श्रम और एन्ट्रॉपी

विश्वविद्यालय के पीछे वाले उस सीलन भरे ढाबे में बैठकर…

जब मैं अपनी थाली में पड़ी ठंडी और अजीब सी दिखने वाली दाल को घूरता हूँ, जिसके ऊपर एक मक्खी पिछले पांच मिनट से ‘ब्राउनियन गति’ (Brownian Motion) का प्रदर्शन कर रही है, तो मुझे उसमें ब्रह्मांड का एक कड़वा और अंतिम सच दिखाई देता है। वह प्लेट, जिसमें अब स्वाद के नाम पर केवल तेल और निराशा बची है, बिल्कुल आपके आधुनिक जीवन और उस कांच के पिंजरे—जिसे आप ऑफिस कहते हैं—का सटीक प्रतिबिंब है। जिसे आप अपना ‘करियर’ कहते हैं, वह ऊष्मागतिकी (Thermodynamics) की निष्ठुर नजर में सिवाय इसके और कुछ नहीं कि आप अपनी जीवन ऊर्जा को ब्रह्मांडीय कचरे और बेकार की गर्मी में बदल रहे हैं।

उत्पादकता की दुर्गंध और बिखरते ढांचे

‘उत्पादकता’ या ‘प्रोडक्टिविटी’—यह वह चाबुक है जिसे पूंजीवाद के ठेकेदार आप जैसे मवेशियों को एक सीधी रेखा में हांकने के लिए इस्तेमाल करते हैं। इल्या प्रिगोगिन ने जिसे ‘डिसिपेटिव स्ट्रक्चर्स’ (Dissipative Structures) कहा था, वह वास्तव में आपका कॉर्पोरेट संगठन है। यह एक ऐसा अस्थिर ढांचा है जो अगर बाहर से मिलने वाली तनख्वाह, कैफीन, और आपकी मानसिक शांति को ईंधन के रूप में न निगले, तो ताश के पत्तों की तरह बिखर जाएगा। यह व्यवस्था अपने आप में नहीं टिक सकती; इसे जिंदा रहने के लिए आपको जलाना पड़ता है।

मीटिंग रूम में जो ‘सिनर्जी’, ‘इनोवेशन’ और ‘पैराडाइम शिफ्ट’ जैसे भारी-भरकम शब्द उछाले जाते हैं, उनकी हकीकत लोकल ट्रेन में बगल वाले यात्री के मुंह से निकलती लहसुन और बासी प्याज की मिली-जुली बदबू जैसी है। यह शोर है, शुद्ध और मिलावट रहित शोर। यह कुछ भी नया पैदा नहीं कर रहा; यह केवल माहौल में बेचैनी और ‘एन्ट्रॉपी’ (अव्यवस्था) को बढ़ा रहा है। आप जो हर सुबह अपनी रंग-बिरंगी ‘टू-डू लिस्ट’ बनाते हैं, वह उस डूबते हुए जहाज से चम्मच से पानी बाहर निकालने की एक दयनीय और हास्यास्पद कोशिश जैसा है, जिसके पेंदे में पहले से ही एक विशालकाय छेद हो चुका है। आप बस अपनी तबाही को व्यवस्थित करने का नाटक कर रहे हैं।

मैक्सवेल का डिजिटल जल्लाद

और फिर इस अराजकता के बीच प्रवेश करता है वह ‘ऑटोमेटेड सॉर्टिंग सिस्टम’—उन्नीसवीं सदी के भौतिक विज्ञानी जेम्स क्लर्क मैक्सवेल का वह काल्पनिक राक्षस, जो अब सिलिकॉन चिप्स और सर्वर रूम की ठंडी हवा में बसा हुआ है। यह डिजिटल राक्षस आपके निकम्मे बॉस द्वारा भेजे गए बेतुके आदेशों, मार्केटिंग के झूठे वादों और क्लाइंट्स की गालियों को ‘महत्वपूर्ण’ और ‘कचरा’ में विभाजित करता है।

लेकिन गलतफहमी में मत रहना। यह कोई दैवीय सहायता नहीं है; यह एक निष्ठुर फिल्टर है। यह इसलिए मौजूद है ताकि आपका नाजुक मानवीय दिमाग उस सूचना के पहाड़ के नीचे दबकर फटे नहीं। इसका एकमात्र उद्देश्य आपको उस विशालकाय मशीन का एक कुशल पुर्जा बनाए रखना है। ताकि आप अपनी महंगी एर्गोनोमिक कुर्सी पर बैठकर—जिसे आपने शायद अपनी कमर बचाने के लिए नहीं, बल्कि अपने गिरते हुए आत्मसम्मान को सहारा देने और यह भ्रम पालने के लिए खरीदा था कि आप एक ‘प्रोफेशनल’ हैं—घंटों तक बिना शिकायत किए खटते रहें। यह कुर्सी आपकी रीढ़ की हड्डी को टेढ़ा होने से बचा सकती है, लेकिन यह उस क्रूर सत्य को नहीं बदल सकती कि आप एक विशालकाय थर्मल मशीन में सिर्फ एक और कोयले का टुकड़ा हैं जो धीरे-धीरे राख बन रहा है।

कब्ज, एल्गोरिदम और ऊष्मा-मृत्यु

हम जिस युग में जी रहे हैं, वहां सूचना का प्रवाह ‘बौद्धिक कब्ज’ का रूप ले चुका है। हमारे दिमाग अब और अधिक डेटा को पचाने में सक्षम नहीं हैं। ये एल्गोरिदम और स्वचालित प्रणालियाँ उस कब्ज की कड़वी दवा की तरह हैं—ये आपको अस्थायी राहत तो देते हैं, प्रवाह को बनाए रखते हैं, लेकिन आपकी सोचने, समझने और चीज़ों को पचाने की मौलिक क्षमता को खत्म कर देते हैं। मशीन जितना ज्यादा काम संभालेगी, आप उतने ही ज्यादा अप्रासंगिक होते जाएंगे। अंत में, आप केवल उस सिस्टम को ठंडा रखने के लिए पसीना बहाने वाले एक जैविक हीटर बनकर रह जाएंगे, जिसका काम बस कीबोर्ड पर उंगलियां पटकना है ताकि स्क्रीन पर रोशनी बनी रहे।

काम में अर्थ ढूँढना बंद करो। यह वैसा ही है जैसे फटे हुए मोज़े में ब्रह्मांड का रहस्य खोजना या खाली बटुए को घूरकर उसमें पैसे प्रकट होने की उम्मीद करना। हम सब धीरे-धीरे उस ‘हीट डेथ’ की ओर बढ़ रहे हैं जहाँ न डेडलाइन बचेगी, न बोनस, और न ही यह झूठी प्रतिष्ठा।

अपनी वह चाय नीचे रख दो। वह अब सिर्फ एक गंदा, ठण्डा तरल पदार्थ है जिसमें एन्ट्रॉपी जीत चुकी है। वापस अपनी स्क्रीन की ओर देखो और उस डिजिटल राक्षस द्वारा परोसे गए कचरे को निगलो।

コメント

タイトルとURLをコピーしました