शून्य ज्यामिति

यह जो आप हर सुबह अपनी रीढ़ की हड्डी सीधी करके, लोकल ट्रेन के धक्कों को सहते हुए या ट्रैफिक जाम में अपने जीवन के अमूल्य घंटे जलाते हुए दफ्तर पहुँचते हैं, जिसे आप गर्व से ‘करियर’ या ‘महत्वाकांक्षा’ का नाम देते हैं, वह वास्तव में ब्रह्मांडीय स्तर का एक भद्दा मज़ाक है। हम एक ऐसे समाज में साँस ले रहे हैं जहाँ पसीने की बदबू को ‘सफलता की सुगंध’ और मानसिक तनाव को ‘समर्पण’ समझा जाता है। लेकिन अगर आप मुझसे पूछें, एक ठंडी बियर और प्लेट भर मसालेदार मूंगफली के साथ इस तमाशे को दूर से देखते हुए, तो यह सब केवल एक ‘इन्फोर्मेशन मैनिफोल्ड’ पर बेतरतीब भटकने जैसा है।

लोग सोचते हैं कि वे काम कर रहे हैं। वे फाइलों को एक कोने से दूसरे कोने खिसका रहे हैं, कीबोर्ड पर उंगलियां पटक रहे हैं। नहीं, वे बस अपनी सीमित संज्ञानात्मक ऊर्जा (cognitive energy) को ब्रह्मांड की निर्दयी ऊष्मागतिकी (thermodynamics) के खिलाफ बर्बाद कर रहे हैं। आप कुछ बना नहीं रहे हैं, आप बस धीरे-धीरे अपने ही अस्तित्व को शोर (noise) में बदल रहे हैं।

मजदूरी का कीचड़

काम क्या है? एक सामान्य वेतनभोगी क्लर्क के लिए यह एक ‘टू-डू लिस्ट’ है जिसमें कभी न खत्म होने वाले चेकबॉक्स हैं। लेकिन एक ठंडे दिमाग वाले, सनकी विश्लेषक के लिए, यह ‘फिशर सूचना मैट्रिक्स’ (Fisher Information Matrix) का एक बिंदु मात्र है। यह मैट्रिक्स यह नहीं मापता कि आपने कितना काम किया, बल्कि यह मापता है कि किसी परिणाम को बदलने के लिए आपको अपनी मानसिक शांति की कितनी आहुति देनी पड़ी। जब आप कोई नया, बेमतलब का कॉर्पोरेट सॉफ्टवेयर सीखते हैं या उस उबाऊ स्प्रेडशीट को रंगीन बनाते हैं, तो आप कोई कौशल हासिल नहीं कर रहे होते। आप असल में अपने मस्तिष्क के प्रायिकता वितरण (probability distribution) को एक ऐसे सांचे में ढाल रहे होते हैं जो अंततः आपको एक बदलने योग्य, निर्जीव पुर्जा बना देगा।

दिक्कत यह है कि हमारी सामाजिक सोच उस पुराने ज़माने के राशन कार्ड की लाइन की तरह है—लंबी, उबाऊ, पसीने से तरबतर और अंत में खाली हाथ लौटाने वाली। हम ‘लीनियर’ (linear) प्रगति में विश्वास करते हैं—कि आठ घंटे काम मतलब आठ इकाई परिणाम। क्या बकवास है। यह तो वैसा ही है जैसे आप पुरानी दिल्ली की संकरी गलियों में, एक मशहूर जलेबी की दुकान के बाहर लगे उस अनियंत्रित हुजूम को एक व्यवस्थित कतार समझ लें, जहाँ हर कोई एक-दूसरे की कोहनी मार रहा है और मक्खियाँ भिनभिना रही हैं। असल में, आपके काम की संरचना एक जटिल ‘कर्वेचर’ (curvature) पर टिकी है। यदि आपका मानसिक मानचित्र टेढ़ा-मेढ़ा है, तो आप कितनी भी मेहनत कर लें, आप उसी मानसिक कब्ज और हताशा के बिंदु पर वापस आ जाएंगे जहाँ से आपने सुबह शुरुआत की थी। जिसे आप ‘बर्नआउट’ कहते हैं, वह असल में आपके दिमाग का वह जमा हुआ कचरा है जिसे साफ करने की फुर्सत आपको अपने ‘करियर’ के लालच में कभी नहीं मिली।

सूचना का विषैला भूगोल

इस स्वचालित निर्णयों के युग में, जिसे कुछ मूर्ख ‘क्रांति’ कहते हैं, व्यक्तिगत कार्यक्षमता का अर्थ पूरी तरह बदल गया है। अब सवाल यह नहीं है कि आप कितना जानते हैं या आप कितने बुद्धिमान हैं। सवाल यह है कि सूचना के इस गंदे नाले में, जिसे हम इंटरनेट कहते हैं, आप कितनी कुशलता से अपनी नाव खेते हैं। इसे ‘फिशर इंफॉर्मेशन मैनिफोल्ड’ के रूप में सोचें—एक उबड़-खाबड़ ज्यामितीय सतह जहाँ हर कदम पर फिसलने का डर है। एक कुशल व्यक्ति वह नहीं है जो सबसे ज्यादा हाथ-पैर मारता है, बल्कि वह है जो इस सतह पर उस सबसे छोटे और निर्दयी रास्ते को पहचानता है जिसे गणित की भाषा में ‘जियोडेसिक’ (geodesic) कहते हैं।

बाकी लोग? वे तो बस ‘ब्राउनियन मोशन’ (Brownian motion) की तरह इधर-उधर टकरा रहे हैं। वे उस मच्छर की तरह हैं जो एक बंद कमरे में रोशनी की तलाश में बार-बार दीवार से सिर टकरा रहा है, तब तक जब तक कि वह बेहोश न हो जाए। वे ईमेल का जवाब देते हैं, ज़ूम कॉल्स पर अपना थका हुआ चेहरा दिखाते हैं, और रात को इस भ्रम में सोते हैं कि वे दुनिया बदल रहे हैं। लेकिन न्यूरोसाइंस के नग्न सत्य को देखें, तो वे केवल अपने न्यूरॉन्स की कीमती बैटरी को एक ऐसे ऐप की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं जो बैकग्राउंड में चल रहा है और जिसका कोई अंत नहीं है। यह वैसा ही है जैसे महीने के आखिरी हफ्ते में आपके बैंक अकाउंट का बैलेंस—दिखने में तो कुछ अंक होते हैं, लेकिन उनसे आप अपनी भूख नहीं मिटा सकते, केवल अपनी गरीबी को घूर सकते हैं।

आजकल के ये नए ‘टेक-ब्रो’ और कॉर्पोरेट रईस लोग, जिनका दिमाग शोर से भर चुका है, खुद को शांत रखने के लिए महंगा सन्नाटा कानों पर चढ़ाकर घूमते हैं। जैसे कि चालीस हज़ार रुपये का प्लास्टिक का टुकड़ा उनके जीवन की रिक्तता को भर देगा। यह निवेश नहीं, बल्कि एक हताश आत्मसमर्पण है। क्या सच में आपको लगता है कि बाहरी शोर को एक बटन दबाकर मिटा देने से आपके अंदर चल रहा वह शोर शांत हो जाएगा जो आपसे हर पल चीख-चीख कर कहता है कि आप एक असफल प्रयोग हैं? यह केवल एक भ्रम है, ठीक वैसे ही जैसे एयर फ्रेशनर छिड़कने से कमरे की गंदगी साफ नहीं होती।

एंट्रॉपी की सड़न

असली मुद्दा, जिसे कोई छूना नहीं चाहता, वह ‘संज्ञानात्मक एंट्रॉपी’ (Cognitive Entropy) का है। भौतिकी का नियम है: सूचना जितनी अधिक होगी, अव्यवस्था (disorder) उतनी ही बढ़ेगी। ये मशीनें और एल्गोरिदम हमें और अधिक डेटा दे रहे हैं, जिसका सीधा अर्थ है कि आपके दिमाग की व्यवस्था धीरे-धीरे उस कबाड़खाने में बदल रही है जहाँ पुरानी साइकिलों, जंग लगी टीन की चादरों और टूटे हुए शीशों के बीच आप अपना वजूद ढूंढ रहे हैं। हम एक ऐसे बिंदु पर पहुँच रहे हैं जहाँ निर्णय लेना एक शारीरिक पीड़ा बन जाता है। दोपहर के खाने में क्या मंगाना है, यह तय करना भी माउंट एवरेस्ट चढ़ने जैसा लगता है क्योंकि हर विकल्प समान रूप से ‘संभावित’ और समान रूप से कचरा दिखता है।

जब आप अपने ब्राउज़र में एक साथ बीस टैब खोलते हैं, तो आप अपने मस्तिष्क को ‘थर्मल डेथ’ (thermal death) की ओर ले जा रहे होते हैं। जिसे आप शान से ‘मल्टीटास्किंग’ कहते हैं, वह वास्तव में सूचना के फिशर मैट्रिक्स को इतना पतला और कमजोर कर देना है कि उसका कोई अर्थ ही न रहे। यह सड़क किनारे मिलने वाली उस सस्ती, मिलावटी चाय जैसा है जिसमें पानी इतना ज्यादा है और दूध इतना कम कि आप यह भूल जाते हैं कि आप चाय पी रहे हैं या अपनी ही मजबूरी का घूंट भर रहे हैं। स्वाद मर चुका है, केवल तापमान बचा है।

लोग मुझसे अक्सर पूछते हैं, “तो फिर हम क्या करें?” वे उम्मीद करते हैं कि मैं कोई जादुई मंत्र या कोई नया ‘प्रोडक्टिविटी हैक’ बताऊंगा।

समाधान? समाधान यह स्वीकार करना है कि आप एक ऐसे बाइनरी सिस्टम के गुलाम हैं जो धीरे-धीरे अपनी प्रोसेसिंग पावर खो रहा है। हम सभी इस विशाल, ब्रह्मांडीय डेटा सेंटर के वे छोटे-छोटे, जलते हुए ट्रांजिस्टर हैं, जिनका काम केवल तब तक गर्मी पैदा करना है जब तक कि हम पूरी तरह से राख न हो जाएं। घर जाकर सो जाना ही शायद एकमात्र तर्कसंगत निर्णय बचा है, लेकिन आपके ज्यामितीय समीकरणों में उसकी अनुमति नहीं है। हम एक ऐसे वक्र (curve) पर दौड़ रहे हैं जो खुद को ही काटता है, और आप इसमें फंसे एक बिंदु मात्र हैं।

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