बाज़ार की ऊष्मप्रवैगिकी

बाज़ार में जो ‘प्रबंधन गुरु’ और ‘इनोवेशन’ के मसीहा ज्ञान बाँट रहे हैं, वे असल में एक बड़े भ्रम के सौदागर हैं। सत्य कड़वा है, और वह किसी मोटिवेशनल स्पीच में नहीं, बल्कि ऊष्मप्रवैगिकी (Thermodynamics) के रूखे नियमों में छिपा है। व्यापार कोई ‘विजन’ नहीं है, यह केवल एक बंद प्रणाली (Closed System) के भीतर ‘एन्ट्रॉपी’ यानी अव्यवस्था के खिलाफ लड़ा जाने वाला एक हताश युद्ध है। जिसे आप ‘सफलता’ कहते हैं, वह वास्तव में ‘मुक्त ऊर्जा’ (Free Energy) को न्यूनतम करने की एक जैविक और गणितीय छटपटाहट मात्र है।

एन्ट्रॉपी की सडांध और अस्तित्व का संघर्ष

बाज़ार एक विशाल कूड़ेदान की तरह है जहाँ हर पल अव्यवस्था बढ़ रही है। क्या आपने कभी गर्मियों में मुंबई की लोकल ट्रेन या दिल्ली की खचाखच भरी बस में सफर किया है? वह पसीना, वह उमस, और बगल वाले यात्री की सांसों की दुर्गंध—यही एन्ट्रॉपी का असली स्वरूप है। कॉर्पोरेट जगत में जिसे ‘अनिश्चितता’ कहा जाता है, वह वही बदबू है। हर कंपनी, हर स्टार्ट-अप बस इस बदबू से बचने के लिए, यानी ‘भविष्यवाणी की त्रुटि’ (Prediction Error) को कम करने के लिए संघर्ष कर रहा है। जब कोई सीईओ ‘स्थिरता’ की बात करता है, तो वह वास्तव में यह कह रहा होता है कि वह बाज़ार की उस अराजकता से डरा हुआ है जो उसकी बैलेंस शीट को जलाकर राख कर देगी।

इस अराजकता से बचने के लिए ही इंसान पागलों की तरह खर्च करता है। उदाहरण के लिए, जब कोई व्यक्ति अपनी रीढ़ की हड्डी को बचाने के लिए Herman Miller Aeron जैसी महंगी कुर्सी खरीदता है, तो वह ‘लक्जरी’ नहीं खरीद रहा होता। वह अपने शरीर की एन्ट्रॉपी—कमर दर्द और शारीरिक क्षय—को धीमा करने की एक दयनीय कोशिश कर रहा होता है। यह एर्गोनॉमिक्स का नाटक सिर्फ अस्तित्व को बनाए रखने का एक महंगा जुगाड़ है, ताकि वह मशीन का पुर्जा बनकर कुछ साल और घिस सके।

जैविक हैकिंग और मुक्त ऊर्जा का सिद्धांत

कार्ल फ्रिस्टन का ‘फ्री एनर्जी प्रिंसिपल’ इस तमाशे की पोल खोल देता है। जीवित तंत्रों (और कंपनियों) का एकमात्र लक्ष्य ‘आश्चर्य’ (Surprise) को कम करना है। हम वह नहीं देखते जो सच है; हम वह देखते हैं जो हमारी भविष्यवाणी की पुष्टि करता है। सड़क किनारे बिकने वाली तेल में डूबी कचौड़ी या समोसा इसलिए नहीं बिकता कि वह ‘स्वादिष्ट’ है, बल्कि इसलिए बिकता है क्योंकि वह सबसे कम ‘संज्ञानात्मक भार’ (Cognitive Load) के साथ भूख की अनिश्चितता को मिटा देता है। यह एक सस्ता डोपामाइन हैक है।

ग्राहक देवता नहीं है, वह केवल एक जैविक मशीन है जो अपने दिमाग के ‘प्रेडिक्शन एरर’ को शांत करना चाहता है। ब्रांड लॉयल्टी और कुछ नहीं, बस दिमाग को नया विकल्प खोजने की मेहनत से बचाने का एक तरीका है। यह सब न्यूरोबायोलॉजिकल स्तर पर होने वाली लेन-देन है, जिसे मार्केटिंग वाले ‘रिश्ता’ का नाम दे देते हैं। बकवास।

एल्गोरिदम: निर्मम सफाई कर्मचारी

और अब, उस चीज़ की बात करते हैं जिसे लोग डर और उम्मीद की नज़र से देखते हैं—एल्गोरिदम। जिसे आप ‘कृत्रिम बुद्धिमत्ता’ कहते हैं, वह वास्तव में ‘नकारात्मक एन्ट्रॉपी’ (Negentropy) का एक विशाल वैक्यूम क्लीनर है। यह कोई सोचता-समझता जीव नहीं है; यह एक निर्मम सफाई कर्मचारी है। इसका काम है सूचना के उस पहाड़ को छानना जिसे इंसानी दिमाग प्रोसेस नहीं कर सकता। ये गणना मशीनें भावनाओं के ‘बग्स’ से मुक्त हैं। इंसान थकता है, उसे ‘बर्नआउट’ होता है, उसे ‘सहानुभूति’ की बीमारी होती है। लेकिन यह गणितीय राक्षस सिर्फ पैटर्न देखता है।

यह बाज़ार के शोर (Noise) में से सिग्नल निकालता है और उसे मुनाफे में बदल देता है। जो लोग इस शोर को बर्दाश्त नहीं कर पाते, वे Sony के नॉइज़ कैंसिलिंग हेडफ़ोन का सहारा लेते हैं। वे कान बंद करके सोचते हैं कि उन्होंने शोर को खत्म कर दिया, जबकि उन्होंने सिर्फ अपनी मृत्यु की आहट को सुनने से इनकार किया है। यह शांति नहीं, यह पलायन है। अंततः, यह सब एक ‘हीट डेथ’ की ओर बढ़ रहा है। आप कितना भी अनुकूलन (Optimization) कर लें, ऊष्मप्रवैगिकी का दूसरा नियम आपको छोड़ेगा नहीं। बाज़ार की प्रतिस्पर्धा केवल यह तय करने का खेल है कि कौन अपनी राख होने की प्रक्रिया को थोड़ा और लंबा खींच सकता है। हम सब सांख्यिकीय ग्राफ पर बने छोटे-छोटे बिंदु हैं जो अपनी बारी का इंतज़ार कर रहे हैं। यहाँ कोई विजेता नहीं है, केवल वे हैं जो हारने में थोड़ा अधिक समय लेते हैं।

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