श्रम का नग्न सत्य: पेट की आग और सूचना का कचरा
आज के इस दौर में जिसे हम ‘नॉलेज इकोनॉमी’ का नाम देकर खुद को तीस मार खाँ समझते हैं, वह असल में न्यूरॉन्स के आत्महत्या करने का एक धीमा और दर्दनाक तरीका है। जिसे तुम ‘संज्ञानात्मक श्रम’ (Cognitive Labor) कहते हो, वह भौतिकी की नजर में केवल एन्ट्रापी (Entropy) का एक भद्दा उत्सव है। तुम सोचते हो कि स्क्रीन के सामने बैठकर तुम दुनिया बदल रहे हो, लेकिन वास्तव में तुम केवल अपने शरीर के ग्लूकोज को उस ‘सूचना’ में बदल रहे हो जिसका मूल्य बाजार में रद्दी के भाव से भी कम है।
कॉर्पोरेट जगत ने ‘मल्टी-टास्किंग’ को एक ऐसी कला बना दिया है जिसकी पूजा की जाती है। लेकिन जरा ठहरिए और इसे एक सड़क छाप दार्शनिक की नजर से देखिए। यह मल्टी-टास्किंग वैसा ही है जैसे तुम एक ही थाली में बासी जलेबी, तीखी चाट और कड़वा करेला ठूँस लो और फिर उम्मीद करो कि तुम्हारे पेट में संगीत बजेगा। हकीकत में, तुम्हारा दिमाग उस बदहजमी से जूझ रहा है जो तुम्हें मानसिक दस्त की ओर ले जा रही है। जब तुम एक्सेल शीट के एक सेल से हटकर अचानक स्लैक (Slack) की किसी बेतुकी बहस में कूदते हो, तो तुम्हारी एकाग्रता वैसे ही बिखर जाती है जैसे फटी हुई जेब से गिरे हुए सिक्के—हर सिक्का एक अलग, गंदी नाली में गिरता है। तुम घुटनों के बल बैठकर कीचड़ में हाथ डालते हो, उन सिक्कों को वापस पाने के लिए, लेकिन हाथ में सिर्फ गंध और निराशा आती है। क्या यही तुम्हारी दक्षता है?
ज्यामिति का हफ्ता-वसूली अभियान
अब जरा अपनी इस लाचारी को गणित के उस क्रूर आईने में देखो जिसे ‘सूचना ज्यामिति’ (Information Geometry) कहते हैं। यह कोई सुंदर चित्रकारी नहीं है; यह वह नक्शा है जो बताता है कि तुम कितने गहरे पानी में हो। जब तुम एक कार्य से दूसरे कार्य (Task Switching) पर जाते हो, तो तुम वास्तव में ‘प्रोबेबिलिटी डिस्ट्रीब्यूशन’ के एक बिंदु से दूसरे बिंदु तक की यात्रा कर रहे होते हो। इसे ‘फिशर सूचना मीट्रिक’ (Fisher Information Metric) से मापा जाता है। सुनने में यह शब्द किसी नोबेल पुरस्कार जैसा लग सकता है, लेकिन व्यवहार में यह उस स्थानीय गुंडे की तरह है जो संकरी गली के हर मोड़ पर तुमसे हफ्ता वसूलता है।
सोचिए कि आपके दिमाग का काम एक ‘रीमानियन मैनीफोल्ड’ (Riemannian Manifold) पर चलना है। हर बार जब आप अपना संदर्भ बदलते हैं, तो आप इस उबड़-खाबड़ सतह पर एक लंबी दूरी तय करते हैं। भौतिकी का नियम अटल है: दूरी तय करने के लिए ऊर्जा चाहिए। यहाँ वह ऊर्जा ऊष्मा (Heat) के रूप में नष्ट होती है। तुम काम नहीं कर रहे हो; तुम बस अपने दिमाग के इंजन को रेड-लाइन पर चला रहे हो बिना गियर बदले। यह घर्षण, यह गर्मी, यह तनाव—यह सब वह ‘टोल टैक्स’ है जो तुम अपनी ही बर्बादी के लिए भर रहे हो। तुम जितना अधिक भागते हो, फिशर मीट्रिक के अनुसार तुम्हारी ‘दूरी’ उतनी ही बढ़ती जाती है, लेकिन तुम पहुँचते कहीं नहीं हो। तुम बस एक ज्यामितीय चक्रव्यूह में फंसे हुए चूहे हो जो अपनी ही पूंछ का पीछा करते-करते थक गया है।
विशिष्टता का पाखंड और प्लास्टिक का सहारा
इस ज्यामितीय नरक से बचने के लिए, दुनिया तुम्हें ‘विशिष्टता’ (Specialization) का झुनझुना थमाती है। वे कहते हैं, “गहराई में जाओ!” जैसे कि गहरे कुएं में कूदना ही मोक्ष है। और जब तुम्हारी रीढ़ की हड्डी इस बोझ के नीचे चटकने लगती है, और तुम्हारी गर्दन उस स्क्रीन को घूरते-घूरते अकड़ जाती है, तो बाजार तुम्हारे सामने एक और भ्रम परोसता है। वे तुम्हें यकीन दिलाते हैं कि अगर तुम अपनी गाढ़ी कमाई का एक बड़ा हिस्सा निकालकर एक महँगी एर्गोनोमिक कुर्सी खरीद लोगे, तो सब ठीक हो जाएगा। साढ़े तीन लाख रुपये का प्लास्टिक और जाली! तुम इसे खरीदते भी हो, यह सोचकर कि शायद यह कुर्सी तुम्हारे बिखरते हुए न्यूरॉन्स को वापस जोड़ देगी।
पागलपन की हद देखो। तुम उस कुर्सी पर बैठते हो जो नासा के किसी यान जैसी दिखती है, लेकिन तुम उसमें बैठकर वही घिसी-पिटी ईमेल टाइप कर रहे होते हो। यह कुर्सी तुम्हारे दिमाग की एन्ट्रापी को कम नहीं करती; यह सिर्फ तुम्हें आराम से बर्बाद होने की सुविधा देती है। अंततः, जिसे हम ‘उत्पादकता’ कहते हैं, वह केवल सूचना के सुचारू प्रवाह और न्यूनतम ‘ज्यामितीय शोर’ का खेल है। लेकिन हम शोर के इतने आदी हो चुके हैं कि सन्नाटा हमें काटता है। हम बस भाग रहे हैं, जल रहे हैं, और नष्ट हो रहे हैं।
सिर दर्द हो रहा है। घर जाना है।

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