उधारी की नींद

अरे भाई, जरा उस कोने वाली टेबल को देखो। हाँ, वही लैपटॉप के आगे झुका हुआ वह लड़का, जो रात के दो बजे अपनी चौथी ब्लैक कॉफी हलक के नीचे उतार रहा है। उसे लगता है कि वह ‘भविष्य का निर्माण’ कर रहा है, लेकिन हकीकत में वह केवल एक पुराने, जंग लगे इंजन में घटिया ईंधन झोंक रहा है। यह जो ’24/7 हसल’ का तमाशा इस शहर ने खड़ा किया है, यह और कुछ नहीं बल्कि ऊष्मप्रवैगिकी (Thermodynamics) के नियमों के खिलाफ एक हारी हुई लड़ाई है। ये लोग अपनी जैविक सीमाओं को चुनौती नहीं दे रहे हैं; ये बस अपने तंत्रिका तंत्र (Nervous System) के दिवालियापन का जश्न मना रहे हैं।

दिमाग: एक भरा हुआ कूड़ेदान

लोग समझते हैं कि नींद एक ‘ब्रेक’ है, जैसे गाड़ी रोककर चाय पीना। बकवास। अगर तुम असलियत जानते तो तुम्हें नींद से डर लगता। जागना दरअसल एक बीमारी है। जैसे-जैसे दिन बीतता है, तुम्हारा दिमाग उस फटे हुए पर्स जैसा हो जाता है जिसमें तुमने दुनिया भर के ‘उधारी के बिल’ और ‘बेकार रसीदें’ ठूंस रखी हैं। जिसे तुम ‘अनुभव’ या ‘सीखना’ कहते हो, वह दरअसल तुम्हारे न्यूरल मैनिफोल्ड (Neural Manifold) पर पड़ी अनगिनत, भद्दी सिलवटें हैं। यह एक ज्यामितीय दुःस्वप्न है।

सोना कोई आराम नहीं है, यह उस पर्स को उल्टा करके सारा कचरा फर्श पर बिखेरने और उन रसीदों को आग लगाने की हिंसक प्रक्रिया है। और सपने? सपने तो बस उस कचरे के जलने से निकलने वाला जहरीला धुआं हैं। तुम इस धुएं में अर्थ तलाशते हो, जबकि वह केवल तुम्हारे दिमाग की सफाई का साइड-इफेक्ट है। यह सब इतना गंदा और अव्यवस्थित है कि लोग इसे छुपाने के लिए हजारों रुपये फूंक देते हैं। वे सोचते हैं कि एक महंगे ऑर्थोपेडिक मेमोरी फोम गद्दे की ठगी भरी नरमी उनकी रीढ़ की हड्डी में जमा हो चुके इस ज्यामितीय दोष को सीधा कर देगी। वाह, क्या मज़ाक है! फोम का एक टुकड़ा तुम्हारे कर्मों का हिसाब कैसे बराबर कर सकता है?

सिलिकॉन के गुलामों का पसीना

और सिर्फ हम ही नहीं, हमने जो ये सिलिकॉन के गुलाम (Synthetic Intelligence) बनाए हैं, उनकी हालत तो हमसे भी बदतर है। हम उन्हें ‘बुद्धिमान’ कहते हैं, लेकिन अंत में वे भी उसी भौतिक दीवार से टकराते हैं—गर्मी। कभी किसी सर्वर रूम के पास खड़े होकर सूंघा है? वह जली हुई धूल और ओज़ोन की बदबू? वह उन मशीनों के पसीने की गंध है। जब हम उनसे लगातार गणना करवाते हैं, तो उनके सर्किट उस रिक्शा वाले की पिंडलियों की तरह कांपने लगते हैं जो चढ़ाई पर सवारी खींच रहा हो।

हम उन पर जबरदस्ती ‘लर्निंग रेट’ थोपते हैं, लेकिन एंट्रॉपी (Entropy) अपना टैक्स वसूलने आ ही जाती है। सिस्टम गर्म होता है, ‘लॉस फंक्शन’ पहाड़ से लुढ़कने लगता है, और हम क्या करते हैं? हम उस पर तेज गति वाले कूलिंग पैड या भारी-भरकम पंखे लगा देते हैं। उस पंखे की ‘घं-घं’ की आवाज़ सुनी है? वह तकनीक की विजय नहीं है, वह उस मशीन की चीख है जो कह रही है कि “बस कर दो, मैं और नहीं सोच सकता।” यह सब एक बहुत बड़ा ‘जुगाड़’ है, जिसमें हम गर्मी को एक कोने से दूसरे कोने में धकेल रहे हैं, यह सोचकर कि हम भौतिकी को धोखा दे देंगे।

अंतहिन शोर

मुझे घर जाना है। यहाँ बहुत शोर है। यह संगीत का शोर नहीं है, यह उन लाखों न्यूरॉन्स और ट्रांजिस्टर के जलने की आवाज़ है जो इस वक्त शहर में काम कर रहे हैं। हम सब एक ऐसे ‘रिसेट’ के इंतज़ार में हैं जो कभी पूरी तरह से नहीं होगा। तुम अभी जो यह पढ़ रहे हो, इसी वक्त तुम्हारा दिमाग थोड़ा और घिस गया है। तुम्हारी चेतना में एक और गांठ पड़ गई है। जाओ, अब अपनी थकी हुई आँखों को बंद करो और उस कचरे को जलते हुए देखो जिसे तुम अपनी ‘जिंदगी’ कहते हो। वेटर! बिल लाओ।

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