एंट्रॉपी का धंधा

ये जो बड़ी-बड़ी कॉरपोरेट इमारतों के वातानुकूलित कमरों में बैठकर सूट-बूट वाले लोग ‘पब्लिक वेलफेयर’ और ‘सोशल इम्पैक्ट’ की बातें करते हैं, असल में यह सब किसी सड़क किनारे मिलने वाले उस समोसे जैसा है जिसमें आलू तो सड़ा हुआ है, लेकिन उसे तलने वाला तेल और मसालेदार खुशबू इतनी तेज है कि आप असली सड़ांध को पहचान नहीं पाते। लोग समझते हैं कि वे समाज का भला कर रहे हैं, जबकि सच्चाई यह है कि वे बस अपनी संस्था के अंदर बढ़ रही अव्यवस्था यानी ‘एंट्रॉपी’ को बाहर फेंकने की कोशिश कर रहे हैं। किसी भी संगठन की ‘सार्वजनिकता’ (Publicness) कोई नैतिक गुण नहीं है। यह तो शुद्ध भौतिकी है। जैसे मुम्बई की लोकल ट्रेन में भीड़ एक खास तरह का पैटर्न बना लेती है—ताकि कोई गिरे नहीं—ठीक वैसे ही कंपनियां खुद को ‘पब्लिक सर्विस’ का चोला ओढ़ाती हैं ताकि वे अपने अंदर की गंदगी को समाज के आंगन में उड़ेल सकें। इसे विज्ञान की भाषा में ‘नॉन-इक्विलिब्रियम थर्मोडायनामिक्स’ कहते हैं। सरल शब्दों में? यह एक ऐसा खेल है जहाँ आप खुद को ठंडा रखने के लिए पड़ोसी के घर में अपनी ए़सी (AC) की गरम हवा छोड़ते हैं।

भ्रम का बाजार

अक्सर प्रबंधन के तथाकथित गुरु ‘वैल्यू को-क्रिएशन’ (Value Co-creation) जैसे शब्दों को ऐसे उछालते हैं जैसे कोई मदारी बंदर नचा रहा हो। लेकिन कभी गौर से देखा है? एक ऑफिस में जितनी ज्यादा मीटिंग्स होती हैं, उतनी ही ज्यादा ऊर्जा ‘फ्रिक्शन’ यानी घर्षण में बर्बाद होती है। आप इसे ‘टीम वर्क’ कहते हैं, मैं इसे ‘हीट लॉस’ कहता हूँ। लोग सोचते हैं कि नियम बनाने से व्यवस्था आती है। यह वैसी ही गलतफहमी है जैसे किसी मध्यमवर्गीय मैनेजर को लगे कि अगर वह अपनी कलाई पर एक स्विट्जरलैंड की महँगी यांत्रिक घड़ी बांध लेगा, तो उसका वक्त सुधर जाएगा। वह घड़ी वक्त नहीं बताती, वह बस यह गिनती है कि आपकी जवानी कितनी महँगी कीमत पर बर्बाद हो रही है। सच्चाई तो यह है कि इंसान का दिमाग एक ‘प्रेडिक्टिव मशीन’ है जो हर वक्त पैटर्न ढूंढती है। जब हमें काम में कोई अर्थ (Meaning) नहीं दिखता, तो हमारा न्यूरोनल सर्किट चिल्लाने लगता है। उस चिल्लाहट को दबाने के लिए हम ‘मिशन स्टेटमेंट’ और ‘विजन’ के नाम पर कविताएं लिखते हैं। यह सब सिर्फ इसलिए है ताकि संगठन की एंट्रॉपी—यानी वह स्वाभाविक बिखराव जो हर चीज को राख बना देता है—उसे कम किया जा सके।

पसीने और रक्त की ऊष्मागतिकी

अब थोड़ा इल्या प्रिगोजिन (Ilya Prigogine) की नजर से इस सर्कस को देखते हैं। कोई भी जीवित संगठन एक ‘डिसिपेटिव स्ट्रक्चर’ (Dissipative Structure) है। मतलब, इसे जिंदा रहने के लिए लगातार ऊर्जा खानी पड़ती है और कचरा बाहर फेंकना पड़ता है। जब कोई कंपनी कहती है कि वह ‘पब्लिक वैल्यू’ पैदा कर रही है, तो वह असल में समाज के संसाधनों को खा रही है ताकि अपनी संरचना को टूटने से बचा सके। मजदूर की मेहनत क्या है? वह ‘लो-एंट्रॉपी’ इनपुट है। वह अपनी नसों की ऊर्जा देता है ताकि एक्सेल शीट के कॉलम सीधे रहें। लेकिन इस प्रक्रिया में जो मानसिक थकान पैदा होती है, वह उस मजदूर के निजी जीवन की एंट्रॉपी बढ़ा देती है। घर जाकर वह अपनी पत्नी पर चिल्लाता है या सस्ती शराब पीता है—यह उस ‘बिजनेस वैल्यू’ का थर्मल बाय-प्रोडक्ट है। हम जिसे ‘सफलता’ कहते हैं, वह दरअसल दूसरों के हिस्से की शांति को चुराकर बनाई गई एक कृत्रिम ठंडक है। अपनी गर्दन में इटली के रेशम की टाई कसकर बांधने से उस मजदूर के गले में फंदा ढीला नहीं हो जाता, बस घुटने का अहसास थोड़ा रेशमी हो जाता है। यह ठीक वैसा ही है जैसे स्मार्टफोन की बैटरी का फूल जाना; आप जितना ज्यादा उसे ‘स्मार्ट’ बनाने की कोशिश करेंगे, उसके अंदर के केमिकल्स उतने ही जल्दी अपनी उम्र पूरी करेंगे।

शून्यता का सत्य

तो क्या ‘वैल्यू को-क्रिएशन’ एक धोखा है? नहीं, यह एक सामूहिक मतिभ्रम (Mass Hallucination) है। जब बहुत सारे लोग एक साथ किसी गलतफहमी में यकीन करने लगते हैं, तो वह सच जैसा दिखने लगता है। इसे ही हम ‘ब्रांड’ या ‘कॉरपोरेट कल्चर’ कहते हैं। लेकिन थर्मोडायनामिक्स का दूसरा नियम किसी के बाप की नहीं सुनता। हर सिस्टम अंततः ‘थर्मल डेथ’ की ओर बढ़ रहा है। आप चाहे कितनी भी सस्टेनेबिलिटी की बातें कर लें, आप बस विनाश की गति को थोड़ा धीमा कर रहे हैं। लोग अक्सर पूछते हैं कि इस सबका समाधान क्या है? समाधान ढूंढना ही सबसे बड़ी बेवकूफी है। यह मान लेना कि हम इस ब्रह्मांड के बिखराव को रोक सकते हैं, वैसा ही है जैसे किसी सरकारी दफ्तर के बाबू का यह सोचना कि उसकी फाइलें कभी गुम नहीं होंगी। वह बाबू अपनी फटी हुई कुर्सी पर बैठकर जो चाय पी रहा है, वह चाय ठंडी हो रही है—यही एकमात्र परम सत्य है। बाकी सब तो बस उस ठंडी होती चाय के ऊपर जमी हुई मलाई है जिसे हम ‘पब्लिक पॉलिसी’ का नाम देते हैं। अगली बार जब आप किसी सेमिनार में ‘इन्नोवेशन’ और ‘को-क्रिएशन’ के बारे में सुनें, तो बस अपनी उस कीमती फाउंटेन पेन की निब को देखिएगा जिससे आप नोट्स बना रहे हैं। वह स्याही नहीं उगल रही, वह धीरे-धीरे आपका अस्तित्व लिख रही है जो अंततः रद्दी की टोकरी में जाएगा। हम सब बस एक बड़े धमाके के बाद के बिखरे हुए टुकड़े हैं, जो फिर से जुड़ने का नाटक कर रहे हैं। और इस नाटक का टिकट बहुत महंगा है। इतना महंगा कि इसे चुकाते-चुकाते हम खुद ही खर्च हो जाते हैं। काम पर वापस जाओ, तुम्हारी एंट्रॉपी अभी पूरी तरह डिस्चार्ज नहीं हुई है।

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