श्रम की ज्यामिति

पिछली बार जब हम उस सीलन भरी शराबखाने में बैठे थे, जहाँ हवा में सस्ती बीयर और हताशा की गंध मिली हुई थी, तो हमने चर्चा की थी कि कैसे कॉर्पोरेट जगत ने ‘समय’ को एक सड़ी हुई वस्तु बना दिया है। लेकिन ईमानदारी से कहूँ तो, क्या आपको सच में लगता है कि सुबह 9 से शाम 5 बजे तक उस प्लास्टिक के कीबोर्ड पर उंगलियाँ पटकने से कुछ सार्थक पैदा होता है? यह केवल एक सांख्यिकीय शोर है, जो उस शोर से अलग नहीं है जो एक पुरानी बस के इंजन से निकलता है और जिसे कोई ठीक करने की जहमत नहीं उठाता। जिसे दुनिया ‘कड़ी मेहनत’ कहती है, वह वास्तव में थर्मोडायनामिक्स के दूसरे नियम के खिलाफ एक हारी हुई जंग है। हम बस एन्ट्रॉपी बढ़ा रहे हैं और उसे ‘करियर’ का नाम दे रहे हैं। जैसे कोई भिखारी फटे हुए कपड़ों को सिलने की कोशिश करे, हम भी अपने अस्तित्व के चिथड़ों को ‘प्रोफेशनल ग्रोथ’ के धागे से सी रहे हैं।

यह सब एक बीमार कर देने वाला तमाशा है।

घंटों का भ्रम और मखमली पिंजरे

श्रम को अक्सर घंटों में मापा जाता है, जैसे कि हम कोई पुराने जमाने के कोल्हू के बैल हों जिसे केवल कोड़े की मार और चारे की गंध समझ आती है। लेकिन यदि हम इसे ‘सूचना ज्यामिति’ (Information Geometry) के चश्मे से देखें, तो श्रम की गुणवत्ता आपके द्वारा खर्च किए गए पसीने में नहीं, बल्कि उस अनिश्चितता में छिपी है जिसे आपने नष्ट किया है। यह एक सांख्यिकीय सत्य है, कोई दार्शनिक जुमला नहीं। जिसे आप ‘ईमानदारी’ या ‘निष्ठा’ कहते हैं, वह न्यूरोसाइंस की दृष्टि से केवल एक न्यूरल पाथवे का बार-बार सक्रिय होना है—एक मानसिक खुजली जिसे आप मिटा नहीं सकते। लोग सोचते हैं कि वे दुनिया बदल रहे हैं, जबकि वे केवल अपने मस्तिष्क में डोपामाइन की एक छोटी सी लहर के लिए तरस रहे होते हैं, जो उतनी ही अस्थायी है जितनी कि स्टेशन पर मिलने वाले गर्म समोसे की महक—खाते ही गायब।

जब आप एक ऐसी अत्यधिक आरामदायक एर्गोनोमिक कुर्सी पर बैठते हैं जिसकी कीमत आपकी तीन महीने की तनख्वाह से ज्यादा है, तो क्या आपकी ‘फिशर सूचना’ (Fisher Information) वास्तव में बढ़ जाती है? या आप बस एक महंगे मखमली पिंजरे में बैठे एक अधिक आरामदायक सांख्यिकीय डेटा बिंदु बन जाते हैं? इस कुर्सी की कीमत को देखकर ही मुझे घृणा होती है। क्या वाकई एक इंसानी रीढ़ की हड्डी को सीधा रखने के लिए, जो अंततः मिट्टी में ही मिलनी है, इतने लाख रुपये खर्च करने की जरूरत है? यह केवल उस असुरक्षा को ढकने का एक तरीका है जो हर महीने के अंत में बैंक बैलेंस को देखकर पैदा होती है। आप आराम नहीं, बल्कि अपनी गुलामी के लिए एक बेहतर गद्दी खरीद रहे हैं।

क्या बकवास है।

फिशर सूचना: पसीने का गणित

सूचना ज्यामिति में, काम की गुणवत्ता को एक ‘रीमानियन मैनिफोल्ड’ (Riemannian Manifold) पर वक्रता के रूप में देखा जा सकता है। यह अवधारणा थोड़ी भारी लग सकती है, लेकिन इसे उस कड़वी चाय की तरह गटक लीजिए जो नींद उड़ाने के लिए जरूरी है। फिशर सूचना (Fisher Information) वह मैट्रिक है जो मापती है कि आपका श्रम वास्तविकता के ताने-बाने को कितना ‘मोड़ता’ है। यदि आपका श्रम उच्च गुणवत्ता का है, तो आपके द्वारा किया गया हर छोटा कार्य सूचना के स्थान (Information Space) में एक बड़ा भूकंप लाता है। यह एक तीखी, नुकीली सांख्यिकीय चोटी की तरह होना चाहिए।

लेकिन आजकल की ‘तर्क की स्वचालित चक्कियाँ’ (Automated Logic Mills)—जिन्हें लोग मसीहा मान रहे हैं—इस वक्रता को सपाट कर रही हैं। वे आपके दिमाग को एक ऐसी इस्त्री की तरह दबा रही हैं जो हर मौलिक विचार की सिलवट को मिटा देती है। हम एक ‘फ्लैट’ दुनिया की ओर बढ़ रहे हैं जहाँ सब कुछ यूक्लिडियन (Euclidean) है, सब कुछ सीधा और सरल है। कोई गहराई नहीं, कोई संघर्ष नहीं। जैसे स्टेशन पर मिलने वाली दाल में पानी ज्यादा होता है और स्वाद गायब, वैसे ही आपके विचारों में अब कोई ‘सूचना घनत्व’ नहीं बचा है। हम बस शब्दों को इधर-उधर कर रहे हैं, बिना किसी वास्तविक अर्थ के निर्माण के।

बौद्धिक वक्रता का पतन

जब आप अपनी अक्षमता को छिपाने के लिए उस बेहद महंगे चांदी के लैपटॉप का उपयोग करते हैं, तो आप केवल अपनी मानसिक दरिद्रता का प्रदर्शन कर रहे होते हैं। डेढ़ लाख की मशीन का इस्तेमाल अगर सिर्फ ‘हां जी, सर’ टाइप करने के लिए हो रहा है, तो यह तकनीक का नहीं, बल्कि मानव चेतना का अपमान है। यह ‘यांत्रिक तर्क’ एक लोहे के प्रेस की तरह काम कर रहा है जो मानव विचार की जटिलता को एक नीरस समतल मैदान में बदल देता है। जब आप किसी जटिल कार्य के लिए इन परजीवी सर्किटों का उपयोग करते हैं, तो आप उस कार्य की ‘संज्ञानात्मक वक्रता’ (Cognitive Curvature) को कृत्रिम रूप से कम कर रहे होते हैं।

यह वैसा ही है जैसे किसी पहाड़ पर चढ़ने के बजाय लिफ्ट ले लेना और फिर यह दावा करना कि आप एक पर्वतारोही हैं। आपके फेफड़ों ने उस ऊंचाई के संघर्ष को कभी महसूस ही नहीं किया। आपकी मेहनत उतनी ही खोखली है जितनी कि एक बाजारू मिठाई, जिसमें चीनी की परत के नीचे फफूंद लगी हो। पुराने जमाने में एक गणितीय समस्या को हल करने में जो पसीना आता था, वह अब एक क्लिक में सिमट गया है। हमने अपनी विशिष्टता को एक कोड के हाथों बेच दिया है, और वह भी बहुत कौड़ियों के दाम पर। क्या आपको लगता है कि आपकी रचनात्मकता सुरक्षित है? यह केवल आपके न्यूरॉन्स के बीच का एक मामूली सांख्यिकीय विचलन है जिसे जल्द ही ‘अनुकूलित’ करके खत्म कर दिया जाएगा।

घर जाना चाहता हूँ, यहाँ की हवा में अब केवल मशीनी तर्क की बदबू है।

अंततः, हम सब एक विशाल सांख्यिकीय कूड़ेदान के हिस्से हैं, जहाँ हमारी ‘मेहनत’ केवल एक मार्जिनल एरर (Marginal Error) बनकर रह जाएगी। जिस दिन फिशर सूचना का प्रवाह शून्य हो जाएगा, उस दिन आपकी इस तथाकथित ‘प्रोफेशनल लाइफ’ का अंत हो जाएगा। तब तक, अपनी उस महंगी कुर्सी पर बैठिए, अपने लाखों के लैपटॉप पर बेकार के ईमेल टाइप कीजिए, और खुद को यह झूठ बोलते रहिए कि आप कुछ ‘ठोस’ कर रहे हैं। वास्तविकता तो यह है कि आप केवल एक ठंडे, निर्जीव ज्यामितीय स्थान में एक बिंदु हैं जो धीरे-धीरे धुंधला होकर गायब होने वाला है।

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