शून्य की ज्यामिति

सुबह आईने के सामने खड़े होकर जब आप अपनी गर्दन पर टाई का फंदा कसते हैं, तो आप इंसान नहीं रह जाते; आप एक ‘सांख्यिकीय मैनीफोल्ड’ (Statistical Manifold) में प्रवेश करने वाला एक डेटा पॉइंट बन जाते हैं। हम जिसे ‘कॉर्पोरेट संस्कृति’ कहते हैं, वह असल में सूचना के महासागर में अपनी प्रासंगिकता बचाए रखने के लिए किया गया एक भद्दा नाटक है। जब कोई सीईओ ‘सार्वजनिक हित’ या ‘मिशन’ की बात करता है, तो मुझे हंसी आती है। यह सब केवल एक गणितीय समीकरण के मापदंडों (Parameters) को बदलने की कोशिश है, ताकि शेयरधारकों के चेहरे पर मुस्कान बनी रहे और आपकी आत्मा का ‘एन्ट्रॉपी’ (Entropy) बढ़ता रहे।

पसीने का गणित

श्रम को हमने नैतिकता का जामा पहना दिया है, जैसे कि ऑफिस की कुर्सी पर 10 घंटे घिसने से मोक्ष की प्राप्ति होगी। लेकिन सूचना ज्यामिति (Information Geometry) की रूखी नज़र से देखें, तो एक संगठन केवल एक ‘प्रायिकता वितरण’ (Probability Distribution) का समूह है। यहाँ आपकी मेहनत ‘फिशर इन्फॉर्मेशन’ (Fisher Information) के रूप में मापी जाती है।

लेकिन यह फिशर इन्फॉर्मेशन क्या है? आसान भाषा में कहें तो यह ‘सटीकता’ की माप है। कॉर्पोरेट दुनिया में, इसका अर्थ है कि सिस्टम आपको कितना निचोड़ सकता है इससे पहले कि आप पूरी तरह से टूट जाएं। जैसे सड़क किनारे छोले-कुल्चे बेचने वाला यह जानता है कि ग्राहकों की भीड़ (Noise) के बीच तीखा कितना रखना है, वैसे ही कंपनी जानती है कि आपको कितनी कम सैलरी और कितनी अधिक प्रशंसा (Appreciation) देनी है ताकि आप सिस्टम में बने रहें। आप जिसे अपनी ‘विशेषज्ञता’ समझते हैं, वह गणितीय रूप से केवल शोर (Noise) के बीच का एक संकेत (Signal) मात्र है, जिसे किसी भी दिन रिप्लेस किया जा सकता है। क्या बकवास है।

द्वैतता का नरक

सूचना ज्यामिति में ‘द्वैत समतल स्थान’ (Dual Flat Space) की अवधारणा होती है, जहाँ ‘e-connection’ और ‘m-connection’ एक दूसरे के पूरक होते हैं। आधुनिक मजदूर का जीवन इसी द्वैतता में फंसा हुआ है। एक तरफ वह ‘लिंक्डइन’ वाला चेहरा है जो दुनिया को बताता है कि वह कितना ‘पैशनेट’ है, और दूसरी तरफ वह असली चेहरा है जो महीने की 25 तारीख को बैंक अकाउंट देखकर ठंडी आह भरता है।

इन दो दुनियाओं के बीच का जो खिंचाव है, वही आपकी रीढ़ की हड्डी को टेढ़ा कर रहा है। यह ज्यामितीय तनाव (Geometric Stress) इतना वास्तविक है कि लोग इसे ठीक करने के लिए पागलों की तरह पैसा बहाते हैं। वे सोचते हैं कि अगर वे 2 लाख रुपये की शानदार एर्गोनोमिक कुर्सी खरीद लेंगे, तो उनके जीवन का समीकरण सुलझ जाएगा। पर सच्चाई यह है कि आप मखमल पर बैठकर भी वही घिसी-पिटी एक्सेल शीट ही भर रहे हैं। कुर्सी आपकी कमर को सहारा दे सकती है, लेकिन उस खोखलेपन को नहीं भर सकती जो इस ‘द्वैतता’ ने आपके अंदर पैदा किया है।

शोर और विसर्जन

संगठन जब ‘विकसित’ होने का दावा करते हैं, तो वे असल में केवल जटिलता (Complexity) बढ़ा रहे होते हैं। यह एक भूगर्भीय (Geodesic) पथ है जो सीधे रसातल की ओर जाता है। जैसे-जैसे सूचना का घनत्व बढ़ता है, अर्थ (Meaning) लुप्त होने लगता है। मीटिंग्स की संख्या बढ़ती जाती है, लेकिन निर्णय लेने की क्षमता शून्य की ओर प्रस्थान करती है।

हम जिसे ‘पब्लिक नेचर’ या सार्वजनिकता कहते हैं, वह अंततः सूचना के इस भारी-भरकम ढांचे का ढह जाना है। हम सब इस ढांचे के मलबे के नीचे दबे हुए हैं, और फिर भी हम इसे ‘सभ्यता’ कहते हैं। सब माया है, बस गणित के क्रूर नियमों से बंधी हुई। अब और सोचने की हिम्मत नहीं है, दिमाग का फ्यूज उड़ने ही वाला है। चुपचाप अपना लैपटॉप बंद करो और इस ज्यामितीय कैदखाने में थोड़ी देर के लिए आँखें मूंद लो, क्योंकि कल फिर इसी शून्य में जागना है।

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