श्रम की एन्ट्रॉपी

दक्षता… हा! उस खोखले आदर्श की बात मत करो। कॉर्पोरेट जगत जिसे ‘मल्टीटास्किंग’ का नाम देकर पूजता है, वह वास्तव में इंसानी बेवकूफी का एक शानदार स्मारक है। जिसे तुम अपनी ‘उत्पादकता’ समझते हो, वह उष्मागतिकी (Thermodynamics) के नियमों के खिलाफ छेड़ा गया एक ऐसा युद्ध है, जिसमें तुम्हारी हार गणितीय रूप से तय है।

तुम सोचते हो कि एक साथ दस प्रोजेक्ट संभालना तुम्हें कोई ‘कॉर्पोरेट योद्धा’ बना देता है? असलियत यह है कि तुम्हारा दिमाग पुरानी दिल्ली के जाम में फंसे उस खटारा रिक्शे जैसा है, जो एक इंच आगे बढ़ने के लिए भी धुएं का गुबार छोड़ता है और शोर मचाता है। जब तुम एक एक्सेल शीट से अचानक किसी ‘अर्जेंट’ व्हाट्सएप मैसेज पर कूदते हो, तो तुम्हारे न्यूरल नेटवर्क में जो होता है, उसे विज्ञान की भाषा में ‘फेज ट्रांजिशन’ कहते हैं। लेकिन आसान भाषा में कहूँ तो, यह वैसा ही है जैसे तुम अपनी गाड़ी को 100 की रफ़्तार पर रिवर्स गियर में डालने की कोशिश कर रहे हो। घर्षण। गर्मी। और अंततः, इंजन का सीज हो जाना।

अजीब तमाशा है। लोग सोचते हैं कि वे काम कर रहे हैं, जबकि वे सिर्फ अपनी मानसिक ऊर्जा को ‘एन्ट्रॉपी’ में बदल रहे हैं। हर बार जब तुम्हारा ध्यान भटकता है, तो मस्तिष्क को उस सूचना-स्थान (Information Space) को फिर से बनाने के लिए भारी कीमत चुकानी पड़ती है। यह ऊर्जा का रिसाव वैसा ही है जैसे तुम्हारी जेब फटी हो और तुम पूरी रात बाजार में घूमते हुए अपनी मेहनत की कमाई के सिक्के नालियों में गिराते जा रहे हो। तुम्हें पता भी नहीं चलता, और सुबह तक तुम कंगाल हो चुके होते हो। यह केवल ‘संज्ञानात्मक भार’ नहीं है; यह एक त्रासदी है। यह वैसा ही है जैसे तुमने बड़े चाव से महंगी चाय बनाई हो, और पीने से ठीक पहले कोई आवारा कुत्ता उसे तुम्हारे जूतों पर गिरा दे। वह खीज, वह जलन—वही तुम्हारे दिमाग का हाल है।

और फिर आते हैं वे लोग जो इस आंतरिक अराजकता (Chaos) को बाहरी दिखावे से ढकने की कोशिश करते हैं। मुझे हंसी आती है उन बेचारों पर जो डेढ़ लाख रुपये की एर्गोनोमिक कुर्सी खरीदकर खुद को तसल्ली देते हैं। उन्हें लगता है कि रीढ़ की हड्डी को थोड़ा सहारा मिल जाने से उनका बिखरा हुआ दिमाग वापस पटरी पर आ जाएगा। तुम चाहे जितने महंगे सिंहासन पर बैठ जाओ, तुम रहोगे वही—एक ओवरहीट होता हुआ मांस का टुकड़ा जो जानकारी को संसाधित करने में विफल हो रहा है। उस जालीदार कपड़े से तुम्हारी पीठ को हवा मिल सकती है, लेकिन तुम्हारी खोपड़ी के अंदर जो ‘थर्मल मेल्टडाउन’ हो रहा है, उसे रोकने का दम उसमें नहीं है। यह डूबते हुए जहाज पर सोने की कील ठोकने जैसा है।

पागलपन है ये सब।

कुछ तो इससे भी आगे निकल जाते हैं। कानों पर महंगे नॉइस कैंसिलिंग हेडफोन चढ़ाकर वे सोचते हैं कि उन्होंने दुनिया को चुप करा दिया। अरे मूर्ख, तुम बाहर के शोर को तो रोक लोगे, लेकिन तुम्हारे अंदर जो विचारों का भूचाल चल रहा है, उसका क्या? तुम्हारे दिमाग के अंदर का ‘सिग्नल-टू-नॉइज़ रेशियो’ इतना बिगड़ चुका है कि सन्नाटे में भी तुम्हें केवल अपनी विफलता की गूंज सुनाई देगी। तुम सूचना के समुद्र में तैर नहीं रहे, तुम उसमें डूब रहे हो, और तुम्हारे पास बचने के लिए केवल प्लास्टिक के ये महंगे खिलौने हैं जो तुम्हें भ्रम बेच रहे हैं।

शाम होते-होते जो थकान तुम महसूस करते हो, वह कोई साधारण थकान नहीं है। वह तुम्हारे न्यूरॉन्स की चीख है। तुमने दिन भर जो बेतरतीब छलांगें लगाई हैं, उन्होंने तुम्हारे डोपामाइन और ग्लूटामेट के भंडारों को जलाकर राख कर दिया है। हम जिसे ‘प्रोफेशनलिज्म’ कहते हैं, वह वास्तव में एक ‘डिसिपेटिव स्ट्रक्चर’ (Dissipative Structure) है जो जीवित रहने के लिए तुम्हारी प्राणशक्ति को ईंधन की तरह इस्तेमाल करता है। तुम बस एक केतली हो जिसकी सीटी बज रही है, लेकिन कोई गैस बंद करने वाला नहीं है।

घर जाना है मुझे।

अंततः, यह पूरा सर्कस, यह ‘टाइम मैनेजमेंट’, यह ‘फोकस’—सब धूल में मिलने वाला है। ब्रह्मांड का दूसरा नियम अटल है: अव्यवस्था (Disorder) हमेशा बढ़ती है। तुम अपनी टू-डू लिस्ट बनाकर खुद को चाहे जितना बहला लो, तुम केवल उस ब्रह्मांडीय कचरे को करीने से सजाने की कोशिश कर रहे हो। मल्टीटास्किंग वह कला है जिससे तुम अपनी खुद की बर्बादी की गति को थोड़ा और तेज कर देते हो। और अंत में? अंत में सब शांत हो जाएगा, बिल्कुल उस डेडलाइन की तरह जो अब मायने नहीं रखती।

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