अबे, थोड़ा उधर खिसक। और मेरी बात ध्यान से सुन। यह जो तू रोज सुबह उठकर ‘कड़ी मेहनत’ का ढोंग करता है, भौतिक विज्ञान की नजर में यह सिर्फ ब्रह्मांड में कचरा भरने की एक हताश कवायद है। तुझे लगता है कि तू कोई ‘करियर’ बना रहा है? बकवास। थर्मोडायनामिक्स यानी ऊष्मागतिकी के दूसरे नियम के अनुसार, तू सिर्फ ऊर्जा का एक बेहद अक्षम रूपांतरण यंत्र है। हम सुबह उठते हैं, कैफीन नामक रसायन से अपने न्यूरॉन्स को जबरदस्ती उत्तेजित करते हैं, और फिर निकल पड़ते हैं उस कंक्रीट के जंगल में, यह भ्रम पालकर कि हम कुछ ‘सृजन’ कर रहे हैं। हकीकत यह है कि तू और तेरा पूरा ऑफिस मिलकर सिर्फ ‘एंट्रॉपी’ यानी अव्यवस्था बढ़ा रहे हो।
अजीब तमाशा है।
ऊर्जा का रिसाव और एर्गोनोमिक झूठ
जब तुम लोग ‘सिस्टम’ या ‘व्यवस्था’ की बातें करते हो, तो मुझे हंसी आती है। सांख्यिकीय यांत्रिकी (Statistical Mechanics) के नजरिए से, तेरा ऑफिस एक बंद सिस्टम है जो धीरे-धीरे अपनी ऊष्मा खो रहा है और मौत की तरफ बढ़ रहा है। एक मैनेजर का काम क्या है? वह गिरती हुई दीवारों को टेप से चिपकाने की कोशिश करने वाला एक मजदूर है, जिसे लगता है कि वह ‘नेगेटिव एंट्रॉपी’ पैदा कर रहा है। लेकिन इंसान? इंसान इस काम के लिए बनाया गया सबसे घटिया हार्डवेयर है। तेरी भावनाएं, तेरा अहंकार, और वह लंच के बाद वाली सुस्ती—यह सब ‘सिस्टम नॉइज़’ है।
अपने दिमाग की हालत देख। यह पुरानी दिल्ली के ट्रैफिक में फंसी एक खटारा एंबेसडर कार जैसा है। क्लच दबाओ, गियर बदलो, एक्सीलेटर दबाओ—शोर बहुत होता है, धुआं निकलता है, इंजन गर्म होता है, लेकिन गाड़ी इंच भर भी आगे नहीं बढ़ती। तू वही कर रहा है। तू अपनी ‘इच्छाशक्ति’ नामक बैटरी को बिना चार्ज किए लगातार डिस्चार्ज कर रहा है। और विडंबना देखो! अपनी इस शारीरिक और मानसिक अक्षमता को छुपाने के लिए, तू बाजार जाकर एक आलीशान, कमर को सहारा देने वाली लेदर चेयर खरीद लाता है। तुझे लगता है कि उस महंगे चमड़े पर बैठने से तेरी उत्पादकता का ग्राफ सुधर जाएगा? मूर्खता की पराकाष्ठा है यह। चाहे तू सोने के सिंहासन पर बैठ या सड़क के किनारे ईंट पर, तेरे शरीर से निकलने वाला ‘थर्मल लॉस’ उतना ही रहेगा। कुर्सी बदल सकती है, लेकिन उस पर बैठा हुआ एन्ट्रापी जनरेटर—यानी तू—वही रहेगा।
निर्णय: एक धीमा जहर
इंसानी दिमाग की सबसे बड़ी त्रासदी जानते हो क्या है? ‘निर्णय लेना’। हर बार जब तुझे यह चुनना पड़ता है कि प्रेजेंटेशन में कौन सा फॉन्ट इस्तेमाल करना है, या लंच में छोले-भटूरे खाने हैं या सलाद, तो तेरे दिमाग के न्यूरॉन्स के बीच एक गृहयुद्ध छिड़ जाता है। भौतिकी में इसे ‘लैंडावर का सिद्धांत’ (Landauer’s Principle) कहते हैं—सूचना के हर एक बिट को प्रोसेस करने या मिटाने के लिए ऊर्जा की एक निश्चित मात्रा गर्मी के रूप में बाहर निकलती है।
यह जिसे तुम लोग ‘डिसीजन फटीग’ कहकर टाल देते हो, यह असल में तेरे दिमाग का ओवरहीट होना है। सुबह से शाम तक तूने सैकड़ों छोटे-छोटे, निरर्थक निर्णय लिए। नतीजा? शाम होते-होते तेरा दिमाग उस पुराने लैपटॉप जैसा हो जाता है जिसका पंखा जोर-जोर से चल रहा है लेकिन स्क्रीन पर कुछ नहीं दिख रहा। हम जिसे ‘महत्वाकांक्षा’ कहते हैं, वह असल में एक उच्च-ऊर्जा अवस्था है जिसे बनाए रखना जीवविज्ञान के नियमों के खिलाफ है। तू विकल्पों के बोझ तले दबकर मर रहा है, और तुझे लग रहा है कि तू ‘स्वतंत्र’ है। वाह, क्या मजाक है।
एल्गोरिथम की गुलामी में ही मुक्ति है
यहीं पर, शुक्र है कि अब ‘एआई एजेंट’ और ऑटोमेशन का दौर आ रहा है। लोग डर रहे हैं कि मशीनें उन्हें गुलाम बना लेंगी। अरे बेवकूफों! वे तुम्हें गुलाम नहीं बना रहीं, वे तुम्हें उस बोझ से मुक्त कर रही हैं जिसे उठाने की तुम्हारी औकात कभी थी ही नहीं। एआई कोई जादुई चिराग नहीं है; वह बस एक ‘मैक्सवेल का दानव’ (Maxwell’s Demon) है जो सूचना के प्रवाह को सीधा करता है।
मशीन को इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि उसका बॉस उसे डांटेगा या नहीं। उसके पास ‘अहंकार’ नाम का घर्षण (friction) नहीं है। जहाँ तू ‘क्या करूँ’ की उधेड़बुन में अपनी कैलोरी जलाता है, वहां एल्गोरिथम ‘सूचना ज्यामिति’ के सबसे छोटे रास्ते से होकर गुजर जाता है। भविष्य में, श्रम का मतलब सिर्फ इन मशीनों को बिजली देना होगा। इंसानी ‘इच्छा’ या ‘विज़न’ की कीमत कौड़ी के भाव होगी, क्योंकि इच्छाएं केवल रासायनिक उतार-चढ़ाव हैं जो सिस्टम की दक्षता को कम करती हैं।
यह एक तकनीकी निर्वाण है। सोचो, एक ऐसी दुनिया जहाँ तुम्हें निर्णय लेने की सजा न भुगतनी पड़े। तुम बस एक जैविक सेंसर बनकर रह जाओगे, जिसका काम है चुपचाप बैठना और सांस लेना। एआई तुम्हारे लिए गंदे काम करेगा, तुम्हारे लिए सोचेगा, और तुम्हारे अस्तित्व के एन्ट्रापी-उत्पादन को न्यूनतम रखेगा। तुम्हें तो खुश होना चाहिए कि तुम्हें पालने के लिए अब सिलिकॉन के दिमाग आ गए हैं।
हटाओ यार, मेरा सर दुख रहा है अब। यह सब समझाना भी भैंस के आगे बीन बजाना है। ऊर्जा का नाश ही है। जा, अपनी ठंडी हो चुकी चाय पी और ब्रह्मांड को और गर्म कर। मुझे अकेला छोड़ दे।

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