श्रम की ज्यामिति

कर्म का ऊष्मागतिकीय भ्रम

पिछली बार जब हम उस शोरगुल वाले पब में बैठे थे, तो तुमने ‘पैशन’ और ‘करियर’ के बारे में कुछ भावुक बातें कही थीं। सच कहूँ तो, वह सब सुनकर मुझे उबकाई आ रही थी। आज, इस सड़क किनारे के ढाबे पर, जहाँ चाय का स्वाद बैटरी के एसिड जैसा है, हम थोड़ी कड़वी सच्चाई पर बात करेंगे। जिसे तुम ‘करियर’ कहते हो, वह वास्तव में ‘फिशर इनफॉर्मेशन’ (Fisher Information) और ‘एन्ट्रॉपी’ के बीच का एक क्रूर खेल है। हम सब एक विशाल, अदृश्य ‘श्रम-बहुविध’ (Labor Manifold) पर रेंगने वाले कीड़े हैं, और तुम्हारी तथाकथित सफलता केवल इस बात पर निर्भर करती है कि तुम इस ज्यामितीय संरचना में अपनी जगह कितनी जल्दी और कितनी बेरहमी से बना पाते हो।

सिर में दर्द हो रहा है… शायद यह सस्ती शराब का नतीजा है।

कॉर्पोरेट जगत का यह मंत्र कि “अपने काम से प्यार करो”, सदी का सबसे बड़ा झूठ है। काम कोई रोमांस नहीं है; यह शुद्ध रूप से ऊर्जा का अपव्यय है। जब तुम सुबह की मेट्रो में, पसीने और हताशा की उस भीड़ में दबकर दफ्तर जाते हो, तो तुम वास्तव में एक सांख्यिकीय डेटा-पॉइंट होते हो जो अपने अस्तित्व को बनाए रखने के लिए संघर्ष कर रहा है। जिसे तुम ‘कौशल’ कहते हो, वह केवल एक प्रायिकता वितरण (probability distribution) है। तुम यह सुनिश्चित करने की कोशिश कर रहे हो कि सिस्टम तुम्हें ‘शोर’ मानकर बाहर न निकाल दे। और इस प्रक्रिया में, तुम्हारी रीढ़ की हड्डी का जो हाल होता है, उसे बचाने के लिए तुम लाखों की हर्मन मिलर एयरोन कुर्सी खरीदते हो। अजीब विडंबना है, है न? तुम अपनी शारीरिक संरचना को इसलिए बचा रहे हो ताकि तुम अपनी मानसिक संरचना को और अधिक कुशलता से नष्ट कर सको। यह कुर्सी तुम्हें आराम नहीं देती, यह केवल तुम्हारी पीड़ा को ‘स्थगित’ करती है ताकि तुम कल फिर उसी वक्रता पर दौड़ सको।

वक्रता और पेट की आग

अब जरा ‘इन्फॉर्मेशन ज्योमेट्री’ के नजरिए से देखो। तुम्हारा कार्यक्षेत्र कोई सपाट मैदान नहीं है। यह एक टेढ़ा-मेढ़ा, ऊबड़-खाबड़ ‘मैनिफोल्ड’ है, जिसकी ‘वक्रता’ (curvature) तुम्हारे बॉस की मूर्खता, ऑफिस की गंदी राजनीति और सिस्टम की अक्षमता से बनी है। जब तुम किसी प्रोजेक्ट को ‘ऑप्टिमाइज़’ करने की बात करते हो, तो तुम वास्तव में इस ऊबड़-खाबड़ रास्ते पर सबसे कम प्रतिरोध वाला मार्ग खोज रहे होते हो। यह गणितीय ‘जियोडेसिक’ (geodesic) है, लेकिन इसे तय करने में जो घर्षण पैदा होता है, वह तुम्हारे पेट में एसिडिटी और रातों की नींद हराम करने के रूप में प्रकट होता है।

बकवास है यह सब। मुझे घर जाना चाहिए था।

इस ज्यामितीय नर्क में, हम खुद को मशीन में बदलने की होड़ में लगे हैं। तुम देखते होगे कि कुछ लोग अपने डेस्क पर अजीबोगरीब उपकरणों के साथ बैठे रहते हैं, जैसे कि वे नासा का कोई मिशन कंट्रोल कर रहे हों। वे एक HHKB मैकेनिकल कीबोर्ड पर अपनी उंगलियां ऐसे नचाते हैं जैसे कि तेज टाइपिंग से वे अपनी आत्मा के खालीपन को भर देंगे। यह ‘टैक्टाइल फीडबैक’ और ‘थॉक’ की आवाज वास्तव में क्या है? यह खुद को यह तसल्ली देने का एक तरीका है कि तुम केवल एक मांस का लोथड़ा नहीं हो, बल्कि एक इनपुट-आउटपुट डिवाइस हो। तुम उस कीबोर्ड पर जितना तेज टाइप करते हो, तुम उतने ही प्रभावी ढंग से खुद को एक बाइनरी कोड में बदल रहे होते हो। तुम्हारी इंसानियत, तुम्हारी भावनाएं—यह सब सिस्टम के लिए ‘कम्प्यूटेशनल ड्रैग’ है, जिसे हटाना ही तथाकथित प्रगति है।

शून्य की ओर दौड़

अंततः, यह सारी दौड़ किसलिए है? ‘कुल्बैक-लीब्लर डाइवर्जेंस’ (Kullback-Leibler divergence) को कम करने के लिए? यानी, सिस्टम जो चाहता है और तुम जो हो, उसके बीच के अंतर को मिटाने के लिए? जिस दिन यह अंतर शून्य हो जाएगा, उस दिन तुम ‘परफेक्ट एम्प्लॉई’ बन जाओगे—एक ऐसी इकाई जिसमें न कोई इच्छा है, न कोई विकार, और न ही कोई जीवन। जिसे हम ‘दक्षता’ या ‘एफिशिएंसी’ कहते हैं, वह वास्तव में मृत्यु का ही एक तकनीकी नाम है। हम एक ऐसे सपाट, निर्जीव भविष्य की ओर बढ़ रहे हैं जहाँ हर निर्णय पहले से ही गणितीय रूप से तय है। वहाँ कोई आश्चर्य नहीं है, कोई गलती नहीं है, और इसलिए, वहाँ कोई जीवन भी नहीं है।

यह चाय पूरी तरह ठंडी हो चुकी है। और इसमें चीनी भी कम है। जिन्दगी की तरह—बेस्वाद और ठंडी।

コメント

タイトルとURLをコピーしました