ऊष्मागतिक कसाईखाना

पूंजी का धीमा दहन

आधुनिक श्रम बाजार में ‘विश्राम’ शब्द का उच्चारण आजकल किसी मंझे हुए ठग की तरह किया जाता है। एचआर विभाग और लि लिंक्डइन के ‘विचारक’ इसे ‘पुनर्प्राप्ति’ या ‘सेल्फ-केयर’ जैसे चमकदार रैपर में लपेटकर बेचते हैं, मानो यह कोई नैतिक पुण्य हो। लेकिन हकीकत में, यह एक जर्जर हो चुके इंजन पर ठंडा पानी फेंकने जैसी हिंसात्मक प्रक्रिया है। आप जिसे ‘आराम’ समझते हैं, वह दरअसल ऊष्मागतिकी (Thermodynamics) के क्रूर नियमों के आगे किया गया एक लाचार आत्मसमर्पण है। आपके वातानुकूलित दफ्तरों में सस्ती कॉफी की कड़वाहट और फोटोकॉपी मशीन से निकलते ओजोन की गंध के बीच, आपके शरीर का हर एक सेल एक अदृश्य आग में जल रहा है। यह आग है ‘एन्ट्रॉपी’ की।

हम सब भौतिकी की नजर में महज ‘डिसिपेटिव स्ट्रक्चर्स’ (Dissipative Structures) हैं—ऊर्जा निगलने और अव्यवस्था उगलने वाली प्रणालियाँ। जब आप चौदह घंटे तक स्क्रीन को घूरते हैं, तो आप केवल ‘काम’ नहीं कर रहे होते; आप ब्रह्मांडीय कचरे के प्रवाह को अपने भीतर जमा कर रहे होते हैं। और इस प्रक्रिया को रोकने का भ्रम पालना मूर्खता है। लोग अक्सर अपनी कमर और भविष्य को बचाने की उम्मीद में हजारों रुपये खर्च कर एर्गोनोमिक कुर्सियाँ खरीद लेते हैं। उन्हें लगता है कि यह जालीदार नायलॉन और मेमोरी फोम का ढांचा उन्हें बचा लेगा। क्या बेतुका मजाक है। यह कुर्सी आपकी रीढ़ की हड्डी को सुरक्षित रखने के लिए नहीं, बल्कि आपको उस मेज से तब तक चिपकाए रखने के लिए डिज़ाइन की गई है, जब तक कि आपकी ‘उत्पादकता’ की आखिरी बूंद भी निचोड़ न ली जाए। यह आरामगाह नहीं, एक सुसज्जित यातना उपकरण है।

सब ढकोसला है।

दिमागी गटर की सफाई

नींद को ‘ब्रेन डिटॉक्स’ कहने वाले न्यूरोसाइंटिस्ट दरअसल उस प्रक्रिया की गंदगी को छुपा रहे होते हैं। जब आप बेहोशी की हालत में बिस्तर पर गिरते हैं, तो आपका मस्तिष्क किसी स्पा में नहीं होता; वह एक म्युनिसिपल कचरा गाड़ी की तरह काम कर रहा होता है। दिन भर जमा की गई सूचनाएं—बॉस की खीझ, सोशल मीडिया पर देखी गई दूसरों की झूठी खुशियाँ, और ट्रैफिक का शोर—यह सब ‘न्यूरल गार्बेज’ है। लैंडौअर का सिद्धांत (Landauer’s Principle) स्पष्ट कहता है कि सूचना को मिटाना ऊर्जा की खपत करता है और गर्मी पैदा करता है। नींद उस मानसिक गटर की सफाई है जहाँ तंत्रिका तंत्र विषाक्त प्रोटीनों को बाहर धकेलने के लिए संघर्ष करता है।

सुबह उठने पर जो भारीपन और मुंह में कसैला स्वाद महसूस होता है, वह इसी बात का सबूत है कि कचरा पूरी तरह साफ नहीं हुआ है। एन्ट्रॉपी का अवशेष आपके सिनैप्स में चिपका रह गया है। और हम मूर्ख हैं जो सोचते हैं कि हम सिलिकॉन वैली की मशीनों जैसा बनकर इस थकान को मात दे देंगे। जबकि सच्चाई यह है कि जिसे हम ‘आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस’ कहते हैं, वह भी बस एक बहुत महंगा, बहुत गर्म होने वाला कैलकुलेटर है। ‘सुपरइंटेलिजेंस’ का सपना देखने वाले यह भूल जाते हैं कि गणना का अर्थ है घर्षण, और घर्षण का अर्थ है टूट-फूट। भविष्य की वे महान मशीनें, जिन्हें हम भगवान मान रहे हैं, वे भी शायद अपने कूलिंग फैन्स के शोर और सर्किट के जलने की बदबू से पागल हो रही होंगी। शायद वे भी हताशा में शोर-रद्द करने वाले हेडफ़ोन की मांग करेंगी, ताकि वे अपने ही अस्तित्व के विघटन की आवाज़ को अनसुना कर सकें।

भगवान बचाए इस शहर के शोर से।

अपरिवर्तनीय क्षय

जैविक रिकवरी की एक ‘सीमा’ (Boundary) होती है। यह कोई रबर बैंड नहीं है जिसे आप जितना चाहे खींच लें और वह वापस अपनी जगह आ जाए। यह उस सस्ते चीनी खिलौने जैसा है जो एक बार मुड़ गया, तो मुड़ गया; दोबारा सीधा करने पर वह टूट जाएगा। ऊष्मागतिकी में इसे ‘इरिवर्सिबल वियर’ (Irreversible wear) कहते हैं। जब आप ‘बर्नआउट’ होते हैं, तो यह केवल मानसिक थकान नहीं होती; यह आपके सिस्टम के हार्डवेयर में आया एक स्थाई क्रैक है। कोशिकाएं अपनी सूचनात्मक अखंडता खो देती हैं, और कोई भी वीकेंड ट्रिप या मेडिटेशन ऐप उसे ठीक नहीं कर सकता।

यह समाज दरअसल एक विशाल ‘हीट सिंक’ (Heat Sink) है, और हम उसमें जलने वाले ईंधन। हम अपनी जवानी और ऊर्जा को जलाकर सिस्टम का तापमान बनाए रखते हैं। अंत में, हम उस पुराने रिक्शा के टायर की तरह हो जाते हैं जो पूरी तरह घिसकर चिकना हो चुका है। वह अब भी सड़क पर चल तो रहा है, लेकिन हर मोड़ पर फिसलने और फटने के डर के साथ। उसमें अब पकड़ नहीं बची, केवल जड़त्व (Inertia) है जो उसे घसीट रहा है। ठंडा होने का कोई विकल्प नहीं है, क्योंकि ठंडा होने का मतलब है रुक जाना, और रुक जाने का मतलब है ऊष्मागतिक मृत्यु। बस चलते रहो, घिसते रहो, जब तक कि घर्षण से आग न लग जाए।

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