किसी सरकारी दफ्तर में, जहाँ पंखा भी ‘जुगाड़’ से चल रहा हो, पसीने से लथपथ कतार में खड़े होकर कभी सोचा है कि यह सब इतना… ‘बकवास’ क्यों है? यह अव्यवस्था, यह धक्का-मुक्की, यह शोर—यह सिर्फ प्रशासनिक विफलता नहीं है। यह एक ज्यामितीय नियति है। हम जिसे ‘समाज’ कहते हैं, वह दरअसल शोर कम करने वाले महंगे हेडफोन लगाकर हकीकत से मुंह चुराने की एक सामूहिक कवायद है, लेकिन अफ़सोस, गणित के नियमों को म्यूट नहीं किया जा सकता।
मूर्खता का मैनिफोल्ड
जब आप किसी कॉन्फ्रेंस रूम में, अपनी उस चमड़े की जिल्द वाली नोटबुक को खोलकर बैठते हैं—जिसकी कीमत शायद उस कमरे में मौजूद कुल बुद्धि से भी अधिक हो—तो आपको लगता है कि वहां ‘विचारों का आदान-प्रदान’ हो रहा है। गलत। सूचना ज्यामिति (Information Geometry) की क्रूर निगाह से देखें, तो वह कमरा ‘सांख्यिकीय मैनिफोल्ड’ (Statistical Manifold) का एक छोटा सा हिस्सा है। वहां बैठा हर व्यक्ति एक जीवित, सांस लेता हुआ ‘संभाव्यता वितरण’ (Probability Distribution) है।
जिसे आप ‘सहमति’ या ‘Consensus’ कहते हैं, वह और कुछ नहीं बल्कि ‘फिशर इनफॉर्मेशन मीट्रिक’ (Fisher Information Metric) का उपयोग करके न्यूनतम दूरी खोजने की एक थकाऊ प्रक्रिया है। हम सब अपने-अपने पूर्वाग्रहों के निर्देशांक (Coordinates) लेकर बैठे हैं, और एक ऐसे औसत बिंदु की तलाश कर रहे हैं जो किसी को भी नाराज न करे। नतीजा? एक ऐसा फैसला जो न तो तीखा है न मीठा, बस उस बासी समोसे जैसा है जिसे आप भूख से मरते वक्त मजबूरी में खाते हैं।
नफरत की ज्यामिति
असली मजा—या कह लीजिए असली त्रासदी—तब शुरू होती है जब हम ‘ध्रुवीकरण’ की बात करते हैं। लोग सोचते हैं कि समाज इसलिए बंटा हुआ है क्योंकि हम एक-दूसरे की बात नहीं सुनते। अरे भाई, समस्या सुनना या न सुनना नहीं है। समस्या है ‘स्पेस’ की बनावट। कल्पना कीजिए कि आप मुंबई की लोकल ट्रेन या दिल्ली के मेट्रो में पीक आवर के दौरान सफर कर रहे हैं। आपके बगल वाले यात्री की कोहनी आपकी पसलियों में धंसी है, उसका पसीना आपकी शर्ट पर लग रहा है। भौतिक रूप से, आप दोनों के बीच की दूरी शून्य है। लेकिन मानसिक रूप से? वैचारिक रूप से? वह दूरी अनंत हो सकती है।
यही है सामाजिक स्पेस की ‘रीमानियन वक्रता’ (Riemannian Curvature)। जब समाज में कट्टरता बढ़ती है, तो यह वक्रता इतनी तीव्र हो जाती है कि दो बिंदुओं (रायों) के बीच की सबसे छोटी दूरी—जिसे हम ‘जियोडेसिक’ (Geodesic) कहते हैं—सीधी रेखा नहीं रह जाती। वह टेढ़ी हो जाती है, टूट जाती है। आप चाहे कितना भी तर्क कर लें, चाहे कितना भी ‘तार्किक’ होने का ढोंग कर लें, यदि स्पेस ही मुड़ा हुआ है, तो आपका संदेश सामने वाले तक पहुँचते-पहुँचते विकृत हो जाएगा। यह वैसा ही है जैसे आप किसी को रास्ता पूछें और वह आपको गलत दिशा बता दे, सिर्फ इसलिए नहीं कि वह झूठ बोल रहा है, बल्कि इसलिए क्योंकि उसकी दुनिया का नक्शा ही आपकी दुनिया के नक्शे से अलग है। इस वक्रता में फंसा हुआ इंसान उस चूहे जैसा है जो भूलभुलैया में दौड़ रहा है, यह सोचकर कि निकास द्वार करीब है, जबकि दीवारें हर पल जगह बदल रही हैं।
एन्ट्रॉपी और कुर्सियाँ
और इस अराजकता के बीच, आपकी प्राथमिकताएं देखिए। आप अपनी रीढ़ की हड्डी को बचाने के लिए लाखों रुपए की एर्गोनोमिक कुर्सी खरीदते हैं। वाह! रीढ़ सीधी रहेगी, भले ही दिमाग का ‘एन्ट्रॉपी’ (Entropy) रॉकेट की तरह ऊपर जा रहा हो। थर्मोडायनामिक्स का दूसरा नियम निष्ठुर है। सूचना, जैसे ही प्रोसेस होती है, शोर पैदा करती है। हम जितना अधिक ‘संवाद’ करते हैं, हम उतनी ही अधिक गर्मी और शोर पैदा करते हैं। सोशल मीडिया पर होने वाली हर बहस, हर ट्वीट, हर ‘वायरल’ वीडियो—यह सब ब्रह्मांड की ‘हीट डेथ’ (Heat Death) की ओर बढ़ाया गया एक और कदम है। हम ज्ञान का निर्माण नहीं कर रहे; हम बस चुप्पी को महंगा बेच रहे हैं।
यह सब एक बड़ा ‘बग’ है जिसे हमने ‘फीचर’ मान लिया है। जैसे फोन की बैटरी 1% पर लटकी हो और हम स्क्रीन की ब्राइटनेस कम करके सोच रहे हों कि दिन निकल जाएगा। यह दिन नहीं निकलेगा। अंधेरा होगा। और उस अंधेरे में, आपकी महंगी नोटबुक और एर्गोनोमिक कुर्सियाँ कबाड़ के भाव भी नहीं बिकेंगी। बस, बहुत हो गया आज का ज्ञान। मुझे घर जाना है, जहाँ कम से कम सन्नाटा तो असली है।

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