सांख्यिकीय दासता

कीचड़ और मैनिफोल्ड

तुम्हारे इस तथाकथित ‘करियर’ की असलियत, सार्वजनिक शौचालय के फर्श पर जमी उस जिद्दी गंदगी से ज्यादा कुछ नहीं है जिसे तुम रगड़-रगड़ कर ‘अनुभव’ का नाम देते हो। दस साल तक एक ही कुर्सी पर जमकर बैठना और खुद को ‘सीनियर’ समझना—यह मानव इतिहास का सबसे बड़ा सांख्यिकीय ढकोसला है। अगर मैं सूचना ज्यामिति (Information Geometry) का नश्तर उठाकर तुम्हारे इस पेशेवर जीवन की चीर-फाड़ करूँ, तो वहां ‘विकास’ या ‘बुद्धिमानी’ का एक कतरा भी नहीं मिलेगा। वहां मिलेगी तो सिर्फ एक सिकुड़ी हुई प्रोबेबिलिटी डिस्ट्रीब्यूशन (Probability Distribution) और गणितीय हताशा।

जिसे तुम ‘कार्य अनुभव’ कहते हो, वह वास्तव में क्या है? वह केवल विकल्पों की हत्या है। जब तुम नौकरी शुरू करते हो, तो तुम अनिश्चितता (Uncertainty) से भरे होते हो—तुम्हारे पास गलतियां करने की आजादी होती है। लेकिन जैसे-जैसे साल बीतते हैं, तुम उस ‘टास्क स्पेस’ (Task Space) में एक रटे-रटाए जियोडेसिक (Geodesic) पर चलने वाले खच्चर बन जाते हो। यह कोई उपलब्धि नहीं है; यह इस बात का प्रमाण है कि तुमने अपने भीतर की अराजकता को मारकर खुद को एक रेखीय समीकरण (Linear Equation) में बदल दिया है। तुम अब इंसान नहीं, बस एक ऐसी एल्गोरिदम हो जिसका ‘लॉस फंक्शन’ (Loss Function) शून्य के करीब पहुँच चुका है।

फिशर सूचना का पिंजरा

तुम्हें लगता है कि तुम निर्णय ले रहे हो? बकवास। तुम्हारे दिमाग का फिशर सूचना मैट्रिक्स (Fisher Information Matrix) अब इतना सघन हो चुका है कि तुम्हारे पास ‘नया’ सोचने की कोई गुंजाइश ही नहीं बची। यह मैट्रिक्स उस जेल की दीवारों की तरह है जो यह तय करती है कि तुम कितना भटक सकते हो। जब तुम गर्व से कहते हो, “मुझे पता है कि क्लाइंट क्या चाहता है,” तो तुम दरअसल यह स्वीकार कर रहे हो कि तुम्हारी विचरण (Variance) क्षमता मर चुकी है।

इसी मरे हुए तजुर्बे को सहलाने के लिए तुम बाज़ार से हर्मन मिलर की एर्गोनोमिक कुर्सी खरीदते हो। डेढ़ लाख रुपये का प्लास्टिक और जाली! किसलिए? ताकि जिस रीढ़ की हड्डी को कॉरपोरेट जगत ने पहले ही नैतिक रूप से तोड़ दिया है, उसे भौतिक रूप से थोड़ा आराम मिल सके? यह तो वही बात हुई कि कसाईखाने की लाइन में खड़ा बकरा अपने लिए मखमली पायदान की मांग कर रहा हो। तुम उस कुर्सी पर बैठकर जो ‘स्ट्रैटेजी’ बनाते हो, वह असल में उस कुर्सी की कीमत चुकाने के लिए किया गया एक और सांख्यिकीय समझौता है। तुम डेटा पॉइंट्स के बीच के ‘कुलबैक-लीब्लर डाइवर्जेंस’ (KL Divergence) को कम करने में अपनी जवानी खपा रहे हो, और तुम्हें लगता है कि तुम दुनिया बदल रहे हो।

वक्रता और विखंडन

सच्चाई तो यह है कि कॉरपोरेट सीढ़ी पर चढ़ना, एक उच्च-आयामी (High-dimensional) मैनिफोल्ड पर रेंगने जैसा है जहाँ वक्रता (Curvature) इतनी तीखी है कि एक गलत कदम तुम्हें रसातल में भेज सकता है। मुंबई की लोकल ट्रेन में लटकते हुए उस आदमी को देखो—उसका हर फैसला, हर कदम, भीड़ के दबाव (Pressure) और ज्यामिति का परिणाम है, उसकी अपनी इच्छा का नहीं। तुम भी वही हो। बस तुम्हारी ट्रेन वातानुकूलित है और उसमें कॉफी मशीन लगी है।

जब डेटा अधूरा होता है, तो तुम्हारा दिमाग उसे भरने के लिए ‘गट फीलिंग’ या ‘अंतर्ज्ञान’ का आविष्कार करता है। यह सब न्यूरोबायोलॉजिकल कचरा है। यह शोर (Noise) है। तुम अपनी जेब से वह मॉन्टब्लैंक का कीमती पेन निकालकर जिन कागज़ों पर हस्ताक्षर करते हो, वे भविष्य के रद्दी के सिवा कुछ नहीं हैं। तुम उस पेन की चमक से अपनी अस्तित्वहीनता को ढकने की कोशिश कर रहे हो। एन्ट्रापी (Entropy) जीत रही है, मेरे दोस्त। तुम जितना ‘व्यवस्थित’ होने की कोशिश करते हो, तुम उतने ही ऊष्मप्रवैगिकी (Thermodynamics) के नियमों के गुलाम बनते जाते हो।

एक सीनियर वाइस प्रेसिडेंट और एक वेंडिंग मशीन में सिर्फ इतना फर्क है कि मशीन को लात मारने पर वह कभी-कभी मुफ्त की कोक दे देती है, लेकिन तुम? तुम तो बस इनपुट लेते हो और वही घिसा-पिटा आउटपुट देते हो। तुम एक सांख्यिकीय शव हो जो अभी तक यह नहीं जानता कि वह मर चुका है।

वेटर, व्हिस्की। बिना बर्फ के।

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