नमस्ते। बैठिए और जरा अपनी औकात देखिए। इस सड़े हुए समोसे और पानी जैसी चाय के बीच, तुम जिस ‘कॉर्पोरेट करियर’ का सपना अपनी आंखों में सजाए बैठे हो, वह किसी महान विज्ञान का हिस्सा नहीं है। वह बस धीरे-धीरे सुलगती हुई कचरे की एक ढेरी है। तुम इसे ‘संगठन’ या ‘संस्था’ कहते हो, मैं इसे एक ऐसी बंद नाली कहता हूँ जिसे साफ रखने की नाकाम कोशिश में तुम अपनी पूरी जिंदगी का खून और पसीना बहा देते हो।
सड़न
ब्रह्मांड का एक ही निष्ठुर कानून है: सब कुछ सड़ रहा है। एन्ट्रॉपी (Entropy) परम सत्य है। तुम्हारी कंपनी कोई ‘विरासत’ नहीं बना रही, वह बस तुम्हारी जवानी और तुम्हारी रातों की नींद को निगलकर एक ऐसी गर्मी पैदा कर रही है जो अंततः तुम्हें ही भस्म कर देगी। जिसे तुम ‘मैनेजमेंट’ की कला कहते हो, वह असल में वह उमस और बदबू है जो तब पैदा होती है जब बहुत सारे महत्वाकांक्षी लोग एक वातानुकूलित कमरे में बंद होकर एक-दूसरे की उम्मीदों पर पेशाब करते हैं।
जरा सोचो, वह सुबह की ‘स्टैंड-अप मीटिंग’? वह कुछ और नहीं, बल्कि एक पुराने, घिसे हुए डीजल इंजन की वह कर्कश आवाज़ है जो हमेशा के लिए बंद होने से पहले आखिरी बार फड़फड़ाता है। तुम वहां ‘इनोवेशन’ या ‘भविष्य’ की बातें नहीं करते, तुम बस उस भयानक खालीपन को शब्दों से भरने की कोशिश करते हो जो तुम्हारे बैंक बैलेंस और तुम्हारी फटी हुई जेब के बीच मौजूद है। तुम्हारी मेहनत उस सड़क किनारे बिकने वाले पकौड़ों के तेल जैसी है, जिसे मुनाफे के लिए इतनी बार उबाला गया है कि अब उसमें पोषण नहीं, सिर्फ कैंसर बचा है। तुम बस एक ‘नंबर’ हो जिसे एक्सेल शीट में एक और ‘नंबर’ से कभी भी बदला जा सकता है, और यही तुम्हारी पूरी हकीकत है।
और यह ‘टीम वर्क’ का ढोंग? यह तो और भी घिनौना है। यह वैसा ही है जैसे डूबती हुई नाव में बैठे दस लोग एक-दूसरे का हाथ पकड़कर यह सोचें कि शायद एकजुटता से वे डूबेंगे नहीं। तुम्हारी भावनाएं, तुम्हारा ‘डेडिकेशन’, यह सब तुम्हारे दिमाग के उस हिस्से की रासायनिक खुजली है जिसे तुम्हारा बॉस बड़ी चतुराई से सहलाता है। तुम उस सस्ते चाइनीज चार्जर की तरह हो जो फोन को चार्ज तो करता है, पर खुद इतना गर्म हो जाता है कि किसी भी दिन फट सकता है।
विसर्जन
जिंदा रहने का मतलब ही है—कचरा फैलाना। विज्ञान कहता है कि एक ‘डिसिपेटिव स्ट्रक्चर’ (Dissipative Structure) तभी तक कायम रहता है जब तक वह अपने अंदर की अव्यवस्था को बाहर फेंक सके। और वह कचरा कौन है? वह तुम हो। तुम्हारी छंटनी, तुम्हारा डिमोशन, तुम्हारी वह अपमानजनक ‘परफॉरमेंस रिपोर्ट’—यह सब उस गंदगी का हिस्सा है जिसे सिस्टम को खुद को साफ रखने के लिए बाहर फेंकना ही पड़ता है। शांति एक झूठ है। स्थिरता मौत है। अगर तुम्हारा दफ्तर आज शांत है, तो समझो कि उसकी कब्र खुदी जा चुकी है।
इस अनिवार्य बर्बादी को ढंकने के लिए तुम दिखावे का सहारा लेते हो। कोई उस चमड़े की कुर्सी पर बैठकर खुद को शहंशाह समझता है, जबकि असल में वह कुर्सी सिर्फ उसकी झुकती हुई रीढ़ की हड्डी का मजाक उड़ा रही होती है। तुम चाहे जितनी भी महंगी गद्दी पर अपनी कमर टिका लो, उस पर बैठने वाला शरीर वही है जो कल सुबह फिर से उसी ट्रैफिक जाम में रेंगता हुआ आएगा, वही धूल फांकेगा और वही जलालत सहेगा। वह कुर्सी तुम्हें काम करने में मदद नहीं करती, वह बस तुम्हें यह झूठा अहसास दिलाती है कि तुम अभी पूरी तरह से खत्म नहीं हुए हो, जबकि अंदर से तुम कब के खोखले हो चुके हो।
ब्यूरोक्रेसी? वह उस नाली की गाद है जो बहना बंद कर चुकी है। फाइलें, अप्रूवल, सीसी (CC) में रखे गए ईमेल का वह अंतहीन सिलसिला—यह सब उस ऊर्जा का सबूत है जो किसी सार्थक काम में नहीं बदली, बल्कि बस एक सड़ी हुई परत की तरह सिस्टम की धमनियों में जम गई है। तुम जितना ज्यादा ‘सिस्टम’ सुधारने की बात करते हो, तुम उतना ही ज्यादा उस दलदल में धंसते जाते हो।
खालीपन
जिसे तुम ‘रणनीति’ या ‘विजन’ कहते हो, वह सिर्फ एक जुआ है जो तुम अपनी हार को कुछ दिन और टालने के लिए खेलते हो। हम जितना ज्यादा डेटा इकट्ठा करते हैं, उतना ही हम उस भूख को भूल जाते हैं जो हमें यहाँ खींच लाई थी। तुम्हारी डिजिटल दुनिया, तुम्हारे रंगीन डैशबोर्ड्स, तुम्हारे पाई-चार्ट्स—यह सब उस शोर को दबाने की कोशिश है जो तुम्हें रात को सोने नहीं देता। यह शोर उस कर्ज का है जो तुमने अपनी आत्मा पर लिया है ताकि तुम वह ईएमआई चुका सको जो तुम्हें कभी चैन से जीने नहीं देगी।
लीडरशिप का असली मतलब जानते हो? यह उस डूबते हुए जहाज के कप्तान जैसा है जो यात्रियों को यह यकीन दिलाता है कि नीचे का पानी बहुत ठंडा और सेहतमंद है, ताकि वे बिना शोर मचाए डूब जाएं। वे तुम्हें ‘फ्लेक्सिबिलिटी’ और ‘मेंटल हेल्थ’ के वादे बेचते हैं, ठीक वैसे ही जैसे एक कसाई बकरे को काटने से पहले उसे हरी घास खिलाता है। यह सब एक ऐसा खेल है जहाँ नियम तुम्हारे खिलाफ बने हैं और इनाम सिर्फ वह थकान है जो तुम्हें मरने के बाद ही छोड़ेगी।
थक गया हूँ तुम्हारी यह झूठी, आशान्वित मुस्कान देखकर। याद रखना, तुम जिसे ‘ऑर्डर’ या ‘व्यवस्था’ कहते हो, वह बस उस भयानक बिखराव को एक कोने में समेटने की नाकाम कोशिश है। उस शानदार ऑफिस की कांच की दीवारों के पीछे सिर्फ घुटन है। जब तुम्हारी बैटरी पूरी तरह खत्म हो जाएगी और तुम्हारा जैविक सिस्टम ‘क्रैश’ हो जाएगा, तब न कोई तुम्हारी ‘लॉयल्टी’ को पूछेगा और न तुम्हारे ‘अचीवमेंट्स’ को। अंत में सिर्फ वही सन्नाटा बचेगा जो तुम्हारी खाली जेब में है और वही ठंडापन जो तुम्हारी इस बेस्वाद चाय में आ चुका है। जाओ, अब अपनी उस बेमतलब की फाइल को फिर से खोलो। दुनिया को थोड़ा और गंदा करना अभी बाकी है。

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