अनिवार्य पतन का उत्सव
सुबह नौ बजे से शाम के छह बजे तक आप लोग अपनी मेजों पर झुककर जिस शिद्दत से ‘कीबोर्ड’ पीटते हैं, वह दृश्य किसी त्रासदी से कम नहीं है। क्या आपको वाकई लगता है कि आप कुछ ‘निर्माण’ कर रहे हैं? क्षमा करें, लेकिन एक थके हुए पर्यवेक्षक की नजर से देखूं तो आप केवल ब्रह्मांड की उस अनिवार्य सड़न—यानी ‘एंट्रॉपी’—को रोकने की एक नाकाम और भद्दी कोशिश कर रहे हैं। जिसे आप ‘करियर’ कहते हैं, वह भौतिक विज्ञान की दृष्टि से केवल बासी होती दाल को बार-बार गर्म करके खाने योग्य बनाए रखने का संघर्ष है।
आप एक ‘डिसिपेटिव स्ट्रक्चर’ (Dissipative Structure) से ज्यादा कुछ नहीं हैं—एक ऐसा ढांचा जिसे अपनी झूठी व्यवस्था बनाए रखने के लिए लगातार ऊर्जा निगलनी पड़ती है और गंदगी बाहर उगलनी पड़ती है। जैसे सड़क किनारे ठेले पर चाट बेचने वाला मक्खियों को उड़ाने के लिए लगातार हाथ हिलाता रहता है, आपका 9-से-5 का तमाशा बस वही हाथ हिलाना है। मक्खियाँ फिर भी बैठेंगी, और अंत में सब कुछ सड़ना ही है।
पसीने और फाइलों का प्रपंच
जरा अपने दफ्तर के माहौल को सूंघिए। वातानुकूलित हवा के नीचे दबी हुई हताशा, मुंबई की लोकल ट्रेन में एक-दूसरे से रगड़ खाते शरीरों के पसीने की गंध, और बॉस की बेमतलब बातों पर दी गई वह प्लास्टिक की हंसी। यह सब क्या है? यह ‘उष्मा’ (Heat) है। आप काम नहीं कर रहे, आप सिर्फ घर्षण पैदा कर रहे हैं।
हम सोचते हैं कि हम फाइलों को व्यवस्थित कर रहे हैं, लेकिन असल में हम केवल अराजकता को एक फोल्डर से दूसरे फोल्डर में धकेल रहे हैं। यह वैसा ही है जैसे किसी बहते हुए नाले में कागज की नाव चलाकर यह सोचना कि आपने जल परिवहन पर काबू पा लिया है। थर्मोडायनेमिक्स का दूसरा नियम आपकी हर एक्सेल शीट, हर पावरपॉइंट प्रेजेंटेशन पर हंस रहा है: ‘विकार (Disorder) हमेशा बढ़ेगा।’ आप धूल साफ करते हैं, धूल फिर जमती है। यह सिसिफस (Sisyphus) की कहानी है, बस इसमें पत्थर की जगह लैपटॉप है और पहाड़ की जगह मासिक ईएमआई (EMI) है।
सस्ती मशीनों का ठंडा सन्नाटा
और अब, अपनी इस नाकामी को छुपाने के लिए आप उन ‘सस्ती गणना मशीनों’ (जिन्हें कुछ मूर्ख ‘बुद्धिमत्ता’ कहते हैं) का सहारा ले रहे हैं। ये सिलिकॉन के नौकर क्या हैं? ये केवल ‘एंट्रॉपी रिडक्शन इंजन’ हैं। जो काम करने में आपके दिमाग की नसें फट जाती थीं—डेटा के उस रायते को समेटना—ये मशीनें उसे बिना उफ किए कर देती हैं। वे एक मुर्दाघर के रेफ्रिजरेटर की तरह ठंडी और कुशल हैं।
लेकिन समस्या यही है। मशीनें ‘कुशल’ हैं क्योंकि उनके पास आत्मा का बोझ नहीं है। उन्हें न तो घर के राशन की चिंता है और न ही शुक्रवार की शाम का इंतजार। वे बस सफाई कर्मचारी हैं जो सूचनाओं के कचरे को बुहार रही हैं। जब आप अपने सारे काम इन निर्जीव डिब्बों को सौंप देते हैं, तो आप अपनी उस इकलौती खूबी को भी खो देते हैं जो आपको इंसान बनाती थी—’गलती करने की क्षमता’। एक पूरी तरह से व्यवस्थित दफ्तर, जहाँ कोई गलती नहीं होती, वह कब्रिस्तान से ज्यादा कुछ नहीं है। वहां सन्नाटा है, और सन्नाटे में जीवन नहीं पनपता।
अर्थहीनता का विलासितापूर्ण सौंदर्य
इंसान का असली मूल्य उसकी ‘बग्स’ (Bugs) में है। हम भटकते हैं, हम कामचोरी करते हैं, हम ‘जुगाड़’ लगाते हैं। विज्ञान की भाषा में इसे ‘सिमैंटिक फ्लक्चुएशन’ (Semantic Fluctuations) कहते हैं। जब आप काम के बीच में खिड़की से बाहर घूरते हुए समय बर्बाद करते हैं, तो दरअसल आप सिस्टम की कठोरता में एक छेद कर रहे होते हैं। वही छेद, जहाँ से कभी-कभार कोई नया विचार अंदर आ जाता है। मशीनें कभी खिड़की से बाहर नहीं झांकतीं।
विडंबना देखिए, हम इस अराजकता को नियंत्रित करने के लिए कितने बेताब हैं। जरा अपनी कलाई पर बंधी उस लाखों की जापानी मशीन को देखिए, जो सेकंड के हजारवें हिस्से तक की सटीकता का दावा करती है। यह कितनी बड़ी मूर्खता है—एक ऐसी चीज पर इतना पैसा फूंकना जो केवल उस समय को नप रही है जो रेत की तरह आपकी मुट्ठी से फिसल रहा है। यह घड़ी ‘समय’ नहीं बताती, यह आपके जीवन की ‘बर्बादी’ का हिसाब रखती है। जितनी ज्यादा सटीकता (Precision), उतना ही गहरा यह अहसास कि हम ब्रह्मांड के इस विशाल जुए में कितने छोटे मोहरे हैं। हम अपनी मौत का काउंटडाउन गिनने के लिए भी लग्जरी ढूंढते हैं।
क्या बकवास है यह सब।
कुल मिलाकर, हम एक ऐसी व्यवस्था का हिस्सा हैं जो हमारे पसीने को ईंधन की तरह जलाकर अपनी चमक बनाए रखती है। थोड़ा सा ‘रायता फैलाना’, थोड़ा सा बेतरतीब होना ही इस यांत्रिक जेल से बचने का एकमात्र रास्ता है। अपनी अव्यवस्था (Chaos) को गले लगाइए, क्योंकि आपकी ‘एफिशिएंसी’ वैसे भी एक झूठ है। थक गया हूँ मैं, अब जाओ और अपनी उस एक्सेल शीट में रंग भरने का नाटक जारी रखो, जैसे कि उससे दुनिया बदल जाएगी।

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