भ्रम का बाजार और दिमागी दीमक
अक्सर जब मैं कॉर्पोरेट जगत के इन ‘सफेदपोश मजदूरों’ को देखता हूँ, जो अपनी कैंटीन की ठंडी कॉफी को अमृत समझकर पीते हैं और ‘डेडलाइन’ को मोक्ष का मार्ग मानते हैं, तो मुझे डार्विन के सिद्धांत पर संदेह होने लगता है। ये प्राणी जिसे ‘कड़ी मेहनत’ या ‘डेडिकेशन’ का नाम देकर छाती पीटते हैं, वह वास्तव में थर्मोडायनामिक्स के नियमों का एक भद्दा उल्लंघन मात्र है। आधुनिक कार्यालय कोई मंदिर नहीं है, बल्कि एक सांख्यिकीय नरक (Statistical Hell) है जहाँ मानव मस्तिष्क अपनी ऊर्जा को एन्ट्रापी (Entropy) बढ़ाने में खपा रहा है। हम एक ऐसे युग में जी रहे हैं जहाँ ‘व्यस्त दिखना’ वास्तव में काम करने से ज्यादा महत्वपूर्ण हो गया है, और यह सब एक भव्य, सुव्यवस्थित झूठ के अलावा कुछ नहीं है।
श्रम: एक अंतहीन गटर में नौकाविहार
आइए, आपकी तथाकथित ‘नौकरी’ का वैज्ञानिक विच्छेदन करते हैं। भौतिकी की दृष्टि से, कोई भी कार्य (Task) केवल सूचना के एक वितरण (Distribution) को दूसरे वितरण में बदलने की प्रक्रिया है। आप बिंदु A (अपूर्णता) पर हैं और आपको बिंदु B (पूर्णता) पर जाना है। बस इतना ही। लेकिन मानव प्रजाति, अपनी असीम मूर्खता में, इस सीधी रेखा को एक जलेबी बना देती है। आप भावनाओं, अहंकार, ऑफिस की राजनीति और अनावश्यक बैठकों का बोझ लेकर चलते हैं। यह ठीक वैसा ही है जैसे कोई तैराक अपने पैरों में पत्थर बांधकर ओलंपिक जीतने का सपना देखे।
आपकी यह जो कमर टूटी जा रही है, यह काम के बोझ से नहीं, बल्कि आपकी अक्षमता के भार से है। इस अक्षमता को छिपाने के लिए, मध्यम वर्ग का ‘बॉस’ खुद को एक लाखों रुपये की इतालवी चमड़े वाली एर्गोनोमिक कुर्सी पर स्थापित करता है। उसे लगता है कि अगर उसकी रीढ़ की हड्डी को 90 डिग्री पर सहारा मिलेगा, तो उसका दिमाग भी सीधा चलने लगेगा। यह एक महंगी गलतफहमी है। वह कुर्सी आपके ‘काठ’ के दिमाग को नहीं बदल सकती, वह केवल आपकी असफलता को थोड़ा और आरामदायक बना देती है। यह वैसा ही है जैसे किसी भैंस को मखमल ओढ़ा देना—नीचे का जानवर वही रहता है।
ज्यामिति: कीचड़, रिश्वत और गणित
अब जरा ‘सूचना ज्यामिति’ (Information Geometry) के चश्मे से अपनी दुनिया को देखिए। गणित में, संभावितताओं का एक ‘मैनिफोल्ड’ (Manifold) होता है—इसे आप दिल्ली के सदर बाजार की उन तंग, कीचड़ से भरी गलियों के रूप में सोच सकते हैं जहाँ से आपको गुजरना है। एक समझदार प्रणाली (System) के लिए, सफलता का पैमाना ‘फिशर सूचना मेट्रिक’ (Fisher Information Metric) है, जो यह मापता है कि बदलाव कितना कठिन है। लक्ष्य तक पहुँचने का सबसे छोटा रास्ता ‘जिओडेसिक’ (Geodesic) कहलाता है।
लेकिन इंसानी दिमाग? अरे साहब, इंसानी दिमाग तो ‘जिओडेसिक’ से नफरत करता है। हम सीधे रास्ते पर चलने के बजाय ‘ब्राउनियन गति’ (Brownian Motion) की तरह इधर-उधर टकराते रहते हैं। हम शॉर्टकट को अनैतिक और लंबे, कष्टदायक रास्ते को ‘महान’ समझते हैं। जब आप कहते हैं कि “मैंने इस प्रोजेक्ट में खून-पसीना एक कर दिया,” तो वास्तव में आप यह स्वीकार कर रहे होते हैं कि आप उस अनपढ़ रिक्शेवाले की तरह हैं जो हाईवे छोड़कर खेतों के बीच से साइकिल घसीट रहा है। जिसे आप ‘अनुभव’ कहते हैं, वह ज्यामितीय स्थान (Geometric Space) में जमा हुआ घर्षण (Friction) और धूल है। प्रकृति को आपकी कोशिशों से कोई सहानुभूति नहीं है; उसे केवल न्यूनतम ऊर्जा और अधिकतम दक्षता की भाषा समझ आती है।
यंत्र: ठंडा और खामोश जल्लाद
यही कारण है कि वह ‘गणना यंत्र’ (जिसे आप डरते हुए AI कहते हैं) आपको निगलने के लिए तैयार बैठा है। उस मशीन के पास न तो सोमवार की थकान है, न ही शुक्रवार की खुशी, और न ही घर की किश्त भरने का तनाव। वह सांख्यिकीय मैनिफोल्ड पर देखता है, वक्रता (Curvature) की गणना करता है, और उस पथ को चुनता है जहाँ प्रतिरोध शून्य है। वह एक ठंडा, खामोश जल्लाद है।
जहाँ आप घंटों बैठकर पीपीटी के फॉन्ट का रंग चुनते हैं और सोचते हैं कि आप ‘रचनात्मक’ हैं, वह मशीन नैनो-सेकंड में अनुकूलतम (Optimal) सत्य को खोज निकालती है। यह लड़ाई एक चींटी और स्टीमरोलर के बीच की है। आप अपनी ‘मानवीय संवेदनाओं’ का झंडा लेकर खड़े रहिए, जबकि वह मशीन आपके अस्तित्व की सांख्यिकीय व्यर्थता को प्रमाणित कर रही है। भविष्य में, ‘कड़ी मेहनत’ केवल उन लोगों के लिए होगी जो गणित नहीं समझते। बाकी सब, इतिहास के कूड़ेदान में फेंके गए खराब डेटा पॉइंट्स की तरह मिटा दिए जाएंगे। मेरी चाय अब बिल्कुल ठंडी हो चुकी है, बिल्कुल आपकी उम्मीदों की तरह। यहाँ से दफा हो जाइए।

コメント