पिछली बार हम ‘दक्षता’ के उस खोखलेपन पर चर्चा कर रहे थे, जहाँ इंसान खुद को एक मशीन समझने की भूल कर बैठता है। लेकिन आज, चलिए उस ‘सार्वजनिक सेवा’ या ‘संगठन’ के पाखंड को उधेड़ते हैं जिसे हम बड़ी श्रद्धा से ‘संस्था’ कहते हैं। दरअसल, किसी भी दफ्तर की फाइलों में दबी हुई वह सदियों पुरानी धूल और कैंटीन में मिलने वाला वह चिपचिपा, ठंडा समोसा—जिसकी पपड़ी अब किसी रबर की तरह खिंचती है और जिसके अंदर का आलू किसी पुरानी बीमारी की तरह बदबू देता है—ऊष्मागतिकी (Thermodynamics) के दूसरे नियम का सबसे जीवंत और घिनौना उदाहरण है। लोग कहते हैं कि संगठन समाज की सेवा के लिए बनते हैं। क्या बकवास है। यह सब केवल ऊर्जा के क्षय को छिपाने के लिए बुना गया एक नैतिक पर्दा है।
जड़ता और शारीरिक कष्ट
सार्वजनिक उपक्रमों या बड़े कॉरपोरेट घरानों को देखिए। ये कोई जीवित इकाइयाँ नहीं हैं, बल्कि ये ‘एन्ट्रॉपी’ (entropy) को रोकने के लिए बनाए गए कृत्रिम और बेहद महंगे बांध हैं। एक सरकारी कर्मचारी का सुबह 10 बजे अपनी मेज पर बैठना, उसकी सस्ती प्लाईवुड की मेज के नीचे से आती हुई मरे हुए चूहे की हल्की गंध, और शाम 5 बजे तक बिना किसी प्रभावी आउटपुट के फाइलों को एक कोने से दूसरे कोने तक खिसकाना, दरअसल भौतिकी के नजरिए से ऊर्जा का एक विशाल ‘सिंक’ (sink) है। हम इसे ‘रोजगार’ या ‘कैरियर’ कहते हैं, जबकि ब्रह्मांड इसे ‘शुद्ध ऊष्मीय बर्बादी’ कहता है। जब आप उस दफ्तर की लाइन में खड़े होते हैं, और आपके सामने वाला बाबू अपनी ठंडी चाय के कप में सस्ता बिस्किट डुबोता है और उसे गिरते हुए देखता है, तो वह केवल समय नहीं मार रहा होता; वह शाब्दिक रूप से आपके जीवन की संचित ऊर्जा को सोख रहा होता है।
यह जड़ता केवल मानसिक नहीं है, यह क्रूरता की हद तक शारीरिक है। वह लकड़ी की सख्त और टेढ़ी कुर्सी जिस पर बैठकर आप अपने टैक्स की गणना करते हैं, वह न केवल आपकी पीठ तोड़ रही है, बल्कि वह आपके रीढ़ की हड्डी के ए़न्ट्रॉपी को भी बढ़ा रही है। लोग ‘टीम वर्क’, ‘सिनर्जी’ और ‘संस्कृति’ की बात करते हैं, लेकिन असल में वे केवल अपने न्यूरोट्रांसमीटर को यह विश्वास दिलाने की कोशिश कर रहे होते हैं कि उनकी इस बदबूदार, उमस भरी और निरर्थक उपस्थिति का कोई ब्रह्मांडीय अर्थ है। यह महज़ एक जैविक बग है। हमारे मस्तिष्क को ‘अर्थ’ खोजने की लत है, भले ही हम केवल एक मरते हुए सितारे की ठंडी होती राख पर नाच रहे हों और हमारा पसीना उस राख को कीचड़ में बदल रहा हो। कितना घिनौना और थकाऊ है यह सब।
ऊष्मागतिकी का नरक
इल्या प्रिगोजिन ने ‘डिसिपेटिव स्ट्रक्चर्स’ (Dissipative Structures) की बात की थी—ऐसी प्रणालियाँ जो संतुलन से बहुत दूर होती हैं और खुद को बनाए रखने के लिए बाहर से लगातार ऊर्जा चूसती रहती हैं। एक सार्वजनिक विभाग बिल्कुल वैसा ही है। उसे टैक्स के रूप में आपके खून और पसीने की ऊर्जा चाहिए ताकि वह अपनी अंदरूनी अव्यवस्था को ‘प्रशासन’ और ‘नियम’ के नाम पर बाहर फेंक सके। लेकिन यहाँ एक समस्या है। जैसे-जैसे यह सिस्टम जटिल होता है, इसे अपनी सड़ी हुई संरचना को बनाए रखने के लिए और भी अधिक ऊर्जा की आवश्यकता होती है। यह एक ऐसा भूखा राक्षस है जो जितना खाता है, उतना ही कमजोर और भारी होता जाता है।
यही कारण है कि एक मामूली सी बैठक के मिनट्स लिखने के लिए, जहाँ कोई निर्णय नहीं लिया जाना है और केवल एक-दूसरे की शक्लें देखी जानी हैं, ये अधिकारी और तथाकथित विशेषज्ञ इतनी बेतुकी और महंगी चमड़े की डायरी का उपयोग करते हैं, जिसकी कीमत किसी मजदूर के तीन महीने के राशन के बराबर है। क्या उस इतालवी जिल्द, उस मखमली टेक्सचर और उस प्रीमियम कागज पर लिखे गए आपके मूर्खतापूर्ण विचार कम खोखले हो जाएंगे? बिल्कुल नहीं। यह केवल आपके व्यक्तिगत पतन और बौद्धिक दिवालियेपन को एक महंगे खोल में छिपाने का प्रयास है। यह देखना वाकई वितृष्णा पैदा करता है कि कैसे ‘विरासत’ और ‘प्रोटोकॉल’ के नाम पर हम कचरे को मखमल में लपेटकर सहेजने के शौकीन हो गए हैं। पैसा केवल ऊर्जा का एक रूप है, और जब वह ऐसे व्यर्थ के विलासिता के सामानों में बदलता है, तो वह ब्रह्मांड की कुल अव्यवस्था में अपना योगदान दे रहा होता है। यह सिर्फ एक डायरी नहीं है, यह एक समाधि का पत्थर है जिसे आप अपनी जेब में लेकर घूमते हैं।
गणना की हुई शून्यता
अब हम उन एल्गोरिदम के युग में हैं जिन्हें गलती से ‘बुद्धिमान’ कहा जाता है। दावा यह है कि गणितीय गणनाएँ इस अव्यवस्था को व्यवस्थित कर देंगी। ‘गैर-संतुलन सत्तामीमांसा’ (Non-equilibrium ontology) के इस दौर में, इन मशीनी गणनाओं को एक ऐसे ‘मैक्सवेल के दानव’ (Maxwell’s Demon) के रूप में पेश किया जा रहा है जो ठंडे और गर्म अणुओं को अलग कर देगा, यानी कार्यकुशलता और आलस्य को छाँट देगा। लेकिन यह एक सफेद झूठ है। यह स्वचालित नरक खुद एक भारी ऊर्जा उपभोक्ता है। यह केवल सूचना की धूल को एक कोने से उठाकर दूसरे कोने में जमा कर देता है, और इस प्रक्रिया में सर्वर फार्मों में इतनी गर्मी पैदा करता है कि ग्लेशियर पिघल जाएं।
जिसे हम ‘कुशल शासन’ या ‘स्मार्ट गवर्नेंस’ कहते हैं, वह वास्तव में थर्मोडायनामिक्स के ऋण को भविष्य पर टालने का एक डिजिटल तरीका है। मानवीय भावनाएं, वफादारी, ‘देशभक्ति’ और ‘लोकहित’ के दावे दरअसल उस घर्षण और गर्मी (heat loss) को छिपाने के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले घटिया इंसुलेटर हैं, जो सिस्टम की रगड़ से पैदा होते हैं। जब आप अगली बार किसी सरकारी खिड़की पर या किसी बैंक की कतार में खड़े हों और आपको पसीना आ रहा हो, तो याद रखिएगा—वह पसीना ही उस संगठन की एकमात्र असली ‘आउटपुट’ है। बाकी सब माया है।
सिर दर्द कर रहा है मेरा। इंसान की पूरी सभ्यता बस इसी हार की कहानी है: हम रेत का महल बनाते हैं, और भौतिकी की हवा उसे उड़ा ले जाती है। संगठन अंततः ढहेंगे ही, चाहे आप उनमें कितनी भी गणना की हुई कृत्रिमता भर दें। वह ठंडा समोसा अंततः फफूंद में बदल ही जाएगा, चाहे आप उसे माइक्रोवेव में कितनी भी बार गर्म क्यों न करें। हम बस उस सड़न को थोड़ा और ‘ब्रांडेड’, ‘डिजिटल’ और ‘महंगा’ बना रहे हैं। बात खत्म। घर जाने दो मुझे, मुझे अब और नहीं सोचना।

コメント