ऊष्मागतिकीय सड़ांध

भ्रम का गुब्बारा

सुनो, यह जो तुम ‘कॉर्पोरेट कल्चर’ और ‘टीम सिनर्जी’ का ढोल पीटते हो न, यह सब बकवास है। असलियत में, यह एक बहुत बड़ा और महंगा झूठ है जिसे तुम अपनी आत्मा को बेचने के बाद खुद को तसल्ली देने के लिए बोलते हो। किसी भी आलीशान ऑफिस में घुसते ही जो वो ताजी कॉफी और लेवेंडर रूम फ्रेशनर की खुशबू आती है, वो दरअसल मरते हुए सेलुलर स्ट्रक्चर की गंध को छुपाने का प्रयास है। हम सब बस एक ऐसे तंत्र का हिस्सा हैं जो ब्रह्मांड की सबसे क्रूर और अटल सच्चाई से लड़ने का नाटक कर रहा है: ऊष्मागतिकी का दूसरा नियम (Second Law of Thermodynamics)

सरल, देहाती भाषा में कहूं, तो तुम्हारा संगठन उस सड़क किनारे की कचौड़ी की दुकान जैसा है, जहाँ हलवाई उसी जले हुए, काले तेल में बार-बार समोसे तल रहा है। विज्ञान की भाषा में इसे ‘एन्ट्रॉपी’ (Entropy) कहते हैं। और यह एन्ट्रॉपी कोई हवा-हवाई बात नहीं है, यह तुम्हारे सिर के उस दर्द की तरह भौतिक है जो मीटिंग रूम से बाहर निकलने पर होता है। हर वो ज़ूम कॉल जिसका कोई नतीजा नहीं निकलता, हर वो ईमेल जो ‘CC’ के बोझ से दबा होता है, और हर वो ‘क्विक सिंक-अप’ जो असल काम को रोकता है—ये सब सिस्टम में बढ़ती हुई अव्यवस्था और घर्षण हैं। तुम जिसे ‘प्रोसेस’ कहते हो, भौतिकी उसे ऊर्जा का बेशर्म क्षय कहती है।

सड़ता हुआ ढांचा

जब कोई कंपनी नई होती है, तो वो एक ‘लो-एन्ट्रॉपी’ स्टेट में होती है। सब कुछ साफ, सब कुछ तेज। फिर आते हैं ‘मैनेजर्स’ और ‘कंसल्टेंट्स’। इनका काम कथित तौर पर व्यवस्था बनाना है, लेकिन विडंबना देखो—व्यवस्था बनाने की हर कोशिश और अधिक अव्यवस्था पैदा करती है। यह वैसा ही है जैसे तुम अपनी पुरानी, खटारा मारुति 800 की माइलेज बढ़ाने के लिए उसकी डिक्की में चार भारी ट्रक की बैटरियां रख दो। भार बढ़ेगा, इंजन पर दबाव बढ़ेगा, घर्षण बढ़ेगा, और अंततः वो गाड़ी बीच रास्ते में धुआं फेंक देगी। हम जिसे ‘ग्रोथ’ या विकास कहते हैं, वो अक्सर सिर्फ ‘सूजन’ होती है।

भीड़ बढ़ाने से काम नहीं होता। दस लोग मिलकर जिस काम को एक घंटे में करते थे, तीस लोग मिलकर उसी काम को चार घंटे और तीन मीटिंग्स में करते हैं। क्यों? क्योंकि मनुष्यों के बीच का ‘कम्युनिकेशन ओवरहेड’ एक ज्यामितीय दर से बढ़ता है। तुम काम नहीं कर रहे हो, तुम बस एक-दूसरे से टकरा रहे हो और गर्मी पैदा कर रहे हो। यह एक ‘डिसिपेटिव स्ट्रक्चर’ है जो तब तक चमकता है जब तक इसे निवेशकों के पैसे की भट्टी में झोंका जा रहा है। जिस दिन ईंधन खत्म, उस दिन यह पूरा ढांचा ताश के पत्तों की तरह नहीं, बल्कि गीले कचरे के ढेर की तरह बिखर जाएगा।

जहरीली बाह्यताएँ (Externalities)

इस पूरे तमशे में सबसे घिनौनी चीज है ‘सार्वजनिक बाह्यता’। फैक्ट्रियां अपना धुआं हवा में छोड़ती हैं, और कॉर्पोरेट्स अपना मानसिक कचरा समाज में छोड़ते हैं। जब तुम ऑफिस में बॉस की डांट खाकर, बिना मतलब की एक्सेल शीट भरते-भरते अपना दिमाग खराब करते हो, तो वो तनाव ऑफिस में नहीं रहता। तुम उसे घर ले जाते हो। तुम अपनी पत्नी पर चिल्लाते हो, बच्चों को डांटते हो, या सड़क पर किसी रिक्शे वाले से झगड़ते हो। यह तुम्हारी कंपनी की ‘इंटरनल एन्ट्रॉपी’ है जिसे उसने चालाकी से ‘पब्लिक डोमेन’ में एक्सपोर्ट कर दिया है।

और इस खालीपन को भरने के लिए तुम क्या करते हो? तुम उपभोग करते हो। तुम उन चीजों को खरीदते हो जिनकी तुम्हें रत्ती भर भी जरूरत नहीं है, सिर्फ यह साबित करने के लिए कि तुम्हारा अस्तित्व मायने रखता है।

जैसे कि वो अति-महंगी एर्गोनोमिक कुर्सी, जिसकी कीमत में एक छोटे से गाँव का राशन आ जाए। तुम इसे अपनी रीढ़ की हड्डी बचाने के लिए नहीं खरीदते, बल्कि उस अपराधबोध को कम करने के लिए खरीदते हो जो तुम्हें दिन भर एक पिंजरे में बैठकर महसूस होता है। तुम्हें लगता है कि अगर कुर्सी महंगी है, तो तुम्हारा गुलाम होना भी ‘प्रीमियम’ है। या फिर वो हस्तनिर्मित फाउंटेन पेन जिसे तुम अपनी जेब में सजाकर रखते हो। तुम उससे कोई क्रांतिकारी विचार नहीं लिखने वाले, तुम उससे सिर्फ अपनी ईएमआई का हिसाब और वो इस्तीफ़ा लिखोगे जिसे सबमिट करने की हिम्मत तुममें कभी नहीं आएगी। यह सब मोह-माया है, एक गहरे काले शून्य को भरने की नाकाम कोशिश।

अंतिम पतन

असल में, ‘सस्टेनेबिलिटी’ या स्थिरता शब्द का इस्तेमाल वो लोग करते हैं जिन्हें फिजिक्स की ABCD भी नहीं आती। कोई भी ‘ओपन सिस्टम’ जो संतुलन से बाहर (Non-equilibrium) है, उसे जीवित रहने के लिए लगातार बाहर से ऊर्जा चूसनी पड़ती है और बदले में गंदगी बाहर फेंकनी पड़ती है। तुम्हारा संगठन एक परजीवी है। यह समाज की जवानी, समय और रचनात्मकता को खाता है और बदले में पावरपॉइंट प्रेजेंटेशन और डिप्रेशन उगलता है।

जैसे-जैसे समय बीतेगा, यह मशीन और भारी होती जाएगी। नौकरशाही की परतें उस ‘नॉइज़’ (Noise) की तरह हैं जो सिग्नल को खत्म कर देती हैं। अंत में, काम पूरी तरह बंद हो जाएगा, सिर्फ ‘काम करने का अभिनय’ बचेगा।

तुम पूछ रहे हो कि इसका समाधान क्या है? कोई समाधान नहीं है। तुम एक बड़े थर्मोडायनामिक इंजन के छोटे से पुर्जे हो जो घिस रहा है। और यह घर्षण ही तुम्हारी नियति है। यह दुनिया वैसे भी एक ‘हीट डेथ’ (Heat Death) की तरफ बढ़ रही है, तो ज्यादा लोड मत लो।

ओए छोटू! एक और व्हिस्की ला। बिना पानी के। कम से कम शराब तो असली है, तुम्हारी इस कॉर्पोरेट दुनिया की तरह मिलावटी नहीं। मेरा सिर फट रहा है।

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