भीड़ का पेट (The Belly of the Mob)
सूचना ज्यामिति (Information Geometry) और ‘सांख्यिकीय मैनिफोल्ड’ (Statistical Manifold) जैसे भारी-भरकम शब्दों को उस कूड़ेदान में फेंक दीजिए जहाँ आप अपने चुनावी वादे फेंकते हैं। लोकतंत्र और सार्वजनिक निर्णय प्रक्रिया (Public Decision-Making) कोई गणितीय कविता नहीं है; यह एक 45 डिग्री की चिलचिलाती धूप में, राशन की दुकान के बाहर खड़ी उस भीड़ का पसीना है जो एक-दूसरे को कोहनियां मारकर आगे बढ़ने की कोशिश कर रही है। जिसे आप ‘जनमत’ कहते हैं, वह वास्तव में भूख और हताशा का एक बदबूदार सांख्यिकीय वितरण (Distribution) है।
एक ‘सांख्यिकीय मैनिफोल्ड’ को समझना है? तो किसी सरकारी बस में घुसने की कोशिश कीजिए। वहाँ हर व्यक्ति एक ‘डेटा पॉइंट’ है, और उनके बीच की दूरी—जिसे हम विज्ञान में ‘फिशर सूचना मीट्रिक’ (Fisher Information Metric) कहते हैं—वास्तव में यह मापने का तरीका है कि पड़ोसी की बगल से आती पसीने की गंध और आपकी नाक के बीच कितनी जगह बची है। यहाँ कोई उच्च आदर्श नहीं है। यहाँ केवल एक ही गणित काम करता है: अपने हिस्से की ऑक्सीजन और जगह को कैसे छीना जाए। जब हम कहते हैं कि समाज एक निर्णय पर पहुँचा है, तो इसका मतलब यह नहीं है कि हमने सत्य को पा लिया है; इसका अर्थ केवल इतना है कि शोर मचाने वाली भीड़ अब थक चुकी है और बासी समोसे के लिए समझौता कर चुकी है। यह सभ्यता नहीं, यह एन्ट्रापी (Entropy) का एक भद्दा तमाशा है।
सब बकवास है। सर दर्द हो रहा है।
मुड़ी हुई रीढ़ और अहंकार की कुर्सी (Twisted Spines and Chairs of Vanity)
आधुनिक मनुष्य की सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि उसे लगता है कि यदि वह अपने बैठने का तरीका बदल ले, तो उसकी सोचने की क्षमता बदल जाएगी। हम ‘सहमति की वक्रता’ (Curvature of Consensus) को सीधा करने के नाम पर बाज़ार में जाते हैं और लाखों रुपये फूँक देते हैं। आप एक महंगी एर्गोनोमिक ऑफिस चेयर खरीद लाते हैं, यह सोचकर कि लम्बर सपोर्ट (Lumbar support) आपकी नैतिक रीढ़ को भी सीधा कर देगा। कितनी बड़ी गलतफहमी है। उस जालीदार, सांस लेने वाली पीठ और एडजेस्टेबल आर्मरेस्ट वाली गद्दी पर बैठकर भी आप वही रीढ़विहीन, डरपोक और स्वार्थी निर्णय लेते हैं जो आप एक प्लास्टिक के स्टूल पर बैठकर लेते।
जिसे आप ‘आम सहमति’ (Consensus) कहते हैं, वह वास्तव में वह बिंदु है जहाँ आपकी और दूसरों की असहमति की वक्रता टकराकर शून्य हो जाती है—ठीक वैसे ही जैसे किसी पार्टी के बाद प्लेट में बचा हुआ सालन ठंडा होकर जम जाता है। वह न तो खाने लायक होता है और न ही फेंकने लायक। यह ‘समझौता’ है। आपकी वह आलीशान कुर्सी, जो आपको गुरुत्वाकर्षण से बचाने का दावा करती है, वास्तव में आपको यथार्थ से दूर कर रही है। आप उस पर झूलते हुए यह भूल जाते हैं कि नीचे की ज़मीन खिसक रही है। यह एर्गोनॉमिक्स नहीं, यह अहंकार का एनेस्थीसिया है।
पैसे की बर्बादी। और कुछ नहीं।
एल्गोरिथम की नीलामी (Governance as Foreclosure)
अंत में, जब आपके सारे ‘जुगाड़’ और बहसें विफल हो जाती हैं, तो एल्गोरिथम का डंडा चलता है। इसे ‘ऑप्टिमाइज़ेशन’ (Optimization) कहना बंद कीजिए। यह शब्द बहुत साफ-सुथरा लगता है। असलियत यह है कि यह एक बेदखली का नोटिस है। भविष्य का शासन किसी दयालु राजा का दरबार नहीं होगा; यह एक कसाईखाना होगा जहाँ हर गाय को यह भ्रम होगा कि वह अपनी मर्जी से लाइन में खड़ी है।
समाज को एक ‘लॉस फंक्शन’ (Loss function) के रूप में देखा जा रहा है जिसे कम करना है। क्या आपको लगता है कि आपके पास ‘पब्लिक चॉइस’ है? यह ठीक वैसा ही है जैसे एकラーメン (Ramen) की दुकान पर आपको मशीन से टिकट खरीदना पड़ता है—मेन्यू में जो है, वही मिलेगा, और चुपचाप खाना पड़ेगा। कोई बहस नहीं, कोई संशोधन नहीं। एल्गोरिथम आपकी भावनाओं, आपकी संस्कृति या आपकी ‘लोकतांत्रिक आवाज’ की परवाह नहीं करता। वह केवल सांख्यिकीय स्थिरता चाहता है। वह आपको वही विकल्प देगा जो गणितीय रूप से ‘इष्टतम’ हैं, चाहे वह आपको कितना भी अमानवीय क्यों न लगे। हम सब उस उच्च-आयामी (High-dimensional) जेल में बंद हैं, जहाँ दीवारें अदृश्य हैं और रक्षक कोड की पंक्तियाँ हैं। अपनी कुर्सी पर कसकर बैठ जाइए, क्योंकि अब आपकी राय की कोई कीमत नहीं बची है।

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