यह जो आप लोग सुबह-सुबह लोकल ट्रेनों और मेट्रो के डिब्बों में भेड़-बकरियों की तरह ठुंसे हुए, पसीने और सस्ते डियोड्रेंट की मिली-जुली गंध के बीच अपनी ‘किस्मत’ बनाने जा रहे हैं, इसे आप ‘करियर’ कहते हैं? हास्यास्पद है। अगर मैं अपनी मेज पर रखे इस ठंडे समोसे से नज़र हटाकर, एक ‘विशिष्ट वास्तुकार’ (Extreme Architect) की हैसियत से आपके अस्तित्व का आकलन करूं, तो यह जीवन नहीं है। यह ‘सूचना ज्यामिति’ (Information Geometry) के एक वक्र धरातल पर आपकी निरर्थक छटपटाहट मात्र है।
आप जिसे ‘कड़ी मेहनत’ का नाम देते हैं, वह वास्तव में एक ‘सांख्यिकीय बहुविधि’ (Statistical Manifold) पर एक बिंदु से दूसरे बिंदु तक घिसटने की प्रक्रिया है। समाज ने आपको यह भ्रम बेच दिया है कि पसीने की बूंदों का बाज़ार मूल्य होता है, जबकि वास्तविकता यह है कि आप केवल ब्रह्मांडीय एन्ट्रापी (Entropy) के महासागर में एक नगण्य लहर पैदा कर रहे हैं।
उफ्फ, कितनी बकवास है यह सब।
माया का गणित
श्रम यानी लेबर का जो पूरा ढांचा खड़ा किया गया है, वह ‘फिशर सूचना मैट्रिक्स’ (Fisher Information Matrix) की एक क्रूर पहेली है। जब आप ऑफिस में बैठकर एक्सेल शीट भरते हैं या कोडिंग करते हैं, तो आपको लगता है कि आप ‘सीख’ रहे हैं। गलत। आप केवल संभावनाओं के वितरण (Probability Distribution) में अपनी अनिश्चितता को कम करने का एक दयनीय प्रयास कर रहे हैं। जिसे आप ‘प्रोफेशनल ग्रोथ’ कहते हैं, वह इस ज्यामितीय धरातल पर एक ‘जियोडेसिक’ (Geodesic) यानी सबसे छोटा रास्ता है—पर सवाल यह है कि यह रास्ता जा कहाँ रहा है?
यह रास्ता सीधा उस शून्यता की ओर जाता है जहाँ आपके सपनों की हत्या हो चुकी है। इंसानी जज्बात? वह तो बस न्यूरल नेटवर्क में आया एक ‘बग’ (Bug) है। लोग कहते हैं, ‘मुझे अपने काम से प्यार है।’ झूठ। सफेद झूठ। आपका दिमाग बस उस डोपामाइन की भीख मांग रहा है जो अनिश्चितता कम होने पर टपकता है। जैसे सड़क किनारे बिकने वाले उस समोसे में आलू कम और मिर्च ज्यादा होती है ताकि आपको बासीपन का पता न चले, वैसे ही कॉरपोरेट जगत आपको ‘पदोन्नति’ की मिर्च खिलाकर आपकी आत्मा के बासीपन को छिपाता है।
सच में, मन करता है कि इस पूरी व्यवस्था पर थूक दूं।
ज्यामिति और चमड़े का ढोंग
अब जरा ‘रीमानियन ज्यामिति’ (Riemannian Geometry) के चश्मे से अपने ‘प्रोफेशनल स्व’ (Professional Self) को देखिए। आप कोई व्यक्ति नहीं हैं; आप एक मैनिफोल्ड पर रेंगता हुआ एक निर्देशांक (Coordinate) हैं। एक ‘इंटर्न’ और ‘सीईओ’ के बीच की दूरी किलोमीटर या अनुभव के वर्षों में नहीं, बल्कि ‘कुल्बैक-लीब्लर डाइवर्जेंस’ (Kullback-Leibler Divergence) में मापी जाती है। यह वक्रता (Curvature) इतनी तीव्र है कि इसमें आपकी रीढ़ की हड्डी और नैतिकता दोनों टूट जाती हैं।
और इस टूटन को छिपाने के लिए आप क्या करते हैं? आप उपभोगवाद की शरण में जाते हैं। आप बाज़ार से एक महंगी असली चमड़े की डायरी खरीद लाते हैं। आपको लगता है कि मृत जानवर की खाल में लिपटे इन कोरे पन्नों पर अपनी घसीट लिखने से आपके विचारों में वजन आ जाएगा? यह डायरी, जिसकी कीमत किसी मजदूर के महीने भर के राशन के बराबर है, आपकी बौद्धिक शून्यता को नहीं भर सकती। यह वैसा ही है जैसे किसी डूबते हुए जहाज पर नया पेंट करना। आप सोचते हैं कि यह ‘प्रीमियम स्टेशनरी’ आपको एक विचारक बना देगी, लेकिन असल में यह केवल यह साबित करती है कि आप एक अच्छे उपभोक्ता हैं जो अपनी निराशा को वस्तुओं से ढंकना जानता है।
क्या तमाशा है। घर जाना है मुझे।
विसंगति और जुगाड़
भारतीय संदर्भ में, हम जिसे ‘जुगाड़’ कहते हैं, वह वैज्ञानिक भाषा में ‘स्थानीय एन्ट्रापी कटौती’ (Local Entropy Reduction) है। जब सिस्टम की ज्यामिति आपके खिलाफ हो, तो आप नियमों को मरोड़ते हैं। लेकिन याद रखें, ऊष्मागतिकी (Thermodynamics) के नियम निर्दयी होते हैं। आप जितनी ऊर्जा ‘शॉर्टकट’ खोजने में लगाते हैं, उतनी ही अराजकता (Chaos) आपके मानसिक स्वास्थ्य में फैलती जाती है।
आपकी कार्यक्षमता और आपकी मानसिक शांति के बीच का संबंध वैसा ही है जैसा ‘नुक्कड़ की चाय और भयानक एसिडिटी’ का होता है। शुरुआत में अच्छा लगता है, लेकिन बाद में अंदर सब कुछ जलने लगता है। जितना ज्यादा आप खुद को इस ‘प्रोफेशनल मैनिफोल्ड’ पर घिसेंगे, उतनी ही आपकी मौलिकता की बैटरी ड्रेन होगी। अंत में, हम सब बस एक सांख्यिकीय डेटा पॉइंट बनकर रह जाते हैं—एक ऐसा आंकड़ा जिसे भविष्य का कोई एल्गोरिथम ‘आउटलायर’ मानकर कचरे के डिब्बे में डाल देगा।
थक गया हूं मैं इस प्रवचन से। सफलता वक्रता का भ्रम है और आप उस वक्र पर दौड़ने वाले चूहे। दौड़ते रहिए, शायद किसी दिन आपको पता चले कि पिंजरा गोल है और निकास द्वार का अस्तित्व ही नहीं है।

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