कॉर्पोरेट जगत की सबसे बड़ी विडंबना यह नहीं है कि वे आपसे गधों की तरह काम करवाते हैं, बल्कि यह है कि वे इस ‘मजदूरी’ को ‘पैशन’ और ‘करियर ग्रोथ’ जैसे सुनहरे शब्दों के पीछे छिपा देते हैं। आप दफ्तर की उस नीली रोशनी में बैठकर जो एक्सेल शीट भर रहे हैं, वह दरअसल समाज की उस व्यवस्था का हिस्सा है जिसे हम ‘संगठन’ कहते हैं—एक ऐसा तंत्र जो खुद को जीवित रखने के लिए आपकी मानसिक ऊर्जा का भक्षण करता है। लोग इसे ‘हसल कल्चर’ कहते हैं, लेकिन अगर आप इसे एक ठंडी, वैज्ञानिक दृष्टि से देखें, तो यह सिर्फ ऊर्जा का एक व्यर्थ अपव्यय है। जैसे सड़क किनारे की किसी दुकान पर उबलती हुई चाय, जहाँ गरमाहट से ज्यादा भाप उड़ रही हो।
असल में, जिसे हम ‘काम’ कहते हैं, वह सूचना के परमाणुओं को एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाने की प्रक्रिया मात्र है। यह एक सांख्यिकीय खेल है जहाँ हम ब्रह्मांड की प्राकृतिक अराजकता के विरुद्ध एक छोटी सी दीवार खड़ी करने की कोशिश करते हैं। यह सब उस जले हुए तेल की तरह है जिसमें सड़क किनारे का हलवाई सुबह से शाम तक समोसे तल रहा है—वही काली, गाढ़ी हताशा आपकी भी नियति है।
अराजकता और खाली जेब का गणित
ऊष्मागतिकी (Thermodynamics) का दूसरा नियम कहता है कि ब्रह्मांड में अराजकता यानी ‘एन्ट्रॉपी’ हमेशा बढ़ती है। आपका डेस्क, आपका इनबॉक्स और आपकी जिंदगी—सब कुछ बिखरने के लिए ही बना है। आप सुबह उठकर जो टू-डू लिस्ट बनाते हैं, वह दरअसल उस बढ़ती हुई एन्ट्रॉपी को रोकने की एक नाकाम कोशिश है। यह बिल्कुल वैसा ही है जैसे आप किसी रेलवे स्टेशन की भीड़ में खड़े होकर यह उम्मीद करें कि लोग कतार बनाकर चलेंगे। बेवकूफी है।
जब हम किसी कार्य में पूरी तरह डूब जाते हैं, जिसे मनोवैज्ञानिक ‘फ्लो’ (Flow) कहते हैं, तो भौतिक विज्ञान की भाषा में हम एक ‘गैर-संतुलन स्थिर अवस्था’ (Non-equilibrium steady state) में होते हैं। यहाँ मानव मस्तिष्क एक ‘डिसिपेटिव स्ट्रक्चर’ बन जाता है। यानी, एक ऐसा तंत्र जो अपने भीतर व्यवस्था (Order) बनाए रखने के लिए बाहर की दुनिया में भीषण अराजकता फेंकता है। ध्यान (Concentration) कोई आध्यात्मिक उपलब्धि नहीं है; यह सिर्फ एन्ट्रॉपी का एक कुशल निष्कासन है। आप अपने काम में इसलिए केंद्रित नहीं हो पाते क्योंकि आप ‘मेहनती’ हैं, बल्कि इसलिए क्योंकि आपका सिस्टम बाहरी शोर को कचरे की तरह बाहर फेंकने में सफल हो गया है। जब मकान मालिक दरवाजे पर खड़ा हो और जेब में केवल चिल्लर बची हो, तब यह सारा विज्ञान और भी स्पष्ट नजर आता है।
नरक का चरण संक्रमण
पदार्थ की अवस्थाएँ बदलती हैं—बर्फ पानी बनती है, पानी भाप। ठीक वैसे ही, श्रम की भी अवस्थाएँ होती हैं। जब आप काम शुरू करते हैं, तो आपका दिमाग ‘गैस’ की तरह होता है—विचार हर दिशा में भाग रहे होते हैं, कोई नियंत्रण नहीं होता। लेकिन जैसे ही आप ‘एन्ट्रॉपी प्रवाह’ को नियंत्रित करते हैं, एक ‘चरण संक्रमण’ (Phase Transition) होता है। आपका मानसिक तंत्र ‘तरल’ से ‘ठोस’ अवस्था में आ जाता है। इसे ही हम ‘डीप वर्क’ कहते हैं।
लेकिन इस अवस्था तक पहुँचना सस्ता नहीं है। आधुनिक दुनिया आपको इस संक्रमण से रोकने के लिए डिज़ाइन की गई है। आपका स्मार्टफोन दरअसल एक ‘एन्ट्रॉपी पंप’ है जो हर दो मिनट में आपके सिस्टम में अव्यवस्था इंजेक्ट करता है। लोग इस अव्यवस्था से बचने के लिए अजीबोगरीब कीमतों वाले एर्गोनोमिक चेयर पर ढाई-तीन लाख रुपये फूंक देते हैं, जैसे कि उस जालीदार कुर्सी पर बैठने से उनके दिमाग का कचरा साफ हो जाएगा। सच तो यह है कि अगर आपका आंतरिक ताप (Inner noise) बहुत अधिक है, तो सोने की कुर्सी भी आपको ‘फ्लो’ में नहीं ला सकती। यह वैसा ही है जैसे किसी फटे हुए टायर में प्रीमियम नाइट्रोजन भरना। बैठने वाला वही थका हुआ मजदूर है, चाहे गद्दी कितनी भी रेशमी क्यों न हो।
शोर का विसर्जन
किसी भी इंजन की तरह, ध्यान केंद्रित करने के लिए हमें ‘कूलिंग सिस्टम’ की जरूरत होती है। यदि आप अपने इनबॉक्स के 500 ईमेल और सहकर्मियों की निरर्थक गपशप को प्रोसेस कर रहे हैं, तो आपका मानसिक तापमान ‘क्रिटिकल पॉइंट’ को पार कर जाएगा। इसके बाद सिर्फ ‘मेल्टडाउन’ होता है—जिसे कॉर्पोरेट की भाषा में ‘बर्नआउट’ कहते हैं।
वैज्ञानिक रूप से, एकाग्रता का अर्थ है—सिस्टम की ‘फ्री एनर्जी’ को अधिकतम करना और ‘वेस्ट हीट’ को न्यूनतम करना। जो लोग सफल दिखते हैं, वे वास्तव में सिर्फ अपने वातावरण के प्रति निर्दयी होते हैं। वे सूचना के उस कचरे को अपने भीतर प्रवेश नहीं करने देते। वे एक ‘ओपन सिस्टम’ की तरह व्यवहार करते हैं जो केवल उच्च-गुणवत्ता वाली जानकारी लेता है और अव्यवस्थित शोर को तुरंत बाहर कर देता है। आजकल के बच्चे जो ये शोर को कम करने वाले महंगे हेडफ़ोन लगाकर घूमते हैं, उन्हें लगता है कि वे संगीत सुन रहे हैं। नहीं, वे दरअसल भौतिकी के एक नियम का पालन कर रहे हैं—वे अपने ‘सिग्नल-टू-नॉइज़ रेशियो’ को कृत्रिम रूप से बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं। हालांकि, अस्सी हजार रुपये सिर्फ शांति के लिए देना एक अलग तरह की मानसिक बीमारी है। तुम शोर को मिटा नहीं रहे, बस उसे अपनी नसों में उतरने से कुछ देर के लिए रोक रहे हो।
मुझे घर जाना चाहिए, यहाँ बहुत शोर है। अंततः, श्रम का यह पूरा ढांचा एक ऐसा इंजन है जो अंततः रुक जाएगा। हम चाहे कितनी भी ‘थर्मोडायनामिक दक्षता’ हासिल कर लें, मौत सबसे बड़ी एन्ट्रॉपी है। तब तक, आप अपनी एक्सेल शीट भरते रहिए और यह भ्रम पालिए कि आप कुछ सार्थक कर रहे हैं। ब्रह्मांड को आपके ‘फ्लो’ से कोई फर्क नहीं पड़ता; उसे बस आपकी ऊर्जा से मतलब है जो धीरे-धीरे गर्मी बनकर इस ठंडे अंतरिक्ष में विलीन हो रही है। जाओ, अब अपना काम करो। मुझे अपनी चाय पीने दो, इसमें वैसे भी चीनी कम है और कड़वाहट ज्यादा।

コメント