पिछले सप्ताह जब हम इस धुएँ से भरे बार के कोने में बैठकर ‘श्रम के मूल्य’ जैसी दकियानूसी बातों पर माथापच्ची कर रहे थे, तब मेरे मन में एक विचार कौंधा। आज के कॉर्पोरेट जगत और समाज को देखिए। जिसे हम ‘संगठन’ या ‘सभ्यता’ कहते हैं, वह असल में क्या है? वैज्ञानिक दृष्टि से देखें, तो यह केवल ऊष्मा (heat) और हताशा (despair) का एक भव्य विसर्जन स्थल है। यह सारा शोर, ये अंतहीन मीटिंग्स, और ‘सिनर्जी’ के खोखले नारे—यह सब ब्रह्मांड की उस क्रूर वास्तविकता से लड़ने की एक नाकाम कोशिश है जिसे हम ‘एंट्रॉपी’ कहते हैं।
सड़े हुए समोसे और इल्या प्रिगोजिन
नोबेल विजेता इल्या प्रिगोजिन (Ilya Prigogine) ने ‘डिसिपेटिव स्ट्रक्चर्स’ (dissipative structures) का सिद्धांत दिया था, लेकिन मुझे यकीन है कि उन्होंने कभी गुड़गाँव के किसी शीशे वाले टॉवर के बेसमेंट को नहीं देखा होगा। अगर देखा होता, तो वे समझ जाते कि एक बहुराष्ट्रीय कंपनी और सड़क किनारे तेल में खौलते हुए [सड़े हुए समोसे](https://www.amazon.in/dp/B00V6H6C10) में कोई तात्विक अंतर नहीं है। दोनों ही प्रणालियाँ अस्तित्व में बने रहने के लिए लगातार बाहरी ऊर्जा की भीख मांगती हैं। एक संगठन तब तक ‘जीवित’ लगता है जब तक उसमें निवेशकों का पैसा और इंटर्न्स का खून-पसीना ईंधन की तरह झोंका जा रहा है। जिस पल यह ऊर्जा का प्रवाह रुका, वह पूरा ढांचा ठंडा होकर अपनी स्वाभाविक अवस्था में लौट आएगा—यानी धूल और मलबे में। यह विकास नहीं है, यह केवल अपरिहार्य पतन को टालने की महँगी कवायद है।
क्या बकवास है सब।
व्यवस्था का पाखंड और ‘इनसबफिशिएंट बैलेंस’
समाजशास्त्री जिसे ‘पब्लिक ऑर्डर’ कहते हैं, वह भौतिकी की दृष्टि से एक क्रूर मजाक है। हम जिसे ‘नेगेंट्रॉपी’ (Negentropy) या व्यवस्था कहते हैं, वह असल में अव्यवस्था को गली के दूसरे कोने में धकेलने की प्रक्रिया है। जब एक मैनेजर अपनी टीम को ‘ऑर्गनाइज़’ करता है, तो वह केवल स्थानीय एंट्रॉपी को कम कर रहा होता है, जबकि वैश्विक एंट्रॉपी का ग्राफ ऊपर चढ़ता जाता है। यह ठीक वैसा ही है जैसे आप किसी एटीएम पर [अपर्याप्त शेष राशि वाली स्क्रीन](https://www.amazon.in/dp/B08L5HM69L) को घूरते हुए यह उम्मीद करें कि मशीन को दो बार कैंसिल बटन दबाने से आपके खाते में पैसे प्रकट हो जाएंगे। व्यवस्था एक भ्रम है जिसे हम अपनी मानसिक शांति के लिए ओढ़ लेते हैं। पुरानी दिल्ली के ट्रैफिक में फंसा हुआ रिक्शेवाला और एसी केबिन में बैठा सीईओ, दोनों ही अराजकता के समुद्र में डूबने से बचने के लिए हाथ-पैर मार रहे हैं, लेकिन पानी का स्तर लगातार बढ़ रहा है।
डिजिटल घर्षण और हाई-रिज़ॉल्यूशन विफलता
जैसे-जैसे कोई संस्था बड़ी होती है, उसकी ‘आंतरिक रगड़’ (internal friction) ज्यामितीय दर से बढ़ती है। जिसे आप ‘ब्यूरोक्रेसी’ कहते हैं, वह थर्मोडायनामिक्स का टैक्स है। आजकल हर कोई ‘डिजिटल ट्रांसफॉर्मेशन’ का झंडा लेकर दौड़ रहा है। उन्हें लगता है कि नए सॉफ्टवेयर और [हाई-रिज़ॉल्यूशन मॉनिटर](https://www.amazon.in/dp/B08CF4GQTS) लगाने से वास्तविकता बदल जाएगी। मूर्खता की पराकाष्ठा देखिए! स्क्रीन के पिक्सेल बढ़ने से उस पर दिखने वाली आपकी विफलता की तस्वीर नहीं बदलती, बस वह और अधिक साफ और रंगीन दिखाई देने लगती है। यह एक भारी-भरकम ऐप को चलाने के लिए फोन की बैटरी को ‘पावर सेविंग मोड’ पर डालने जैसा है—सिस्टम खुद को ठंडा रखने की कोशिश में ही सारी ऊर्जा खा जाता है, और परिणाम शून्य रहता है।
एर्गोनोमिक कुर्सियों पर बैठकर मौत का इंतजार
और इन स्ट्रैटेजी मीटिंग्स में क्या होता है? लोग मैक्सवेल के दानव (Maxwell’s Demon) बनकर डेटा के कणों को छांटने का नाटक करते हैं। वे लाखों रुपये खर्च करके उन [अल्ट्रा-प्रीमियम एर्गोनोमिक कुर्सियों](https://www.amazon.in/dp/B08GP85NCB) को खरीदते हैं, यह सोचकर कि यह उनकी उत्पादकता बढ़ाएगी। असल में, वे गुरुत्वाकर्षण—जो कि ब्रह्मांड की सबसे जिद्दी ताकत है—के खिलाफ अपनी रीढ़ की हड्डी के पतन को कुछ साल आगे खिसकाने की कोशिश कर रहे हैं। वह कुर्सी आपको ‘सीईओ’ जैसा महसूस नहीं कराती, वह बस आपको एक आरामदायक कोकून देती है जिसमें आप धीरे-धीरे सड़ सकें।
थकान हो रही है इस सब से।
कॉर्पोरेट वेलनेस प्रोग्राम्स का भी यही हाल है। वे आपको एक [स्मार्ट वॉच](https://www.amazon.in/dp/B09G96TFF7) पहना देते हैं ताकि आप अपनी कलाई पर अपनी घटती हुई जीवन-ऊर्जा का सटीक डिजिटल आंकड़ा देख सकें। यह स्वास्थ्य नहीं है, यह अपनी ही मृत्यु का लाइव डेटा-लॉगिंग है। अंततः, हर ‘स्ट्रक्चरल रिफॉर्म’ और हर ‘विज़न डॉक्यूमेंट’ केवल ब्रह्मांड की हीट डेथ (Heat Death) की ओर एक और कदम है। हम सूचना के मलबे के ढेर पर बैठकर यह दावा कर रहे हैं कि हमने सत्य को पा लिया है, जबकि हम केवल शोर को संगीत समझने की गलती कर रहे हैं। अगली बार जब कोई आपसे ‘सिनर्जी’ की बात करे, तो समझ जाइएगा कि वह डूबते जहाज से पानी निकालने के लिए चाय की छलनी मांग रहा है। व्यवस्था क्षणिक है, केवल शोर ही शाश्वत है।

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