श्रम अपव्यय

श्रम की दुर्गंध: एन्ट्रापी, पसीना और जली हुई उम्मीदें

पिछले हफ्ते, उस तेल की गंध से सनी हुई सस्ती कैंटीन में, जहाँ समोसे की बासी महक और लोगों की निराशा एक साथ हवा में तैर रही थी, तुम ‘दक्षता’ (Efficiency) पर प्रवचन दे रहे थे। सुनकर उबकाई आने लगी। तुम जैसे लोगों को लगता है कि ‘प्रबंधन’ कोई विज्ञान है, जबकि असलियत में यह तुम्हारी भूख और फटे हुए बटुए से टपकती हताशा के बीच खींची गई, एक बहुत ही बारीक और क्रूर लकीर है।

श्रम को ‘पवित्र’ या ‘रचनात्मक’ कहना बंद करो। यह ब्रह्मांड के सबसे निष्ठुर नियम—ऊष्मागतिकी (Thermodynamics)—के खिलाफ एक हारी हुई लड़ाई है। तुम केवल अपने शरीर का तापमान बढ़ा रहे हो, अपने कपड़ों को पसीने से तर कर रहे हो, और वातावरण में बेचैनी भरी गर्मी फैला रहे हो। यह कोई उपलब्धि नहीं है; यह शुद्ध दहन है।

कचरे का ढेर और विसर्जक संरचनाएँ

क्या तुम्हें वाकई लगता है कि ऑफिस में आठ घंटे बैठकर, एक्सेल शीट के उन बेजान खानों को रंगकर तुम ब्रह्मांड में ‘व्यवस्था’ (Order) पैदा कर रहे हो? क्या भद्दा मजाक है। भौतिकी की नज़रों में, तुम एक ‘विसर्जक संरचना’ (Dissipative Structure) से ज्यादा कुछ नहीं हो। तुम्हारा अस्तित्व केवल इसलिए बना हुआ है क्योंकि तुम लगातार ऊर्जा का विनाश कर रहे हो। तुम बस उस ₹50 के सड़क छाप इंस्टेंट नूडल्स से मिली सस्ती, पाम-तेल युक्त कैलोरी को स्क्रीन पर चमकते हुए बेकार इलेक्ट्रॉनों में बदल रहे हो। तुम एक ‘ऊष्मीय निकास नली’ (Heat exhaust pipe) हो, जिसका काम केवल ब्रह्मांड की एन्ट्रापी बढ़ाना है।

तुम्हारी वह तथाकथित ‘साफ-सुथरी डेस्क’ इस बात का सबूत है कि तुमने अपने दिमाग के पिछवाड़े में और अपनी जिंदगी के बाकी हिस्सों में कितना मानसिक कचरा (Entropy) जमा कर रखा है। एक ईमेल टाइप करते समय तुम्हारे न्यूरॉन्स जो गर्मी पैदा करते हैं, वह तुम्हारे आसपास की हवा को सड़ा देती है। जब तक तुम एक ‘प्रोजेक्ट’ खत्म करते हो, तुम्हारी जिंदगी का एक बड़ा हिस्सा जलकर ‘गर्म कचरे’ के रूप में अस्तित्वहीन हो चुका होता है। और उस गर्मी से, तुम्हारे बगल में बैठे उस नाकारा सहकर्मी के पसीने की बदबू और भी तीखी हो जाती है। यही तुम्हारी ‘वैल्यू एडिशन’ की असलियत है।

जैविक ‘बग’ और उबलता इंजन

और यह जो भावनाओं का ड्रामा तुम करते हो… अगर तुम्हें लगता है कि यह ‘इंसानियत’ है, तो तुम सबसे बड़े मूर्ख हो। यह तुम्हारे सिस्टम का ‘बग’ है। काम के बीच में वह अचानक बीयर पीने की तलब, या बॉस के चेहरे पर मुक्का मारने की वह दबी हुई इच्छा—यह तुम्हारी आत्मा की आवाज नहीं है। यह तुम्हारा नर्वस सिस्टम चीख रहा है कि ‘सूचना प्रसंस्करण’ की सीमा पार हो चुकी है और तार जलने वाले हैं।

यह ठीक वैसा ही है जैसे कोई खटारा स्कूटर खड़ी चढ़ाई पर चढ़ते हुए काला धुआं उगलता है और उसका इंजन फटने को तैयार होता है। तुम चाहे जितनी भी महंगी लक्जरी एर्गोनोमिक कुर्सी पर अपनी तशरीफ टिका लो, वह तुम्हारे रीढ़ की हड्डी में जमा हो रही थकान—जो कि शुद्ध भौतिक एन्ट्रापी है—को रोक नहीं सकती। तुम बस अपनी शारीरिक टूट-फूट को थोड़ा ‘महंगा’ और ‘ब्रांडेड’ दिखाने की कोशिश कर रहे हो। यह कुर्सी तुम्हारे जीवन के घिसने की आवाज़ को कीबोर्ड की खटर-पटर में छुपाने का एक ढोंग है।

स्वचालित परजीवी

फिर आते हैं वो ‘गणितीय परजीवी’ (Automated Parasites), जिन्हें तुम आधुनिक तकनीक कहते हो और सोचते हो कि वे तुम्हारा काम आसान कर रहे हैं। यह आधुनिक गुलामों का सबसे बड़ा भ्रम है। ये मशीनें जानकारी को सुलझाती नहीं, बल्कि उसे उल्टी की तरह उगलती हैं। अब तुम इंसान नहीं, बल्कि एक सफाई कर्मचारी हो, जिसका काम मशीनों द्वारा फैलाए गए डिजिटल मलबे को बाल्टी भर-भर के बाहर फेंकना है। हर नोटिफिकेशन तुम्हारे ध्यान को खंडित करता है और तुम्हारी ऊर्जा को बिखेर देता है।

इस शोरगुल से बचने के लिए तुम महंगे नॉइज़-कैंसलिंग हेडफ़ोन खरीदते हो, यह सोचकर कि तुम्हें शांति मिलेगी। तुम अपनी ही कमाई को उस शांति को खरीदने में लगा देते हो जिसे तुमने काम करने के लिए बेचा था। लेकिन तुम्हारे कानों में बजने वाला वह संगीत भी तुम्हारे सीमित श्रवण संसाधनों को जला रहा है और खोपड़ी के अंदर और अधिक ‘गर्मी’ पैदा कर रहा है।

जिसे तुम ‘करियर की प्रगति’ कहते हो, वह असल में तुम्हारे ईंधन के खत्म होने का काउंटडाउन है। चाहे तुम कितना भी स्मार्ट बनने का नाटक कर लो, अंत में तुम उस ठंडे पड़ चुके, बासी समोसे की तरह हो जिसे कोई नहीं पूछता। तुम जल रहे हो ताकि किसी और की बैलेंस शीट ठंडी रहे।

बकवास बंद करो। घर जाओ, बत्तियां बुझाओ और अंधेरे कमरे में अपनी सांसें गिनो। शायद वही एकमात्र ‘व्यवस्था’ है जो तुम्हारे पास बची है।

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