श्रम की ज्यामिति: मस्तिष्क के रद्दीकरण और वक्रता का अध्ययन
शाम ढल रही है और व्हिस्की के इस गिलास में मुझे तुम्हारी तथाकथित ‘कॉर्पोरेट रणनीति’ का अक्श दिखाई दे रहा है—धुंधला, कड़वा और पूरी तरह से बेमानी। ये टाई पहनने वाले ‘बाबू’ और एमबीए की डिग्रियां लिए हुए मैनेजर, जो खुद को आधुनिक युग का चाणक्य समझते हैं, दरअसल यूक्लिडियन ज्यामिति (Euclidean Geometry) के कैदी हैं। उन्हें लगता है कि यह दुनिया एक सपाट कागज का पन्ना है, जहाँ पॉइंट A (काम की शुरुआत) से पॉइंट B (काम का अंत) तक जाने का सबसे छोटा रास्ता एक सीधी लकीर है। कितनी मासूमियत है इस मूर्खता में।
हकीकत यह है कि हमारा ‘टास्क स्पेस’ (Task Space) कोई समतल मैदान नहीं है। यह एक ‘रीमानियन मैनिफोल्ड’ (Riemannian Manifold) है—एक ऐसी जगह जो तनाव, समय के दबाव और अंतहीन मीटिंग्स के बोझ तले बुरी तरह मुड़ चुकी है। यहाँ सीधी रेखाएं अस्तित्व में ही नहीं होतीं।
(हं! क्या मजाक है।)
जरा सोचो, क्या तुम चांदनी चौक या पुरानी दिल्ली के बाजारों की भीड़ में कभी सीधा चल पाए हो? नहीं। वहाँ तुम्हें रिक्शे वालों, आवारा जानवरों, और पसीने से तर-बतर भीड़ से बचकर लगातार मुड़ना पड़ता है। वहाँ का ‘शॉर्टकट’ कभी सीधा नहीं होता, वह एक टेढ़ा-मेढ़ा वक्र (Curve) होता है। विज्ञान की भाषा में इसे ‘जियोडेसिक’ (Geodesic) कहते हैं। तुम्हारे दिमाग का कामकाज भी ठीक ऐसा ही है। जब तुम सुबह ताजे दिमाग से आते हो, तो ज्यामिति थोड़ी साफ होती है, रास्ते सीधे लगते हैं। लेकिन जैसे-जैसे दिन बीतता है, और तुम्हारे बॉस की बेतुकी मांगें बढ़ती हैं, यह मानसिक स्पेस मुड़ने लगता है। सूचना ज्यामिति (Information Geometry) का क्रूर नियम यह है कि यहाँ ‘दूरी’ को समय में नहीं, बल्कि ‘मानसिक घर्षण’ और संज्ञानात्मक भार (Cognitive Load) में मापा जाता है।
जब तुम्हारा दिमाग थक जाता है, तो फिशर इनफॉर्मेशन मीट्रिक (Fisher Information Metric) बदल जाता है। एक साधारण सा ईमेल लिखना, जो सुबह 2 मिनट का काम था, शाम के 5 बजे तक हिमालय चढ़ने जैसा दुष्कर कार्य लगने लगता है। यह तुम्हारा आलस नहीं है, यह गणितीय अनिवार्यता है। तुम्हारे न्यूरॉन्स के बीच की दूरी बढ़ गई है क्योंकि तुम्हारे मानसिक स्पेस की वक्रता (Curvature) चरम पर है। तुम उस मुड़े हुए स्पेस में रेंग रहे हो, और तुम्हारा एचआर (HR) विभाग इसे ‘लैक ऑफ मोटिवेशन’ कहता है। वे इसे ‘जज्बात’ कहते हैं, मैं इसे सिस्टम का ‘बग’ कहता हूँ। जिसे तुम ‘पैशन’ कहते हो, वह धूप में रखे पेट्रोल की तरह उड़ जाता है जब ज्यामिति तुम्हारे खिलाफ हो जाती है।
(उफ्फ… सर दर्द हो रहा है।)
इस ज्यामितीय नरक से बचने के लिए तुम क्या करते हो? तुम बाजारवाद की शरण में जाते हो। तुम्हें लगता है कि अगर तुम अपनी पीठ के नीचे एक हर्मन मिलर की एर्गोनोमिक कुर्सी लगा लोगे, तो यह वक्रता सीधी हो जाएगी। तुम डेढ़ लाख रुपये खर्च करते हो, यह सोचकर कि वह जालीदार कपड़ा और लम्बर सपोर्ट तुम्हारे दिमाग के रसायनों को संतुलित कर देंगे और तुम फिर से ‘प्रोडक्टिव’ हो जाओगे। पर हकीकत यह है कि तुम बस एक बेहद महंगी सीट पर बैठकर उसी पुराने, मुड़े हुए और ऊबड़-खाबड़ रास्ते पर घिसट रहे हो। या फिर तुम सोनी के नॉइस कैंसिलिंग हेडफोन खरीदते हो, ताकि दुनिया का शोर बंद हो सके और तुम ‘फोकस’ कर सको। लेकिन शोर बाहर नहीं है, जनाब। शोर उस एन्ट्रापी (Entropy) का है जो तुम्हारी खोपड़ी के भीतर बढ़ रही है। सन्नाटे में वह और भी तेज सुनाई देता है।
असली त्रासदी यह है कि जिसे तुम ‘मेहनत’ कहते हो, वह भौतिकी की नजर में सिर्फ ‘ऊष्मा’ (Heat) की बर्बादी है। प्रकृति को तुम्हारी डेडलाइन या तुम्हारे बोनस से कोई मतलब नहीं है। तुम्हारा दिमाग थर्मोडायनामिक्स के दूसरे नियम का गुलाम है—वह हमेशा कम ऊर्जा वाले रास्ते की तलाश में रहता है। जिसे तुम्हारे मैनेजर ‘कामचोरी’ कहते हैं, वह वास्तव में एक जैविक ‘जियोडेसिक’ है—ऊर्जा बचाने का सबसे प्राकृतिक और कुशल रास्ता। हम सब बस इस उबड़-खाबड़ मानसिक पहाड़ से नीचे लुढ़कने की कोशिश कर रहे पत्थर हैं, और यह पूरी कॉर्पोरेट मशीनरी हमें वापस ऊपर धकेलने की सिसिफस जैसी कोशिश कर रही है।
(क्या बकवास है सब।)
अब यह सब सोचना बंद करो। मेरे गिलास की बर्फ पिघल चुकी है और इस पब का ‘मीट्रिक टेंसर’ भी अब शराब के साथ बिगड़ने लगा है। यहाँ से घर जाने का रास्ता भी सीधा नहीं है; मुझे कई गलियों, रेड लाइटों और अपनी ही थकान के वक्र से गुजरना होगा। बस दुआ करो कि घर पहुँचने तक मेरा अपना ‘मैनिफोल्ड’ पूरी तरह से ध्वस्त न हो जाए। यह दुनिया एक बहुत बड़ा, बेतुका समीकरण है जिसे हल करने की कोशिश में हम सब धीरे-धीरे खर्च हो रहे हैं, और अंत में हासिल सिर्फ ‘शून्य’ होता है।
बिल चुकाओ। मुझे निकलना है।

コメント