तुमने सुबह किसी सस्ती दुकान से खाया था। उस कुर्सी की कीमत तुम्हारी काबिलियत का प्रमाण नहीं, बल्कि तुम्हारी उस मजबूरी का विज्ञापन है जो तुम्हें डेस्क से बाँधे रखती है। तुम्हारा ध्यान उस कुर्सी के अर्गोनॉमिक्स और पेट में उबलते एसिड के बीच कहीं खो गया है। क्या शानदार जीवन है।

सूचना ज्यामिति: घर्षण और घृणा

अब थोड़ा गणित के कीचड़ में उतरते हैं। सूचना ज्यामिति (Information Geometry) की भाषा में कहें तो, दो कार्यों के बीच का संक्रमण ‘फिशर सूचना मैट्रिक्स’ (Fisher Information Matrix) की वक्रता पर निर्भर करता है। लेकिन इसे गणित की सुंदरता समझने की भूल मत करना। यह ‘दूरी’ असल में उस घर्षण की तरह है जो एक पुरानी, बिना तेल वाली मशीन में होता है। जब तुम एक कार्य से दूसरे पर स्विच करते हो, तो तुम एक सांख्यिकीय बहुविध (Statistical Manifold) पर एक बिंदु से दूसरे बिंदु तक रेंग रहे होते हो। यह कोई हवाई यात्रा नहीं है; यह एक ऊबड़-खाबड़ सड़क पर फटे हुए टायर वाली साइकिल चलाने जैसा है, जहाँ हर पेडल के साथ तुम्हारी हड्डियों में दर्द होता है।

इस ‘संदर्भ संक्रमण’ (context switching) की कीमत समय में नहीं, बल्कि तुम्हारी तंत्रिका कोशिकाओं के जलने से चुकानी पड़ती है। जब तुम अचानक एक काम छोड़कर दूसरे में घुसते हो, तो तुम्हारा मस्तिष्क ‘कुलबैक-लीब्लर डाइवर्जेंस’ (Kullback-Leibler divergence) के उस गहरे गड्ढे में गिर जाता है जहाँ सूचना केवल कचरा बन जाती है। इस प्रक्रिया में जो ऊर्जा नष्ट होती है, वह ‘मानसिक थकान’ नहीं, बल्कि तुम्हारे मस्तिष्क का ‘एंट्रॉपी टैक्स’ है। यह वैसा ही है जैसे इनकम टैक्स भरने के बाद हाथ में आने वाली आधी-अधूरी सैलरी—मेहनत पूरी, और नतीजा केवल गुजारा करने लायक। तुम्हारा सिस्टम इतना पुराना हो चुका है कि हर नया ‘टैब’ ब्राउज़र में खोलना वैसा ही है जैसे एक सांस फूलते हुए बूढ़े आदमी को जबरदस्ती सीढ़ियाँ चढ़ने के लिए मजबूर करना। घर्षण से पैदा हुई गर्मी धुआं बनकर निकल रही है, लेकिन तुम्हें लगता है कि तुम ‘व्यस्त’ हो।

ऊष्मप्रवैगिकी: सड़ा हुआ शोर

लोग ‘प्रेरणा’ की बात करते हैं जैसे वह कोई महंगा परफ्यूम हो जो छिड़कते ही सब ठीक कर देगा। हकीकत में, प्रेरणा केवल ‘लो-एंट्रॉपी’ (Low-Entropy) की एक अस्थायी अवस्था है जो बहुत जल्दी सड़ जाती है। तुम्हारा मन जो बार-बार फोन की तरफ भागता है, वह कोई ‘आधुनिक बीमारी’ या ‘डोपामिन की लत’ नहीं है; वह विशुद्ध रूप से तुम्हारे दिमाग का थर्मल थ्रॉटलिंग (thermal throttling) है। तुम्हारा सीपीयू गर्म हो चुका है, पंखा काम नहीं कर रहा है, और वह अब और डेटा प्रोसेस नहीं कर सकता।

हर बार जब तुम ‘नोटिफिकेशन’ चेक करते हो, तुम अपनी तंत्रिका-ज्यामिति को इस कदर विकृत कर लेते हो कि वापस पुराने कार्य पर लौटना लगभग असंभव हो जाता है। यह वैसा ही है जैसे एक बार दूध फट जाए तो तुम उसे वापस जोड़ने की कोशिश करो। तुम चाहे कितना भी ‘टाइम मैनेजमेंट’ का ढोंग कर लो या रंग-बिरंगी डायरियों में प्लान बना लो, तुम्हारी जैविक मशीनरी उस कचरे को साफ नहीं कर सकती जो तुम हर स्विच के साथ जमा कर रहे हो। तुम केवल अपनी ऊर्जा को गर्मी के रूप में बाहर फेंक रहे हो, जैसे कोई पुरानी बस काला धुआं छोड़ते हुए पहाड़ चढ़ने की कोशिश कर रही हो और पीछे वाले ड्राइवरों को खाँसने पर मजबूर कर रही हो।

किसी को परवाह नहीं है कि तुम कितना थक गए हो। यह पूंजीवादी व्यवस्था केवल यह चाहती है कि तुम उस सांख्यिकीय सतह पर तब तक रेंगते रहो जब तक कि तुम्हारा ‘पैरामीटर स्पेस’ पूरी तरह से ध्वस्त न हो जाए। जाओ, एक और ब्लैक कॉफी पीओ और इस भ्रम को जिलाए रखो कि तुम ‘कुशल’ हो।

भाड़ में जाओ।

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