ऊष्मागतिकीय अनुकूलन
पिछली बार जब हम उस सीलन भरे, सस्ते शराबखाने में बैठे थे, जहाँ व्हिस्की में पानी की मात्रा नैतिकता से अधिक थी, तो मैंने कहा था कि ‘आलस्य’ ही सभ्यता का असली इंजन है। लोग इसे ‘अक्षमता’ कहकर नाक सिकोड़ते हैं, लेकिन मैं इसे ‘ऊष्मागतिकीय अनुकूलन’ (Thermodynamic Optimization) मानता हूँ। यह ब्रह्मांड का सबसे बुनियादी सत्य है: हर प्रणाली अपनी ऊर्जा बचाना चाहती है। आज का यह चमकता हुआ कॉर्पोरेट जगत, जिसे आप ‘करियर’ कहते हैं और जिसके लिए आप अपनी जवानी होम कर रहे हैं, वह असल में और कुछ नहीं बल्कि एक ‘विक्षेपी संरचना’ (Dissipative Structure) है। यह ढांचा केवल इसलिए टिका है क्योंकि हम, यानी जैविक ईंधन की इकाइयां, इसमें अपनी जीवन-ऊर्जा को जलाकर इसकी आंतरिक अराजकता को बाहर फेंक रहे हैं।
जिसे आप गर्व से ‘काम पूरा करना’ या ‘प्रोडक्टिविटी’ कहते हैं, वह असल में ब्रह्मांड के दूसरे नियम (Second Law of Thermodynamics) के खिलाफ एक हारी हुई जंग है। यह बिल्कुल वैसा ही है जैसे दिल्ली की जून वाली तपती धूप में एक फटी हुई बनियान पहनकर बिना पानी वाले कूलर के सामने बैठना—आप ठंडे नहीं हो रहे, आप बस अपनी शारीरिक गर्मी और हताशा को कमरे के बाकी हिस्सों में फैला रहे हैं। हम निर्माण नहीं कर रहे; हम बस क्षय की प्रक्रिया को प्रबंधित कर रहे हैं।
सड़ांध और व्यवस्था
इल्या प्रिगोजिन ने जब ‘गैर-साम्यावस्था’ (Non-equilibrium) की बात की थी, तो उनका मतलब शायद रसायनों से था, लेकिन अगर आप ध्यान से देखें तो यह आपके ऑफिस के उस ‘ओपन फ्लोर प्लान’ की सटीक परिभाषा है। वहाँ हर कोई एक-दूसरे की मानसिक सड़ांध और कार्बन डाइऑक्साइड को सूंघ रहा है। एक जीवित प्रणाली केवल तभी तक ‘व्यवस्थित’ रह सकती है जब तक वह बाहर से उच्च गुणवत्ता वाली ऊर्जा (आपकी सैलरी और कैफीन) लेती रहे और अंदर की गंदगी (एंट्रॉपी) को बाहर निकालती रहे।
लोग अक्सर ‘टीम वर्क’ और ‘सिनर्जी’ जैसे भारी-भरकम शब्दों पर भावुक हो जाते हैं और लिंक्डइन पर कविताएं लिखते हैं। क्या बकवास है। सच तो यह है कि यह एक ‘परजीवी’ (Parasitic) रिश्ता है। एक कॉर्पोरेट ऑफिस असल में एक ऐसी खुली नाली है जिसे साफ़ रखने के लिए आपको लगातार ताज़ा पानी बहाना पड़ता है; जैसे ही आप रुके, स्थिर पानी की बदबू आपको और आपके ‘मिशन स्टेटमेंट’ को लील जाएगी। व्यवस्था एक भ्रम है; केवल अराजकता ही शाश्वत है।
समोसे और सिलिकॉन के गुलाम
जब आप उन ‘सिलिकॉन के गुलामों’ (डिजिटल टूल्स और एल्गोरिदम) के साथ काम करते हैं, तो खुद को कोई ‘विजनेरी’ मत समझिए। आप कोई ‘नवाचार’ नहीं कर रहे होते। आप बस अपनी ‘संज्ञानात्मक मुक्त ऊर्जा’ (Cognitive Free Energy) को कम करने की बेताब कोशिश कर रहे होते हैं। हमारा मस्तिष्क, जो विकासक्रम का सबसे बड़ा धोखेबाज़ है, एक ऐसा लालची और मक्खीचूस अंग है जो केवल ‘अप्रत्यक्ष डर’ (Surprise) को कम करना चाहता है। उसे सोचना पसंद नहीं है, उसे केवल पैटर्न चाहिए।
जब आप किसी जटिल डेटा को प्रोसेस करने के लिए मशीन पर फेंकते हैं, तो आप केवल अपनी मानसिक बदहजमी को दूसरे के सिर मढ़ रहे होते हैं। यह बिल्कुल वैसा ही है जैसे सड़क किनारे मिलने वाला वह समोसे वाला, जो उसी काले पड़ चुके, झागदार तेल में बार-बार समोसे तलता है ताकि उसे नया तेल न खरीदना पड़े। उसे पता है कि तेल ज़हर बन चुका है, लेकिन नया तेल खरीदने की उसकी हैसियत नहीं है। आपकी बुद्धि भी अब उसी इस्तेमाल किए हुए तेल की तरह चिपचिपी, बासी और बदबूदार हो चुकी है। आप पुराने विचारों को नए टूल्स में तलकर ‘स्मार्ट वर्क’ का लेबल लगा रहे हैं।
मानसिक कंगाली का अर्थशास्त्र
एक ‘आर्किटेक्ट’ के तौर पर जब मैं इस दुनिया के ढांचे को देखता हूँ, तो मुझे इंसानी जज्बात नहीं, बल्कि ऊर्जा की भयावह बर्बादी दिखाई देती है। आज का ‘मॉडर्न’ इंसान खुद को बहुत विकसित समझता है, लेकिन उसकी मानसिक हालत उस सस्ते चीनी स्मार्टफोन की बैटरी जैसी है जो सौ प्रतिशत चार्ज होने का दावा तो करती है, लेकिन एक वीडियो कॉल शुरू होते ही दम तोड़ देती है। हम इन बाहरी सहयोगियों और गैजेट्स की तलाश इसलिए करते हैं क्योंकि हम खुद को सोचने की ज़हमत से बचाना चाहते हैं। सोचना महंगा है, इसमें कैलोरी जलती है, और आप सब मानसिक रूप से कंगाल हैं।
बाज़ार की विडंबना देखिए। उस हास्यास्पद रूप से महंगे लेदर जर्नल को देखिए, जिसकी कीमत में एक गरीब परिवार का पूरे महीने का राशन आ जाए। लोग इसे ‘क्रिएटीविटी’ और ‘माइंडफुलनेस’ के लिए ज़रूरी बताते हैं, लेकिन असल में यह आपकी संज्ञानात्मक विफलता को छिपाने का एक महंगा ढोंग है। उस मखमली कागज़ पर भी आप वही दो कौड़ी के विचार लिखेंगे जो आपने कहीं से कॉपी किए हैं या किसी मीटिंग में उबासी लेते हुए सुने हैं। इतनी महंगी नोटबुक में अपनी सड़ी हुई लिखावट और बासी आइडियाज दर्ज करना वैसा ही है जैसे किसी कचरे के ढेर पर महंगा इत्र छिड़कना। आप अपनी मानसिक ऊर्जा को बचाने के लिए इन महंगे खिलौनों का सहारा लेते हैं, लेकिन आपकी रीढ़ की हड्डी उस एर्गोनोमिक कुर्सी पर बैठे-बैठे वैसे ही टेढ़ी हो रही है जैसे किसी पुराने ढाबे का लकड़ी का बेंच। यह सब दिखावा है, अंदर से सब खोखला है।
मौत की तैयारी
यह सिलिकॉन और मांस का मिलन, जिसे आप ‘फ्यूचर ऑफ वर्क’ कहते हैं, कोई ‘स्वर्ण युग’ नहीं है। यह ‘ऊष्मीय मृत्यु’ (Heat Death) की ओर बढ़ता हुआ एक छोटा सा, थका हुआ कदम है। जितना अधिक आप अपने कामों को मशीनों पर थोपते हैं, उतनी ही आपकी अपनी गहराई कम होती जाती है। आप सूचनाओं के उस ट्रैफिक जाम में फंसे हुए हैं जहाँ हर कोई पागलों की तरह हॉर्न बजा रहा है लेकिन किसी के पास जाने के लिए कोई जगह नहीं है। आप उस पुरानी एम्बेसडर कार की तरह हैं जो धुआं तो बहुत छोड़ती है, शोर भी बहुत मचाती है, लेकिन जिसकी रफ्तार साइकिल से भी कम है।
मुक्त ऊर्जा का यह न्यूनतमकरण हमें एक ऐसी अवस्था में ले जा रहा है जहाँ ‘सोच’ एक विलासिता बन जाएगी। हम केवल प्रतिक्रिया करने वाले तंत्र बन जाएंगे—बिना दिमाग के रिले स्टेशन। एक इनपुट आएगा, हम उसे अपने डिजिटल साथी की ओर धकेलेंगे, और एक आउटपुट निकलेगा। इस पूरी प्रक्रिया में ‘इंसान’ केवल एक बिजली के तार की तरह काम करेगा, जिसके भीतर से बस करंट बह रहा है, लेकिन उसका अपना कोई वजूद नहीं है। और याद रखिएगा, अत्यधिक करंट से वह तार भी अंत में जलकर राख हो जाएगा।
घर जाना है।
यह सब जो आप कर रहे हैं—डेडलैब्स, क्वार्टरली रिपोर्ट्स, स्ट्रैटेजी मीटिंग्स—यह ब्रह्मांड की नज़र में केवल ऊष्मा का अपव्यय है। हम बस व्यवस्थित तरीके से खुद को नष्ट कर रहे हैं। अगली बार जब आप किसी टास्क को ‘ऑप्टिमाइज़’ करने की सोचें, तो याद रखिएगा कि आप केवल अपनी अर्थी को थोड़ा और आरामदायक बनाने के लिए रेशमी तकिया ढूंढ रहे हैं। बाकी सब केवल शोर है, जो जल्द ही शांत हो जाएगा।

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