विसर्जन: चिपचिपी तलछट का सच
पिछली बार जब हम इस सड़क किनारे की टपरी पर बैठे थे, तो तुम ‘श्रम की गरिमा’ जैसे भारी-भरकम शब्दों का जुगाड़ कर रहे थे। लेकिन क्या तुमने कभी अपनी चाय की प्याली के तल में जमी हुई चीनी को देखा है? वह ‘विकास’ का सबसे सटीक और घिनौना मॉडल है—चिपचिपा, काला, और अंततः किसी काम का नहीं। जिसे तुम ‘राष्ट्र निर्माण’ कहते हो, वह दरअसल ऊर्जा के विनाश का एक भव्य तमाशा है। ये कंक्रीट के ढांचे, ये आठ लेन वाले एक्सप्रेसवे—ये कोई उपलब्धि नहीं हैं। ये केवल उस ऊर्जा को सोखने के वाल्व हैं जो टैक्स देने वाले की पीठ तोड़कर निकाली गई है।
एक सरकारी विभाग को किसी ‘विघटनकारी संरचना’ (Dissipative structure) के रूप में देखना बंद करो। उसे एक ऐसी सड़ी हुई लाश की तरह देखो जो केवल इसलिए फूल रही है क्योंकि उसके अंदर की गैसें—जो कि शुद्ध भ्रष्टाचार है—बाहर निकलने का रास्ता खोज रही हैं। लोग कहते हैं कि “यह अस्पताल पीढ़ियों की सेवा करेगा।” क्या बकवास है। यह अस्पताल बनने से पहले ही मर चुका होता है, क्योंकि इसकी आधी ईंटें ठेकेदार के नए बंगले की नींव में दब चुकी होती हैं। स्थिरता (Sustainability) एक ऐसा झूठ है जो हम खुद को बताते हैं ताकि रात को सो सकें। हकीकत तो यह है कि यह पूरा ढांचा एन्ट्रापी (Entropy) का एक ऐसा डंपिंग ग्राउंड है, जहाँ व्यवस्था (Order) केवल फाइलों के धूल भरे ढेर में दम तोड़ती है। यह बिल्कुल वैसा ही है जैसे आप एक बहुत महंगे स्मार्टफोन पर, किसी नेटवर्क-विहीन गाँव में, लगातार रिफ्रेश बटन दबाते रहें—स्क्रीन की तपिश आपकी उंगलियों को जलाएगी, बैटरी खत्म हो जाएगी, लेकिन सिग्नल कभी नहीं आएगा। हम बस गर्मी पैदा कर रहे हैं, काम नहीं।
बेवकूफी है।
ऊष्मागतिकी: समोसे की चिकनाई और थर्मल डेथ
संगठन के भीतर ‘नेगेटिव एन्ट्रापी’ का सिद्धांत दरअसल उन मोटे, अधेड़ उम्र के क्लर्कों के पेट में छिपा है जो दोपहर के तीन बजे तक समोसे की चिकनाई अपनी उंगलियों से पोंछते रहते हैं। तुम जिसे ‘प्रशासनिक दक्षता’ कहते हो, वह दरअसल कैलोरी को लाल फीते और फाइलों के बेमतलब मूवमेंट में बदलने की एक विफल प्रक्रिया है। एक मेज से दूसरी मेज तक फाइल का जाना—यह ऊष्मागतिकी का दूसरा नियम है। हर कदम पर ऊर्जा नष्ट होती है, और अंत में जो बचता है, वह है शून्य। यह घर्षण ही इस तंत्र की वास्तविकता है। पैसे का प्रवाह इनपुट है, और आउटपुट है देरी, धूल और बहाने।
कभी उस सरकारी दफ्तर की दीवारों को करीब से देखा है? वह जो पान की पीक और सीलन का संगम है, वह दरअसल ‘सिस्टम’ का असली चेहरा है। हम व्यवस्था बनाने के नाम पर जितना पैसा झोंकते हैं, वह ब्रह्मांड की अव्यवस्था (Chaos) को बढ़ाने के अलावा और कुछ नहीं करता। यह वैसा ही है जैसे कोई भिखारी अपनी फटी हुई जेब को रेशम के धागे से सिलने की कोशिश करे। धागा महंगा है, जेब फिर भी फटेगी।
यही कारण है कि मैं इस सड़ांध के बीच अपनी विस्तृत इटैलियन लेदर से मढ़ी हुई नोटबुक साथ रखता हूँ। इसकी कीमत इतनी है कि इसमें इस दफ्तर की महीने भर की चाय आ जाए। जब मैं इसके चिकने, बेदाग पन्नों पर इन विफल परियोजनाओं के आंकड़े लिखता हूँ, तो मुझे एक अजीब सा सुकून मिलता है। यह जानते हुए कि जिस पैसे से सड़क के गड्ढे भरे जाने थे, वह किसी नेता की बेटी की शादी के शामियाने में फूंका गया, मैं उसे शाही कागज पर दर्ज करता हूँ। इस डायरी की फिनिशिंग और इसकी अमीर गंध ही शायद इस पूरी गंदगी में एकमात्र ऐसी चीज़ है जो मुझे याद दिलाती है कि सुंदरता और पूर्णता (Perfection) अभी भी खरीदी जा सकती है, भले ही उसका उपयोग विनाश का रिकॉर्ड रखने के लिए ही क्यों न हो। हम सब गटर में हैं, लेकिन कम से कम मेरी नोटबुक साफ है।
घिन आती है इन सबसे।
शून्यता: धूल में मिलते सपनों का हिसाब
सूचना ज्यामिति (Information Geometry) का ढोंग छोड़ो। सच तो यह है कि डेटा हमेशा झूठ बोलता है क्योंकि उसे बोलने के लिए पैसे दिए जाते हैं। वह पुल जो पिछले दस साल से ‘निर्माणाधीन’ है, वह कोई इंजीनियरिंग की चुनौती नहीं है। वह शहर की नसों पर चिपका एक परजीवी है जो खून चूस रहा है। वह तब तक नहीं बनेगा जब तक वह पूरी तरह से प्रासंगिक न हो जाए, और जिस दिन रिबन कटेगा, उस दिन उसकी उम्र खत्म हो चुकी होगी। न्यूटन से लेकर बोल्ट्ज़मैन तक, सबने चीख-चीख कर कहा था कि हर सिस्टम अंततः रुक जाएगा, लेकिन हम अभी भी उद्घाटन के पत्थरों पर नाम खुदवाने में व्यस्त हैं।
हम एक ऐसी मशीन के पुर्जे हैं जो खुद को घिसकर सिर्फ धुआं पैदा कर रही है। व्यवस्था का हर प्रयास दरअसल विकार को और अधिक संगठित करने का एक तरीका है। यह अंतहीन चक्र है—टैक्स, बजट, टेंडर, कमीशन और अंत में… एक बड़ा सा गड्ढा। यह चक्र तब तक चलता रहेगा जब तक कि पूरी प्रणाली ‘थर्मल डेथ’ (Thermal Death) को प्राप्त नहीं कर लेती, जहाँ न ऊर्जा बचेगी, न भ्रष्टाचार करने की गुंजाइश। सब कुछ ठंडा पड़ जाएगा, जैसे अभी मेरी चाय पड़ी है।
देखो, चाय ठंडी हो चुकी है और उसमें एक मक्खी तैर रही है। यही तुम्हारी सस्टेनेबिलिटी का अंतिम परिणाम है। दुनिया खत्म नहीं हो रही, वह बस अपनी ही गंदगी में जम रही है। और तुम? तुम बस उस जमने की प्रक्रिया को ‘प्रगति’ का नाम देकर खुद को बहला रहे हो। चलो, यहाँ रुकने का अब कोई मतलब नहीं। यहाँ की हवा में अब सिर्फ हार की गंध बची है।

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